नेपाल में हुआ विद्रोह, हिन्दू राष्ट्र की मांग तथा संवैधानिक व्यवस्था !

नेपाल में ‘जेन-जी’ द्वारा (वर्ष १९९६ से वर्ष २०१० की अवधि में जन्मी पीढी) किए गए हिंसक आंदोलन के कारण उठा तूफान अब शांत हो चुका है । क्या नेपाल पर इस आंदोलन के दूरगामी परिणाम होंगे ? इस विषय में वर्तमान में वहां के स्थानीय मान्यवर भी कुछ नहीं बतासकते । नेपाल के आंदोलन के विषय में वहां के स्थानीय लोगों से किए गए संवाद से वहां की स्थिति तथा आंदोलन के कारणों की जो जानकारी मिली है, उसे हम पाठकों के लिए दे रहे हैं ।

१. नेपाल की परिस्थिति

श्री. यज्ञेश सावंत

नेपाल में बहुत पहले से राजशाही कार्यरत थी, अर्थात राजाप्रधान व्यवस्था थी । उसमें राजा सत्ता के केंद्र में था । वर्ष २००६ में साम्यवादियों ने वहां विद्रोह किया तथा राजशाही को अनावश्यक, नेपाल के विकास में बाधक तथा अन्यायकारक बताकर वहां तख्तापलट किया गया । उससे पूर्व भी माओवादियों ने नेपाल में विद्रोह किए हैं । उसके उपरांत अर्थात वर्ष २००८ से लगभग १७ वर्ष तक लोकतांत्रिक व्यवस्था अर्थात लोकतंत्र का अस्तित्व था । इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में १४ बार सरकारें गिरीं अर्थात एक भी सरकार अपना ५ वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई । इन सरकारों के गिरने के कुछ कारण हैं, बडे स्तर पर चलनेवाले भ्रष्टाचार, एक-दूसरे के विरुद्ध राजनीतिक कूटनीतियां अपनाना, दल से किया जानेवाला आंतरिक विरोध तथा एक-दूसरे के प्रति अविश्वास ! इसका अर्थ नेपाल के विकास के लिए राजशाही को बाधा बताकर उसे गिराया गया तथा नेपाल से हिन्दू राष्ट्र की श्रेणी हटा दी गई । जिन पर कपटी, धूर्त एवं क्रूर जैसे विशेषण लागू होते हैं, ऐसे साम्यवादी राज्यकर्ता अपनी सत्ता का कार्यकाल पूरा करने में भी असफल रहे । ऐसी अस्थिर सरकारें नेपाल को कभी भी एक स्थिर एवं शाश्वत सुविधाएं नहीं दे सकीं । नेपाल में बेरोजगारी एवं महंगाई चरम सीमा पर थी । नेपाल के युवकों को अन्य देशों में नौकरी के लिए जाना पडता है । भारत में अभी भी नेपाली गोरखा तथा पहरेदार आ ही रहे हैं । केवल इतना ही नहीं, अपितु महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में आम के बागानों में काम करने के लिए तथा बीते दशक में समुद्र में किए जानेवाले मछली पकडने के काम में भी नेपाली भरे पडे हैं । लगभग २० सहस्र से अधिक नेपाली कोंकण समुद्रतट पर मछुआरों के साथ काम करते हैं, जबकि उससे अधिक नेपाली आम के बागानों में काम करते हैं । उनके पास बडे प्रतिष्ठान, व्यवसाय तथा अनेक लोगों के पास खेती भी नहीं है । इसलिए वे ऐसे कामों के लिए भारत आते हैं । एक बार कोई पहरेदार भारत आता है, तो धीरे-धीरे वह अपने पूरे परिवार को ही भारत ले आता है । इसे इतने विस्तार से बताने का कारण यह है कि पाठकों को नेपाल की आर्थिक स्थिति समझ में आए । इससे ध्यान में आता है कि वहां का युवा वर्ग कितनी समस्याएं झेल रहा है ।

‘नेपोबेबीज’ क्या है ?

नेपाल के जेन-जी आंदोलन में आंदोलनकारियों के हाथ में अनेक बार ‘नेपोबेबीज’ लिखी तख्तियां दिखाई दीं । ये नेपोबेबीज अर्थात सत्ता में आसीन मंत्रियों एवं जनप्रतिनिधियों के बच्चे ! सामाजिक माध्यमों में नेपोबेबीज के नाम से इन बच्चों के अनेक वीडियो प्रसारित किए गए । इन वीडियोज में ये बच्चे किस प्रकार के आरामदायक तथा विलासी जीवन जीते हैं, वहां वे कैसे मौज मना रहे हैं; यह दिखाया गया । इसका अर्थ एक ओर नेपाल में युवकों के रोजगार का कोई साधन न होने के कारण अन्य देशों में नौकरी के लिए जाना पडता है । इसके विपरीत, जनप्रतिनिधियों के बच्चे पैसा उडाते हुए तथा मजे लेते हुए दिखाई दिए । इसलिए सर्वसामान्य नेपाली युवक और भी आक्रोशित हुए ।

