वसुबारस (गोवत्स द्वादशी)

कार्तिक कृष्ण ११ (१७ अक्टूबर) : गोवत्स द्वादशी के दिन श्रीविष्णु की आपतत्त्वात्मक तरंगें कार्यरत होकर ब्रह्मांड में आती हैं । इस दिन कृतज्ञतापूर्वक इस कामधेनु का स्मरण कर आंगन में तुलसी वृंदावन के पास धेनु अर्थात गाय खडी कर प्रतीकात्मक रूप में उसका पूजन किया जाता है ।
धनतेरस (धनत्रयोदशी) का महत्त्व !

कार्तिक कृष्ण १२ (१८ अक्टूबर) : धनत्रयोदशी देवताओं के वैद्य धन्वंतरि की जयंती का दिवस है । दीपावली के समय धनत्रयोदशी के दिन यमदीपदान का विशेष महत्त्व है, जो स्कंद-पुराण के निम्न श्लोक से स्पष्ट होता है –
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यज: प्रीयतां मम ।।
– स्कंदपुराण
अर्थ : धनत्रयोदशी के दिन मैं यह दीप सूर्यपुत्र अर्थात यमदेवता को अर्पित करता हूं । वे मुझे मृत्यु के पाश से मुक्त कर मेरा कल्याण करें ।
धनत्रयोदशी के दिन व्यापारी द्रव्यकोष का पूजन करते हैं । एक दीपावली से लेकर अगली दीपावली तक व्यापारी वर्ष होता है । इसी दिन व्यापारी नए वर्ष की प्रविष्टि-बहियां लाते हैं । कुछ स्थानों पर व्यापारी द्रव्यकोष अर्थात तिजोरी का पूजन करते हैं । पहले साधना के एक अंग के रूप में ही व्यापारीवर्ग इस दिन द्रव्यकोष का पूजन करते थे । उसके परिणामस्वरूप श्री लक्ष्मीदेवी की कृपा से धनार्जन तथा उसका विनियोग उचित ढंग से करना संभव होता है । इस प्रकार व्यापारी वर्ग के लिए वैश्य वर्ण साधना के द्वारा व्यापारी वर्ग के लिए साधना कर अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर होना संभव हो पाता है । धनत्रयोदशी के दिन विशेषकर स्वर्ण अथवा चांदी के नए बरतन अथवा नए वस्त्राभूषण खरीदे जाते हैं । उसके कारण पूरे वर्ष घर में श्री धनलक्ष्मी वास करती हैं । धनत्रयोदशी के दिन अपनी संपत्ति का हिसाब (लेखा-जोखा) कर शेष संपत्ति ईश्वरीय कार्य हेतु अर्थात सत्कार्य के लिए अर्पण करने के कारण श्री धनलक्ष्मी अंत तक टिकी रहती हैं ।
धन्वंतरि जयंती
धनत्रयोदशी का दिन धन्वंतरि जयंती के नाम से भी प्रचलित है । समुद्रमंथन के समय अमृतकलश हाथ में लेकर देवताओं के वैद्य भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे । उसके कारण यह दिन भगवान धन्वंतरि के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है । आयुर्वेद के विद्वान एवं वैद्यगण भगवान धन्वंतरि का पूजन करते हैं । लोगों को दीर्घायु एवं स्वास्थ्यलाभ हो; इसके लिए मंगलकामना की जाती है । इस दिन नीम के पत्तों से बनाया गया प्रसाद सेवन करने का विशेष महत्त्व है ।
नीम का प्रसाद !
नीम की उत्पत्ति अमृत से हुई है । धन्वंतरि अमृत के दाता हैं; उसके कारण इसके प्रतीक के रूप में धन्वंतरि जयंती के दिन नीम के पत्तों से बनाया प्रसाद सभी में वितरित किया जाता है ।
– श्री. रमेश शिंदे, राष्ट्रीय प्रवक्ता, हिन्दू जनजागृति समिति
दीपावली के अवसर पर बनाई जानेवाली सात्त्विक रंगोलीश्री लक्ष्मीदेवी तत्त्व : ११ बिंदु, ११ पंक्तियां ![]() रंगोलियों के लिए देखें सनातन का लघुग्रंथ ‘सात्त्विक रंगोलियां’ |
नरक चतुर्दशी !

