‘कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय’ के कुलपति के मनमानी शासन की राज्यपाल से शिकायत !

धन की अपव्ययता, अपनों की नियुक्तियां, कार्यपद्धति का उल्लंघन !

श्री प्रीतम नाचणकर, मुंबई

मुंबई , ८ अगस्त (वार्ता) – संस्कृत विश्वविद्यालयों में द्वितीय स्थान प्राप्त तथा ‘अ +’ श्रेणी से सम्मानित नागपुर स्थित ‘कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय’ के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी के अव्यवस्थित तथा मनमानी कार्यशैली के विरोध में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगणों ने कुलाधिपति राज्यपाल श्री सी. पी. राधाकृष्णन् को शिकायत प्रस्तुत की है । विश्वविद्यालय की धनराशि का दुरुपयोग एवं अपव्यय, अपनों की अनुचित नियुक्तियां आदि अत्यन्त गम्भीर आरोप उन पर लगाए गए हैं । यह शिकायत दिनांक २१ जुलाई को राज्यपाल को सौंपी गई है तथा इसकी प्रति मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस एवं उच्च तथा तकनीकी शिक्षा मंत्री श्री चंद्रकांत पाटील को भी प्रेषित की गई है । कुलपति पर लगे इन गम्भीर आरोपों के परिप्रेक्ष्य में संस्कृत विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा की रक्षा हेतु राज्यपाल तथा राज्य शासन की भूमिका क्या होगी, यह देखने का विषय रहेगा ।

क्या विश्वविद्यालय अराजकता की ओर अग्रसर है ?

प्रो. त्रिपाठी का आचरण विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा एवं परंपराओं के लिए हानिकारक है । विश्वविद्यालय की कार्यशैली के विरोध में पूर्व में छात्र कभी प्रदर्शन हेतु नहीं उतरे; परंतु प्रो. त्रिपाठी के कार्यकाल में छात्रों द्वारा प्रदर्शन एवं आंदोलन आरंभ हुए हैं । यह अराजकता का संकेत है, ऐसा गम्भीर उल्लेख प्राध्यापकों ने शिकायत में किया है ।

किन लोगों ने की शिकायत ?

अधिष्ठाता प्रो. कविता होले, प्रो. कलापिनी अगस्ती, प्रो. हरेकृष्ण अगस्ती, संचालक प्रसाद गोखले, विभागाध्यक्ष प्रो. पराग जोशी, उपकुलसचिव डॉ. स्मिता फडणवीस, सहायक कुलसचिव श्रीमती कल्याणी देशकर तथा जनसम्पर्क अधिकारी डॉ॰ रेणुका बोकारे ने यह शिकायतें प्रस्तुत की हैं ।

कुलपति पर प्रमुख आरोप

मनमानी नियुक्तियां

१. स्वकीय संबंधी डॉ. देवानंद शुक्ल को नियमों की अवहेलना कर कुलसचिव के पद पर नियुक्त किया गया । डॉ॰ शुक्ल की नियुक्ति हेतु जानबूझकर द्वितीय बार विज्ञापन प्रकाशित किया गया और पूर्व में आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की अनदेखी की गई ।

२. एक वर्ष के लिए नियुक्त कुलसचिव को पुनः वित्त एवं लेखाधिकारी के पद का प्रभारी मनमाने रूप से नियुक्त किया गया ।

३. कुलपति के वाहन हेतु एक ही चालक की नियुक्ति की जा सकती है; किन्तु पूर्व नियुक्त चालक के अतिरिक्त कुलपति ने बिना विज्ञापन प्रक्रिया अथवा प्राधिकृत स्वीकृति के अपने गांव के व्यक्ति को चालक नियुक्त किया, जिसे पूर्व चालक से अधिक वेतन दिया जा रहा है ।

४. अधिष्ठाता तथा नियमों की उपेक्षा कर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभागों के विभागाध्यक्षों की नियुक्तियां की गईं ।

५. शैक्षणिक सहयोग समझौते के नाम पर व्यक्तिगत परिचित संस्थानों से समझौते कर कर्तव्य पालन की अवहेलना एवं धन का दुरुपयोग किया गया ।

६. शासन एवं व्यवस्थापन परिषद की स्वीकृति के उपरांत भी गत २ वर्षों से नियमित नियुक्ति प्रक्रिया को स्थगित रखा गया है ।

७. व्यवस्थापन परिषद द्वारा स्वीकृत गुरुकुल के रिक्त अध्यापक पदों की भरती नहीं की गई ।