– श्री. यज्ञेश सावंत

२. आंदोलन में असंगठित गुटों का सहभाग

नेपाल में हुए आंदोलन में अनेक असंगठित गुट तथा युवकों के गुट सहभागी थे । भ्रष्टाचार के कारण लोगों में असंतोष था । भ्रष्टाचार को नियंत्रण में लाने हेतु किसी प्रकार के प्रयास नहीं किए गए । पुलिस द्वारा आंदोलनकारियों पर गोलीबारी किए जाने से यह आंदोलन और भडक गया । एक ओर भ्रष्टाचार तथा उसमें भी नेपाल सरकार द्वारा सामाजिक माध्यम बंद किए जाने से युवकों में क्षोभ और बढा । नेपाल के ‘नया पत्रिका’ दैनिक के राजनीति ब्यूरो प्रमुख श्री. पर्शुराम काफ्ले ने बताया, ‘अनेक युवक-युवतियां ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं । जब वे काम के लिए राजधानी काठमांडू चले आते हैं, उस समय उन्हें अपने परिवार से संपर्क बनाए रखने के लिए केवल सामाजिक माध्यम ही शेष रह जाता है । उसी को बंद करने से कुल मिलाकर उनका अपने परिवार के साथ संपर्क लगभग टूट सा गया । सडक पर सहस्रों युवकों की भीड इकट्ठी हो गई ।’ परंतु ये युवक इतनी बडी संख्या में आए कहां से ?, यह तो अब तक रहस्य ही बना रहा है । नेपाल में बडे स्तर पर आगजनी तथा तोडफोड हुई, यह सत्य है । युवकों की इस भीड में अनेक असामाजिक तत्त्व भी घुस आए थे । इन असामाजिक तत्त्वों ने ही आगजनी तथा तोडफोड की, ऐसी जानकारी सामने आई है । पूर्व प्रधानमंत्री खनाल की पत्नी को जिंदा जला दिए जाने के समाचार थे; परंतु वे जीवित हैं । एक मंत्री को तालाब में ढकेलकर उस पर पत्थर बरसाए जाने का वीडियो भी झूठा है । सरकार की ओर से नेपाल की सेना को विलंब से आदेश दिए गए; परंतु उसके उपरांत सेना ने कार्रवाई कर असामाजिक तत्त्वों को बंदी बनाया तथा इसमें युवकों के जो गुट थे, उनकी मांगें जानकर उनके साथ बातचीत की । इस परिवर्तन के कारण नेपाल के लोग कुछ सीमा तक संतुष्ट हैं । नेपाल के लोग संघराज व्यवस्था पर अप्रसन्न हैं । जनता की यह इच्छा है कि अच्छे लोग सामने आकर नेपाल में राज चलाएं ।

३. नेपाल एवं बांग्लादेश में हुए आंदोलन में अंतर !

अनेक लोग कहते हैं, बांग्लादेश एवं नेपाल में हुआ विद्रोह समान है । इस विषय में नेपाल के स्थानीय लोगों से बातचीत करने पर उन्होंने उनमें जो महत्त्वपूर्ण अंतर बताया, वह है बांग्लादेश में रक्तरंजित इस्लामी क्रांति आई, उससे एकाधिकार की व्यवस्था चली गई तथा उसके स्थान पर बांग्लादेश में उससे भी अधिक कट्टर एवं धर्मांध व्यवस्था स्थापित हुई । बांग्लादेश का विद्रोह रक्तरंजित था अर्थात मोहम्मद युनूस के कार्यकर्ताओं ने शेख हसीना के दल के अनेक नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को मार डाला । शेख हसीना लंबे समय तक सत्ता में रहीं । उनके राजनीतिक दल को छोडकर वहां अन्य किसी राजनीतिक दलों का अर्थात विपक्ष का अस्तित्व ही नहीं था । एक प्रकार से उन्होंने तानाशाही पद्धति से राज किया । उनकी सरकार का तख्तापलट करते समय हुई हिंसा का दंश वहां के हिन्दुओं को भी झेलना पडा तथा उसमें हिन्दुओं को भी बहुत बडी आर्थिक एवं जीव-हानि हुई । अमेरिका के ‘डीप स्टेट’ का प्रभाव तो वहां दिखाई देता ही है । (‘डीप स्टेट’ अर्थात सरकारी अधिकारियों एवं निजी संगठनों के मध्य का गुप्त जाल, जो किसी के लिए उत्तरदायी न होते हुए भी सरकारी नीतियों पर अपना प्रभाव डालता है ।)

नेपाल में हुए विद्रोह वहां की भ्रष्ट व्यवस्था को तोड डालने के लिए वहां के हिन्दुओं द्वारा किए गए विद्रोह थे । उसमें विगत १७ वर्षाें से सत्ता में रहे नेता तथा कुछ प्रमुख सरकारी संपत्तियों को लक्ष्य बनाया गया । नेपाल के विद्रोह में सर्वसामान्य लोगों की संपत्ति को हानि नहीं पहुंचाई गई, साथ ही किसी की हत्या भी नहीं की गई । एक पूर्व प्रधानमंत्री के घर में तलवार जैसा हथियार लेकर भीड घुस भी गई थी; परंतु उस भीड ने मात्र उन्हें भय दिखाया, आक्रमण नहीं किया । यही है इस्लामी बांग्लादेश के मुसलमानों तथा नेपाल के हिन्दुओं के विद्रोह में अंतर । नेपाल में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, उन्होंने भी कुछ मात्रा में इस आंदोलन में भाग लिया; परंतु उन्होंने किसी की हत्या नहीं की । वैसे देखा जाए, तो नेपाल के मुसलमान नेपाली हिन्दुओं से डरते हैं; क्योंकि मुसलमानों ने यदि वहां कोई दंगा अथवा हिंसा फैलाने का प्रयास किया, तो नेपाली गोरखा समुदाय उनका अत्यंत आक्रामक प्रत्युत्तर करता है । कुछ वर्ष पूर्व स्थानीय विवाद के चलते आक्रोशित भीड ने एक बडी मस्जिद जलाई गई थी ।

(क्रमशः)

श्री गुरुचरणार्पणमस्तु ।

– श्री. यज्ञेश सावंत, सनातन संकुल, देवद, पनवेल. (२५.९.२०२५)