नरकासुर के वध के उपलक्ष्य में आनंदोत्सव !
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (२० अक्टूबर) (शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण १४) को ‘नरक चतुर्दशी’ कहते हैं । इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने सभी को कष्ट पहुंचानेवाले नरकासुर का संहार किया; इसीलिए इस तिथि का नाम ‘नरक चतुर्दशी’ पडा । मरते समय नरकासुर ने भगवान से वर मांगा कि उसका मृत्युदिवस सर्वत्र दीप प्रज्वलित कर मनाया जाए तथा इस दिन जो व्यक्ति मंगलस्नान करेगा, उसे नरक की पीडा न हो ! इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने उसे ‘तथास्तु’ कहा । तभी से दीप प्रज्वलित कर भगवान श्रीकृष्ण का विजयोत्सव तथा नरकासुर का वध मनाया जाता है । नरकासुर का वध होने से इस दिन सूर्योदय से पूर्व मंगलस्नान तथा दीप प्रज्वलित कर आनंदोत्सव मनाने की प्रथा प्रचलित हुई ।
नरक चतुर्दशी के दिन घर में किए जानेवाले धार्मिक कृत्य !
इस दिन पूजाघर के सभी देवताओं को पंचामृत से स्नान एवं अभिषेक कर, इत्र लगाते हैं तथा सूर्याेदय से पूर्व देवतापूजन किया जाता है । देवताओं को मीठे पदार्थाें का भोग लगाकर प्रातःकाल ही दीप प्रज्वलित किए जाते हैं । सर्वत्र सुख एवं समृद्धि आए; इसके लिए आंगन में दो, तुलसीजी के सामने एक, पानी के पास एक तथा देवता के सामने एक दीप प्रज्वलित करने की परंपरा है । इस दिन झाडू एवं नमक की भी पूजा की जाती है; क्योंकि इन दोनों को श्री लक्ष्मीदेवी का अंश मानते हैं । ‘जहां स्वच्छता होती है, वहां लक्ष्मीजी का वास होता है !’ इसके कारण दीपावली से पूर्व घर की स्वच्छता करने के उपरांत श्री लक्ष्मीपूजन कर लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने की परंपरा है ।
कभी-कभी इस दिन अमावस्या होने से पितृतर्पण भी किया जाता है । एक दीप पूर्वजों के लिए प्रज्वलित कर दोपहर के भोजन के समय कौआ, गाय एवं कुत्ते को भोग अर्पण किया जाता है ।
आनंदोत्सव का आरंभ !
नरक चतुर्दशी के दिन नए कपडे पहनकर संबंधियों से मिलकर उन्हें अल्पाहार के लिए आमंत्रित कर उनका आतिथ्य किया जाता है । पिछले कुछ वर्षाें से ‘दिवाली प्रभात’ के नाम से सुरीले गानों का कार्यक्रम संपन्न होता है । पटाखे, आतिशबाजी, रंग-रंगोलियां, मिठाई, आनंद तथा ठंड के वातावरण में दीपावली की रोचकता और भी अधिक बढती जाती है ।
आइए, इस दीपावली के अवसर पर हम दीपावली के रंग एवं स्पर्श का अनुभव करें तथा हमारे अंदर तथा बाहर के नरकासुर की दुष्ट प्रवृत्ति को रौंद डालने का प्रयास करें, जिससे प्रतिदिन आनंद, मंगल तथा चैतन्यपूर्ण हो सके ।
(साभार : दैनिक ‘लोकमत’)
लक्ष्मीपूजन

