
पितृपक्ष की अमावस्या का यह नाम है । इस तिथि पर कुल के सर्व पितरों को उद्देशित कर श्राद्ध करते हैं । यदि कोई वर्षभर में सदैव (प्रत्येक मास में) श्राद्ध न कर पाए एवं उसके लिए पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर श्राद्ध करना सम्भव न हो, तब भी इस तिथि पर सबके लिए श्राद्ध करना अत्यन्त आवश्यक है; क्योंकि पितृपक्ष की यह अन्तिम तिथि है । धर्मशास्त्र में बताया गया है कि श्राद्ध के लिए अमावस्या की तिथि अधिक उचित है, जबकि पितृपक्ष की अमावस्या सर्वाधिक उचित तिथि है ।
इस दिन प्रायः सर्व घरों में न्यूनतम (कम से कम) एक ब्राह्मण को तो भोजन का निमन्त्रण दिया ही जाता है । उस दिन मछुआरे, ठाकुर, बुनकर, कुनबी इत्यादि जातियों में पितरों के नाम से भात का अथवा आटे का पिण्ड दिया जाता है और अपनी ही जाति के कुछ लोगों को भोजन कराया जाता है । इनमें इस दिन ब्राह्मणों को सीधा (अन्न सामग्री) देने की भी परम्परा प्रचलित है ।
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आंध्रप्रदेश – उपद्रवी व्यक्ति ने शिवलिंग के सामने के दीप से सिगरेट जलाई।
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