श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळजी के कक्ष में स्थित देवताओं की मूर्तियों में हुए परिवर्तन तथा उनके कक्ष के विषय में प्रतीत हुए सूत्र

‘सेवा के उपलक्ष्य में मैं अनेक बार श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी के कक्ष में जाती रहती हूं । उनके कक्ष में एक पटल (टेबल) पर श्रीकृष्ण की काष्ठ (लकडी) की मूर्ति एवं गुरुपादुकाएं हैं, साथ ही दूसरे पटल पर श्री कालभैरव का दंड, देवी के मारक रूप की एक मूर्ति, श्री गणेश की दो मूर्तियां, श्री कार्तिकेय आदि देवताओं की मूर्तियां हैं । इन सभी मूर्तियों का निरीक्षण करते समय कुछ मूर्तियों में मुझे प्रतीत हुए परिवर्तन यहां दिए हैं ।

श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ

१. कक्ष में स्थित मूर्तियों में प्रतीत हुए परिवर्तन

१ अ. श्रीकृष्ण के मूर्ति की चमक बढी हुई प्रतीत होना : श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी के कक्ष में स्थित श्रीकृष्ण की मूर्ति अधिक हंसमुख तथा मूर्ति में चमक बढी हुई प्रतीत होती है । मूर्ति की ओर देखने पर आंखें एवं मुखमंडल के भाव हमें आकर्षित करते हैं । उसके कारण मूर्ति की ओर देखते ही रहने का मन करता है ।

१ आ. देवी की मूर्ति

१ आ १. देवी का रूप मारक होते हुए भी कभी-कभी वह प्रेम भरा एवं तारक लगना : इस मूर्ति में काल के अनुसार आवश्यक शक्ति प्रतीत होती है । देवी का मुख रक्तरंजित लाल रंग का है । उन्होंने जीभ बाहर निकाली है । ‘बडी-बडी आंखें, गले में मुंडमाला (खोपडी की माला) तथा लंबे खुले केश’, इस प्रकार देवी का रूप है । देवी का रूप मारक होते हुए भी वह रूप कभी-कभी प्रेम भरा एवं तारक लगता है ।

१ आ २. देवी का रूप कभी तारक एवं कभी मारक प्रतीत होने की कारणमीमांसा : एक बार मेरे मन में यह विचार आया, ‘देवी असुरों का संहार करती हैं, वैसे ही श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी साधकों के स्थूल एवं सूक्ष्म अहंकार का संहार करती हैं । हम श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी की प्रीति अनुभव करते हैं, साथ ही वे साधकों को उनके तीव्र स्वभावदोष एवं अहं के कारण उनसे होनेवाली गंभीर चूकों का भी उतनी ही कठोरता से भान कराती हैं । इस कठोरता में भी प्रीति ही होती है । ‘चूकों के कारण साधकों की साधना का व्यय न हो’, यह उनका विचार होता है । उसके कारण ‘मुझे देवी का रूप कभी मारक, तो कभी तारक प्रतीत होता है’, ऐसा लगा ।

१ आ ३. श्री कालभैरव का दंड : यह दंड पहले आश्रम परिसर में बने छोटे मंदिर में स्थापित किया था; परंतु इस परिसर की रचना में परिवर्तन करने के उपरांत यह दंड अब श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी के कक्ष में रखा है; क्योंकि ‘इस दंड को रखने के लिए यही उचित स्थान है’, ऐसा संतों ने बताया है ।

सुश्री मेघा चव्हाण

२. श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी के कक्ष के विषय में प्रतीत हुए सूत्र

दिन-रात कार्यरत श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी का कक्ष रणक्षेत्र (युद्धभूमि) है । यहां सुर-असुर का सूक्ष्म से युद्ध होता रहता है । इसके कारण श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी को ‘गला सूखना तथा अंदर से बहुत गर्मी प्रतीत होना’ जैसे कष्ट होते हैं । इस गर्मी के कारण उन्हें ठंड के मौसम में भी ठंडा पानी अथवा शरबत पीना पडता है ।

२ अ. साधकों को साधना के लिए ऊर्जा मिलना : यह कक्ष साधकों को सत्संग एवं चैतन्य प्रदान करनेवाला कक्ष है । मैं यदि कभी हताश हो जाती हूं अथवा सेवा की गति धीमी पड जाती है, तो मैं कुछ क्षणों के लिए इस कक्ष में जाती हूं, उसके उपरांत मुझे उत्साह प्रतीत होता है तथा सेवा की गति बढती है । सेवा के उपलक्ष्य में उनके कक्ष में जानेवाली हम अनेक साधिकाओं ने अनेक बार यह अनुभव किया है । ‘उनके द्वारा प्रदान की जानेवाली ऊर्जा के कारण ही हम सेवा कर पाते हैं’, यह हम नित्य अनुभव करते हैं ।

२ आ. कक्ष में जाने पर अपनेआप हमारा नामजप आरंभ हो जाता है ।

२ इ. कक्ष के बाहर तथा कक्ष में भिन्नता प्रतीत होती है ।’

– सुश्री मेघा चव्हाण, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (२.१०.२०२३)

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी के प्रति दर्शाया विश्वास

‘एक बार ऐसे ही बात करते समय श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी ने बताया, ‘‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी ने इनमें से श्री गणेश की मूर्ति मुझे तथा श्री कार्तिकेय की मूर्ति श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी को दी है । उस पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने कहा, ‘‘श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी निरंतर भ्रमण पर होती हैं । उसके कारण इस मूर्ति की पूजा करना तथा उसकी देखभाल करना उनके लिए कठिन होगा; इसलिए उसे हम श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी के कक्ष में रखेंगे । इसके लिए आश्रम में इससे अधिक उचित स्थान कौनसा होगा ?’’
– सुश्री मेघा चव्हाण, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२.१०.२०२३)

नेतृत्व गुण के अनेक पहलुओं से युक्त श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी

श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी ने साधना के आरंभ में अनेक दायित्व की सेवाएं समर्थता और सहजता से की हैं । अब वे सभी साधकों का साधना संबंधी मार्गदर्शन करती हैं । वे अत्यंत संयम, वात्सल्य भाव, तत्त्वनिष्ठा और आध्यात्मिक स्तर पर साधकों को तैयार कर रही हैं ।

इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । – संपादक

सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।