कार्तिक अमावस्या (२१ अक्टूबर) : इस दिन प्रातःकाल मंगलस्नान कर देवतापूजन, दोपहर में पार्वणश्राद्ध एवं ब्राह्मण-भोजन और संध्याकाल में (प्रदोषकाल में) फूल-पत्तों से सुशोभित मंडप में लक्ष्मी, श्रीविष्णु एवं कुबेर की पूजा की जाती है ।
- लक्ष्मीपूजन करते समय एक चौकी पर अक्षत से अष्टदल कमल अथवा स्वस्तिक बनाकर उस पर लक्ष्मी की मूर्ति की स्थापना करते हैं । कहीं-कहीं कलश पर ताम्रपात्र रखकर उसपर लक्ष्मी की मूर्ति की स्थापना करते हैं । लक्ष्मी के समीप ही कलश पर कुबेर की प्रतिमा रखते हैं । उसके पश्चात लक्ष्मी इत्यादि देवताओं को लौंग, इलायची एवं शक्कर डालकर बनाए गए गाय के दूध से बने खोये का भोग चढाते हैं । धनिया, गुड, धान की खीलें, बताशा इत्यादि पदार्थ लक्ष्मी को चढाते हैं, तत्पश्चात इष्ट-मित्रों में बांटते हैं ।
- अमावस्या : शरद ऋतु के आश्विन मास की पूर्णिमा तथा यह अमावस्या भी कल्याणकारी है ।
(संदर्भ – सनातन का ग्रंथ ‘त्योहार मनाने की उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’)
बलि प्रतिपदा (दीपावली पडवा) कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (२२ अक्टूबर)

१. महत्त्व
यह साढे तीन मुहूर्तों में से अर्ध मुहूर्त है । इसे ‘विक्रम संवत’ कालगणना के वर्षारम्भ दिन के रूप में मनाया जाता है ।
२. त्योहार मनाने की पद्धति
अ. बलि प्रतिपदा के दिन जमीन पर पंचरंगी रंगोली द्वारा बलि एवं उनकी पत्नी विंध्यावली के चित्र बनाकर उनकी पूजा करते हैं । इसके पश्चात बलिप्रीत्यर्थ दीप एवं वस्त्र का दान करते हैं । इस दिन प्रातःकाल अभ्यंगस्नान करने के उपरान्त स्त्रियां अपने पति की आरती उतारती हैं । दोपहर में ब्राह्मणभोजन एवं मिष्टान्नयुक्त भोजन बनाती हैं ।
आ. धर्मशास्त्र कहता है कि ‘बलिराज्य में शास्त्र द्वारा बताए निषिद्ध कर्म छोडकर, लोगों को अपने मनानुसार आचरण करना चाहिए ।’ अभक्ष्यभक्षण, अपेयपान (निषिद्ध पेय का सेवन) एवं अगम्यागमन (उस स्त्री से शरीरसंबंध रखना जिसके साथ शरीरसंबंध निषिद्ध है ।); ये निषिद्ध कर्म हैं । इसीलिए इन दिनों लोग मदिरा नहीं पीते; परंतु पटाखे का बारूद उडाते हैं (आतिशबाजी करते हैं) ! शास्त्रों से स्वीकृति प्राप्त होने के कारण परम्परा नुसार लोग मौजमस्ती करते हैं ।
इ. इस दिन गोवर्धनपूजा करने की प्रथा है । गोबर का पर्वत बनाकर उस पर दूर्वा एवं पुष्प डालते हैं । इनके समीप कृष्ण, इन्द्र, गाएं, बछडों के चित्र सजाकर उनकी भी पूजा करते हैं एवं शोभायात्रा निकालते हैं ।
इस दिन प्रातःकाल अभ्यंगस्नान करने पर स्त्रियां पति की आरती उतारती हैं । पुरुष शिव का एवं स्त्री दुर्गादेवी का प्रतीक है । आरती उतारने से पत्नी में दुर्गातत्त्व कार्यान्वित होता है एवं पति की आरती उतारने के उपरांत उसकी कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर उसमें सुप्तावस्था में विद्यमान शिवतत्त्व प्रकट होता है ।
(संदर्भ – सनातन का ग्रंथ ‘त्योहार मनाने की उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’)
भैयादूज (यमद्वितीया) कार्तिक शुक्ल द्वितीया (२३ अक्टूबर)

