चातुर्मास

 ‘आषाढ माह के शुक्ल पक्ष की ‘देवशयनी’ एकादशी से कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की ‘देवउठनी’ एकादशी तक की चार महिने की अवधि को चातुर्मास माना जाता है । चातुर्मास में भजन, ध्यान, जप, स्वाध्याय (पाठ), मौन रहना एवं स्मरण करना अधिक हितकारी है ।

१. प्राप्त कीजिए तीर्थस्नान का फल !

    चातुर्मास में भगवान नारायण योगनिद्रा में शयन करते हैं, उससे पानी का प्रवाह सात्त्विक बन जाता है । तिल एवं जौ को पीसकर रखें । स्नान की बाल्टी के पानी में यह चुटकीभर मिश्रण डालें, साथ ही संभव हो, तो २-४ बेल की पत्तियां डालें । बेल की पत्तियां ७ दिन तक बासी नहीं मानी जातीं । ‘ॐ नमः शिवाय’ नामजप कर स्नान करने से तीर्थों में स्नान का फल मिलता है । उबटन में जौ एवं तिल हैं; इसलिए यह उबटन भी स्नान के लिए सुखदायी एवं आनंददायी होता है ।

२. चातुर्मास में क्या करना चाहिए तथा क्या नहीं करना चाहिए ?

अ. चातुर्मास में विवाहकार्य एवं सकाम कार्य वर्जित है । पति-पत्नी का कामभोग भी वर्जित है । इन दिनों में विषयविकार, परनिंदा, परान्न सेवन, पराया धन, परस्त्री तथा पराए पुरुष से दूरी बनाकर संयमित जीवन व्यतीत करें । गूड के त्याग से स्वभाव में मधुरता आती है, तेल का स्वाद त्यागने से संतान दीर्घजीवी होती है तथा सुगंधित तेल के त्याग से महाभाग्य की प्राप्ति होती है, ऐसा कहा जाता है । असत्य भाषण (झूठ बोलना), क्रोध, मद तथा पर्व के दिन मैथुन त्यागनेवाला अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ।

आ. गृहस्थ व्यक्ति को शुक्ल पक्ष की सभी एकादशी तो करनी ही चाहिए; परंतु चातुर्मास में कृष्ण पक्ष की ४ एकादशी भी अवश्य करनी चाहिए । अर्थात पूरे वर्ष में गृहस्थ व्यक्ति को शुक्ल पक्ष की १२ एकादशियां तथा कृष्ण पक्ष की ४ एकादशी, ऐसी कुल १६ एकादशी का व्रत करना चाहिए । १५ दिन में एक बार कठोर उपवास रखने से १४ दिन में सेवन किए अन्न का ओज (शरीर के चैतन्य एवं ऊर्जा में सुधार लानेवाला) में परिवर्तित होता है । उपवास बुद्धिमान तथा आयुष्मान बनने में सहायता करता है ।

इ. इन दिनों में भूमि पर चटई अथवा ब्लैंकेट बिछाकर शयन करें अथवा गद्दा-तकिए को हटाकर सामान्य बिछौना बिछाकर पलंग पर शयन करें । जो स्टील के बरतन का उपयोग न कर पलाश के पत्तों से बने बरतन पर भोजन करते हैं, उनका इस प्रकार भोजन करना दुख, दरिद्रता तथा पाप का नाश करनेवाला, साथ ही ब्रह्मभाव एवं परमात्मभाव की प्राप्ति करनेवाला सिद्ध होता है ।

ई. चातुर्मास में भगवान विष्णु के सामने ‘पुरुषसूक्त’ का पाठ करनेवाला मनुष्य बुद्धिमान बनता है । लडके-लडकियां चाहे कितने भी मंदबुद्धि क्यों न हों; भगवान नारायण के सामने ‘पुरुषसूक्त’ का पाठ करने से उनमें अच्छे परिवर्तन हो सकते हैं, ऐसा माना जाता है ।

उ. सूर्योदय होना हो तथा चंद्र-तारे दिखाई न देते हों, तो ऐसा समय ‘अमृत समय’ है । जो लोग सूर्योदय से डेढ-दो घंटे पहले जाग जाते हैं, वे बडी सहजता से बुद्धिमान बन सकते हैं । जो सूर्योदय के समय अथवा सूर्योदय के उपरांत भी सोए रहते हैं, उनका स्वास्थ्य, मानसिकता एवं बौद्धिकता ‘दब्बू’ रह जाती है ।

ऊ. जो व्यक्ति भोगविलास का तथा स्वाद की लोलुपता का त्याग कर एक बार सामान्य भोजन करेगा तथा मौनव्रत अपनाएगा; उसका ऐसा प्रभाव पडेगा कि कोई भी उसकी आज्ञा एवं संकल्प को भंग नहीं कर पाएगा । वह प्रभावशाली बनेगा ।

३. साधना के लिए अच्छा समय

चातुर्मास में साधना, भजन, ध्यान, जप इत्यादि करनेवाला, सुख-दुख में समान रहनेवाला, अपनी आत्मा का आंतरिक सान्निध्य (अर्थसहित चिंतन) करनेवाला मनुष्य पुण्यशाली, महान आत्मा बन जाता है तथा परमात्मा प्रदत्त प्रतिष्ठित महापुरुषों के समझनेयोग्य सद्बुद्धि का धनी होता है । सत्संग, मंत्रजप, मौन एवं परमात्मा का ध्यान आपके जीवन को उन्नत बनाने में बडी सहायता करेगा । दान, दया एवं शमदम को उत्तम धर्म माना जाता है । ‘शम’ का अर्थ मन को तथा ‘दम’ अर्थात इंद्रियों को अनुचित स्थानों पर जाने से रोकने की शक्ति !

जिसने चातुर्मास में कोई भी व्रत-नियम नहीं लिया, वह यह मान लें कि उसने उसके हाथ में आए अमृत कलश को नीचे गिराने का अनुचित प्रयास किया है; इसलिए सभी इस चातुर्मास का लाभ उठाएं ।’

(साभार : मासिक ‘ऋषि प्रसाद’, जून २०२५)