८. विश्वविद्यालय के नियमानुसार अध्ययन मंडल के अध्यक्ष पद हेतु विश्वविद्यालय अथवा संबद्ध महाविद्यालयों के प्रवीण प्राध्यापक की नियुक्ति अपेक्षित है; तथापि कुलपति ने देहली, वाराणसी, प्रयागराज, हरियाणा, वर्धा, भोपाल जैसे अन्य राज्यों के प्राध्यापकों की नियुक्ति कर नियमों की अनदेखी की । विषय से संबंधित विभाग प्रमुख उपलब्ध होते हुए भी विषय से असंबंधित प्राध्यापकों को नियुक्त किया गया ।

धन अपव्यय के आरोप

१. पूर्व स्वीकृति के बिना कुलपति ने रामटेक स्थित निवास एवं कार्यालय हेतु ₹२ कोटि का व्यय किया ।

२. विश्वविद्यालय की सामान्य निधि को व्यवस्थापन परिषद की पूर्व अनुमति के बिना एक निजी बैंक में सावधि जमा के रूप में रखा गया ।

३. विश्वविद्यालय के शासकीय वाहन का उपयोग कुलपति के अतिरिक्त उनके परिवारजनों द्वारा भी नियमित रूप से किया जा रहा है ।

कार्यपद्धति की अवहेलना

१. विश्वविद्यालय परिसर में निजी विवाह समारोह का आयोजन किया गया । विवाह पत्रिका में विवाह स्थल के रूप में विश्वविद्यालय का पता प्रकाशित किया गया; किन्तु शिक्षकों एवं अधिकारियों के विरोध के कारण विवाह स्थल परिवर्तित करना पडा ।

२. विश्वविद्यालय के अधिनियम के अनुसार, व्यवस्थापन परिषद की वर्ष में कम से कम ४ नियमित बैठकें आवश्यक हैं; परन्तु केवल १-२ बैठकें आयोजित की गईं, जिससे अनेक कार्य प्रलम्बित हैं ।

३. गुरुकुल के अध्यापकों को व्यवस्थापन परिषद द्वारा स्वीकृत वेतनवृद्धि प्रदान न कर मानसिक पीड़ा दी गई ।

राज्यपाल से भेंट हेतु प्राध्यापकों का निवेदन

शिकायतकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि इस शिकायत के पीछे कोई व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा द्वेष नहीं है, अपितु विश्वविद्यालय की उन्नति ही एकमात्र उद्देश्य है । उन्होंने राज्यपाल से भेंट की विनम्र प्रार्थना करते हुए निवेदन किया है कि इस सम्पूर्ण प्रकरण की जांच हेतु समिति गठित की जाए एवं हमें यह अवसर प्रदान किया जाए कि हम विस्तारपूर्वक वस्तुस्थिति आपके समक्ष प्रस्तुत कर सकें ।

मराठी भाषा की उपेक्षा

‘कुलपति एवं कुलसचिव मराठी भाषा न तो बोल सकते हैं और न ही लिख सकते हैं । इस कारण शासनकार्य एवं पत्रव्यवहार मराठी भाषा में नहीं हो पाता । सभी परिषदों की बैठकें एवं उनका कार्य भी मराठी में नहीं होता । कुलसचिव का पद प्रशासनिक होने के कारण राज्य शासन की नीति के अनुसार उन्हें मराठी भाषा सीखना अनिवार्य होता है; तथापि नियुक्ति के समय मराठी भाषा सीखने की ६ मास की अनिवार्यता को हटा दिया गया’, ऐसा प्राध्यापकों ने राज्यपाल से की गई शिकायत में कहा है ।

कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने आरोपों को किया निरस्त

इन शिकायतों के संदर्भ में ‘सनातन प्रभात’ द्वारा सम्पर्क करने पर प्रो. त्रिपाठी ने सभी आरोपों को अस्वीकार किया । उन्होंने कहा – ‘हम सभी मिलकर समन्वय से कार्य कर रहे हैं । इस प्रकार के आरोपों से विश्वविद्यालय की छवि धूमिल होती है । विवाह पत्रिका पर किसी ने विश्वविद्यालय का नाम लिखा होगा, परन्तु उसका कोई विरोध नहीं हुआ था । वाराणसी में विश्वविद्यालय परिसर में विवाह समारोह आयोजित करने की परंपरा है, इसी कारण ऐसा किया गया । यहाँ ऐसी परंपरा न होने से विवाह समारोह बाहर आयोजित किया गया । यदि एक चालक अनुपस्थित रहता है, तो दूसरा चालक होना आवश्यक है; अतः एक अन्य चालक नियुक्त किया गया, वह हमारे गाँव का नहीं है’ ।