१. इतिहास
इस दिन यम अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने गए थे, इसलिए इस दिन को यमद्वितीया कहते हैं ।
२. महत्त्व
अ. अकाल मृत्यु को टालने हेतु धनत्रयोदशी, नरकचतुर्दशी एवं यमद्वितीया के दिन मृत्यु के देवता, ‘यमधर्म’ का पूजन करते हैं ।
आ. ‘इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने जाते हैं एवं उस दिन नरक में सड रहे जीवों को वह उस दिन के लिए मुक्त करते हैं ।’
इ. बहन द्वारा भाई की आरती उतारी जाना : इस दिन भाई बहन के पास जाए और बहन उसकी आरती उतारे । ‘इस दिन किसी भी पुरुष को अपने घर पर अथवा अपनी पत्नी के हाथ का अन्न नहीं खाना चाहिए । इस दिन उसे अपनी बहन के घर वस्त्र, आभूषण आदि लेकर जाना चाहिए और उसके घर भोजन करना चाहिए । सगी बहन न हो, तो किसी भी बहन के पास या अन्य किसी भी स्त्री को बहन मानकर उसके यहां भोजन करना चाहिए ।’
भैयादूज के दिन बहन द्वारा भाई की आरती उतारने पर होनेवाले सूक्ष्म स्तरीय परिणाम
१. भैयादूज के दिन अपने भाई की आरती उतारते समय उसमें वात्सल्यभाव कार्यरत रहता है ।
२. भैयादूज के दिन जब बहन भाई की आरती उतारती है, तब भाई के श्वासोच्छवास से उसकी देह में तेजतत्त्व के कण प्रवाहित होते हैं, जिससे उसकी आयु बढती है और शरीर के सर्व ओर सुरक्षा-कवच निर्मित होता है ।
३. जब बहन भाई की आरती उतारती है, तब उसमें विद्यमान अप्रकट अवस्था के शक्तिस्पंदन, प्रकट स्वरूप में कार्यरत होते हैं । तत्पश्चात उसका प्रक्षेपण भाई की दिशा में होता है, जिससे भाई को कार्यशक्ति प्राप्त होती है ।
४. भैयादूज के दिन भाई को बहन के घर बहन के हाथ से बना भोजन करना चाहिए । इससे भाई-बहन के बीच सांसारिक (माया के नाते से निर्मित) लेन-देन घटता है ।’
– श्रीमती प्रियांका गाडगीळ

Sri Mahakaleshwar Temple : मंदिर के पास ४७२ करोड रुपये की सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट) तथा ३०० करोड रुपये मूल्य का स्वर्ण-रजत !
Shri Rammandir Ayodhya : श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पद के लिए १८ जुलाई तक आवेदन आमंत्रित
Sassoon General Hospital Pune : पुणे के ‘ससून सर्वोपचार चिकित्सालय’ में ईसाई धर्म का प्रचार करनेवाले दंपति पर अपराध पंजीकृत ।
Chhattisgarh High Court : ‘हिन्दू एक गाली है, जिसका अर्थ चोर, डाकू, लुटेरा तथा गुलाम होता है’ ऐसा कहने वाले ईसाई संगठन के ११ लोगों के विरुद्ध प्रविष्ट अपराध निरस्त नहीं होगा ।
आंध्रप्रदेश – उपद्रवी व्यक्ति ने शिवलिंग के सामने के दीप से सिगरेट जलाई।
जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज की पालकी का भक्तिमय वातावरण में देहू से प्रस्थान !