महर्षियों ने नाडीपट्टिकाओं के माध्यम से श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के अवतारी कार्य का ध्यान दिलाया । सामान्य व्यक्तियों को बिना बताए किसी जीव का अवतारत्व समझ में नहीं आता, साधकों के संदर्भ में भी ऐसा ही हुआ । महर्षियों के बताए जाने पर साधकों को इन दोनों के विषय में अनुभूतियां होने लगीं । ‘वे दोनों अवतारी जीव हैं’, स्थूल से यह किस प्रकार ध्यान में आ सकता है, यहां इसकी संक्षेप में जानकारी देखते हैं । अवतारी जीव को समझ पाना अधिकतर बुद्धि से परे अर्थात सूक्ष्म से संबंधित होता है ।

१. बडी सहजता से एक ही समय अनेक सेवाएं करना संभव होना, साथ ही बडी सहजता से कठिन सेवाएं करना भी संभव होना :
नौकरी में किसी व्यक्ति को यदि अनेक कामों का दायित्व सौंपा जाए, तो वह तनावग्रस्त हो जाता है । उसे लगता है ‘निहित समय में मैं इतने सभी काम कैसे पूरे कर पाऊंगा ?’ इस विचार से वह असहाय तथा तनावग्रस्त हो जाता है । घर के अनेक काम करते समय भी उसकी स्थिति दयनीय हो जाती है । वह उसे असंभव लगता है तथा वह चिंता में पड जाता है; परंतु इसके विपरीत श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी, इन दोनों पर अनेक सेवाओं का दायित्व होते हुए भी उन्हें किसी बात की चिंता नहीं होती । वे दोनों बडी सहजता से सभी सेवाएं करती हैं, साथ ही वे सभी सेवाएं परिपूर्ण तथा ‘सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्’ पद्धति से करती हैं । पहले कभी न की हुई सेवा हो अथवा कोई कठिन सेवा करनी हो, वे उसे बिना डगमगाए बडी सहजता से कर लेती हैं । इसका एक उदाहरण यह है कि महर्षियों ने अल्पावधि में आश्रम परिसर में श्री सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण करने के लिए कहा था । उस समय आवश्यक सभी सामग्री मिलना कठिन था । ऐसी असंभव-सी लगनेवाली स्थिति में भी श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी द्वारा दी गई सूचनाओं के अनुसार सेवा करने पर महर्षियों द्वारा निर्धारित की गई समयसीमा में श्री सिद्धिविनायक मंदिर का असंभव-सा लगनेवाला निर्माणकार्य पूरा करना संभव हो पाया ।

२. सेवाओं के संदर्भ में मार्गदर्शन की आवश्यकता न पडना :
श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी को सेवाओं के संदर्भ में मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं पडती । अवतारी जीव होने से उनके मन में प्रकट होनेवाले विचार ईश्वरीय विचार होते हैं तथा उसके कारण वे उचित ही होते हैं । ईश्वरीय विचार ग्रहण होने से वे दोनों अन्यों का मार्गदर्शन कर सकती हैं । एक बार श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के पास गई थीं । वे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी से साधना से संबंधित कुछ सूत्र पूछ रही थीं । उस समय सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने उनसे कहा, ‘‘अब आप स्वयंपूर्ण हैं; इसलिए अब मुझे पूछने की आवश्यकता नहीं है ।’’
श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी वर्ष २०१२ से केवल पूरे भारत में ही नहीं, अपितु पूरे विश्व का भ्रमण कर रही हैं । उन्होंने इस कार्य के द्वारा विशेषतापूर्ण बातों का चित्रीकरण, शोधकार्य, संस्कृति संवर्धन, विभिन्न कलाओं का संरक्षण, भेंटवार्ता करना जैसी विभिन्न सेवाएं की हैं । उन्होंने पूरे भारतवर्ष के संतों तथा विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों को सनातन संस्था से जोड लिया है । महर्षियों के बताए अनुसार उन्होंने पर्वत एवं खाईयों में जाकर पूरे भारतवर्ष के मंदिर, पवित्र स्थल तथा ऋषियों के स्थानों के दर्शन किए हैं । उन्होंने चारपहिया वाहन से अब तक ७ लाख किलोमीटर से अधिक की यात्रा की है, साथ ही विमानयात्रा भी की है । पूरे दिन में अनेक घंटों की यात्रा करने के उपरांत तथा खान-पान की असुविधा होने तथा धूप में घूमने पर भी उनका चेहरा कभी मलिन दिखाई नहीं देता, इसके विपरीत उनका मुखमंडल सदैव चमकीला ही दिखाई देता है । वास्तव में एक महिला के लिए पूरे भारत का भ्रमण कर हिन्दू संस्कृति एवं कला का ज्ञान प्राप्त करना बहुत ही कठिन है; परंतु चैतन्य के बल पर ही यह सब संभव हो पाता है ! चैतन्य का निरंतर कार्यरत होना देवत्व का (अवतारत्व का) लक्षण है ।
– (सद्गुरु) डॉ. मुकुल गाडगीळ, पी.एच.डी., महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (२६.९.२०२४)
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