‘श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी, ये दोनों अवतारी जीव हैं’, स्थूल से यह किस प्रकार ध्यान में आ सकता है, इसकी संक्षिप्त जानकारी

महर्षियों ने नाडीपट्टिकाओं के माध्यम से श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के अवतारी कार्य का ध्यान दिलाया । सामान्य व्यक्तियों को बिना बताए किसी जीव का अवतारत्व समझ में नहीं आता, साधकों के संदर्भ में भी ऐसा ही हुआ । महर्षियों के बताए जाने पर साधकों को इन दोनों के विषय में अनुभूतियां होने लगीं । ‘वे दोनों अवतारी जीव हैं’, स्थूल से यह किस प्रकार ध्यान में आ सकता है, यहां इसकी संक्षेप में जानकारी देखते हैं । अवतारी जीव को समझ पाना अधिकतर बुद्धि से परे अर्थात सूक्ष्म से संबंधित होता है ।

सनातन के ३ गुरु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी, श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी

१. बडी सहजता से एक ही समय अनेक सेवाएं करना संभव होना, साथ ही बडी सहजता से कठिन सेवाएं करना भी संभव होना :

नौकरी में किसी व्यक्ति को यदि अनेक कामों का दायित्व सौंपा जाए, तो वह तनावग्रस्त हो जाता है । उसे लगता है ‘निहित समय में मैं इतने सभी काम कैसे पूरे कर पाऊंगा ?’ इस विचार से वह असहाय तथा तनावग्रस्त हो जाता है । घर के अनेक काम करते समय भी उसकी स्थिति दयनीय हो जाती है । वह उसे असंभव लगता है तथा वह चिंता में पड जाता है; परंतु इसके विपरीत श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी, इन दोनों पर अनेक सेवाओं का दायित्व होते हुए भी उन्हें किसी बात की चिंता नहीं होती । वे दोनों बडी सहजता से सभी सेवाएं करती हैं, साथ ही वे सभी सेवाएं परिपूर्ण तथा ‘सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्’ पद्धति से करती हैं । पहले कभी न की हुई सेवा हो अथवा कोई कठिन सेवा करनी हो, वे उसे बिना डगमगाए बडी सहजता से कर लेती हैं । इसका एक उदाहरण यह है कि महर्षियों ने अल्पावधि में आश्रम परिसर में श्री सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण करने के लिए कहा था । उस समय आवश्यक सभी सामग्री मिलना कठिन था । ऐसी असंभव-सी लगनेवाली स्थिति में भी श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी द्वारा दी गई सूचनाओं के अनुसार सेवा करने पर महर्षियों द्वारा निर्धारित की गई समयसीमा में श्री सिद्धिविनायक मंदिर का असंभव-सा लगनेवाला निर्माणकार्य पूरा करना संभव हो पाया ।

सद्गुरु डॉ. मुकुल गाडगीळजी

२. सेवाओं के संदर्भ में मार्गदर्शन की आवश्यकता न पडना :

श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी को सेवाओं के संदर्भ में मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं पडती । अवतारी जीव होने से उनके मन में प्रकट होनेवाले विचार ईश्वरीय विचार होते हैं तथा उसके कारण वे उचित ही होते हैं । ईश्वरीय विचार ग्रहण होने से वे दोनों अन्यों का मार्गदर्शन कर सकती हैं । एक बार श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के पास गई थीं । वे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी से साधना से संबंधित कुछ सूत्र पूछ रही थीं । उस समय सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने उनसे कहा, ‘‘अब आप स्वयंपूर्ण हैं; इसलिए अब मुझे पूछने की आवश्यकता नहीं है ।’’

श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी वर्ष २०१२ से केवल पूरे भारत में ही नहीं, अपितु पूरे विश्व का भ्रमण कर रही हैं । उन्होंने इस कार्य के द्वारा विशेषतापूर्ण बातों का चित्रीकरण, शोधकार्य, संस्कृति संवर्धन, विभिन्न कलाओं का संरक्षण, भेंटवार्ता करना जैसी विभिन्न सेवाएं की हैं । उन्होंने पूरे भारतवर्ष के संतों तथा विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों को सनातन संस्था से जोड लिया है । महर्षियों के बताए अनुसार उन्होंने पर्वत एवं खाईयों में जाकर पूरे भारतवर्ष के मंदिर, पवित्र स्थल तथा ऋषियों के स्थानों के दर्शन किए हैं । उन्होंने चारपहिया वाहन से अब तक ७ लाख किलोमीटर से अधिक की यात्रा की है, साथ ही विमानयात्रा भी की है । पूरे दिन में अनेक घंटों की यात्रा करने के उपरांत तथा खान-पान की असुविधा होने तथा धूप में घूमने पर भी उनका चेहरा कभी मलिन दिखाई नहीं देता, इसके विपरीत उनका मुखमंडल सदैव चमकीला ही दिखाई देता है । वास्तव में एक महिला के लिए पूरे भारत का भ्रमण कर हिन्दू संस्कृति एवं कला का ज्ञान प्राप्त करना बहुत ही कठिन है; परंतु चैतन्य के बल पर ही यह सब संभव हो पाता है ! चैतन्य का निरंतर कार्यरत होना देवत्व का (अवतारत्व का) लक्षण है ।

– (सद्गुरु) डॉ. मुकुल गाडगीळ, पी.एच.डी., महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (२६.९.२०२४)