Gomata Sankalp Yatra Bihar : जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वतीजी की बिहार में ‘गोमाता संकल्प यात्रा !’

‘मतदान का अधिकार धर्म एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए उपयोग किया जाए,’ यह संदेश दिया जाएगा ।

बछडे को दुलारते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

वाराणसी – जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वतीजी बिहार में ‘गोमाता संकल्प यात्रा’ निकालेंगे । यह यात्रा १२ सितंबर, २०२५ को वाराणसी से आरंभ होकर बिहार के सीतामढी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर, गया, औरंगाबाद, रोहतास, भोजपुर, सारण, सिवान, गोपालगंज, चंपारण, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, खगडिया, मुंगेर, नालंदा जैसे लगभग सभी प्रमुख जिलों से गुजरेगी । इस यात्रा के माध्यम से यह संदेश दिया जाएगा कि ‘मतदान का अधिकार केवल व्यक्तिगत सुविधा के लिए नहीं, अपितु धर्म एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए उपयोग किया जाना चाहिए ।’

धर्म एवं राजनीति का वैदिक संगम !

इस यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए शंकराचार्य ने कहा कि आज राजनीति केवल सत्ता पाने का साधन बन गई है, जिसमें राष्ट्र की आत्मा या समाज की आध्यात्मिक चेतना प्रतिबिंबित नहीं होती । यह यात्रा हमें स्मरण दिलाती है कि धार्मिक राजनीति के बिना कोई भी देश दृढ नहीं हो सकता । भारतीय संस्कृति में ‘राष्ट्रमाता’ के रूप में पहचानी जानेवाली गोमाता को बचाने का संकल्प लिए बिना राजनीति केवल एक खोखली व्यवस्था ही रहेगी ।

गोमाता ही ‘राष्ट्रमाता’ !

भारतीय जीवन में गोमाता केवल एक प्राणी नहीं हैं, अपितु संपूर्ण सृष्टि के पोषण का प्रतीक हैं । वेदों में गोमाता को ‘अघन्या’ कहा गया है, जिसका अर्थ है जिसकी कभी हत्या न की जाए । आज जब आधुनिकता के तूफान ने संस्कृति को उखाड फेंकने का प्रयास किया है, तब यह यात्रा घोषित करती है कि ‘गाय ही राष्ट्रमाता है’ । यह केवल गोवंश की रक्षा का अभियान नहीं है, अपितु धर्मराज्य की पुनर्स्थापना की तैयारी है । ‘गोमाता संकल्प यात्रा’ केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं है, अपितु यह राष्ट्रीय पुनरुत्थान का आह्वान है । यह यात्रा हमें स्मरण दिलाती है कि भारत की आत्मा धर्म में निवास करती है, तथा धर्म का आधार ‘गोमाता’ हैं । यदि देश को दृढ, आत्मनिर्भर एवं सांस्कृतिक दृष्टि से पुनर्जीवित करना है, तो गोमाता को राष्ट्रमाता का स्थान देना होगा ।