कलियुग में ईश्‍वरप्राप्ति का सुलभ एवं सरल मार्ग है नामस्मरण !

प.पू. भक्तराज महाराजजी

कलियुग में ईश्‍वरप्राप्ति का सुलभ और सरल मार्ग है नामस्मरण !

सभी साधु-संत अपने-अपने मत के अनुसार भक्तों को नामस्मरण का महत्त्व समझाते हैं; किंतु प.पू भक्तराज महाराजजी (बाबा) ने भक्तों के लिए इस कलियुग की स्थिति के अनुसार दूरदृष्टि रखते हुए अत्यंत सरल, सामान्य, सुविधाजनक और अनुकरणीय मार्ग दिखाया है । उसके अनुसार उनका भक्त परिस्थिति के अनुसार कहीं भी और कभी भी परमेश्‍वर (अपने इष्टदेवता) अथवा गुरु द्वारा दिया नामजप कर सकता है ।

श्री. अशोक भांड

१. नौकरी करते समय निरंतर नामस्मरण करने से स्वयं की तथा मजदूरों की कार्यक्षमता और एकाग्रता बढना, काम का तनाव घटना, उसके प्रतिष्ठान का उत्पादन और उसकी गुणवत्ता बढने के कारण वार्षिक उत्पादन अपेक्षा से भी अधिक होकर लाभ भी अधिक मिलना

मैं जब नौकरी करता था, तब बाबा की कृपा से मेरा नामस्मरण निरंतर होता था । उसका सकारात्मक परिणाम मुझ पर तथा मेरे तत्त्वावधान में कार्यरत कर्मचारियों के काम पर ऐसा हुआ कि उनकी कार्यक्षमता और एकाग्रता बढी, साथ ही वातावरण में प्रसन्नता बढी । उसके कारण काम का तनाव अल्प हुआ । काम समय पर, ठीक से तथा उत्तम पद्धति से होता था । काम के समय मुझे तथा श्रमिकों को थकान अनुभव नहीं होती थी । इसके फलस्वरूप कंपनी का उत्पादन तथा उसकी गुणवत्ता बढने के कारण वार्षिक उत्पादन अपेक्षा से भी अधिक होकर आर्थिक लाभ भी अधिक होता था । कंपनी का वातावरण सभी के लिए पोषक होता था । सभी कार्य बिना दबाव के सुचारू रूप से होते थे । उसके कारण निजी क्षेत्र में ३८ वर्ष काम करने पर भी मुझे कभी भी काम का तनाव प्रतीत नहीं हुआ । बिना किसी अप्रिय घटना के मैं अपनी नौकरी का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूर्ण कर सका, वह केवल गुरुकृपा के कारण ही ! ‘नाम में अगम्य शक्ति है’, इसका यह स्पष्ट उदाहरण है; इसीलिए बाबा अपने भजन में स्पष्टता से कहते हैं,

नामची दीनाचा आधार । साधूनी नेईल आपणा पार ।

अर्थ : नाम ही जीवन का आधार है । यही हमारे जीवन का उद्धार करेगा ।

इसीलिए मैं यह आग्रहपूर्वक कहता हूं, ‘आप नामजप को अपनाएं तथा अपना जीवन सार्थक करें । अब तो बाबा का स्मरण करने में ‘एक भी क्षण न गंवाएं । यह नाम वाणी में बस जाए ।।’ अर्थात ‘बिना समय गंवाते हुए नामस्मरण को अपनाईए । यह नाम ही इस संसाररूपी कीचड से हमें बाहर निकालेगा ।’ सद्गुरु हमें इसके प्रति आश्‍वस्त कर रहे हैं’, जो सत्य है ।

क्षणही हा एक मोलाचा । बोल हा सत्य दीनाचा ।

अर्थ : दिनकर (प.पू. बाबा का पूर्वाश्रम का नाम) सत्य कहता है कि यह एक क्षण अनमोल है  ।

नाम की महिमा ऐसी है कि उसके कारण मन के विकार दूर होते हैं तथा अंतःकरण शुद्ध होता है एवं सद्गुरु को हृदय में विराजमान करने के लिए नाम अति आवश्यक है ।