पूर्णपुरुषोत्तम पूर्णावतार भगवान श्रीकृष्ण !

१५ अगस्त को ‘श्रीकृष्ण जन्माष्टमी’  है । उस निमित्त …

ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अनादिरादिर्गाेविन्दः सर्वकारणकारणम् ।। 
– ब्रह्मसंहिता, श्लोक १

अर्थ : श्रीकृष्ण परम ईश्वर हैं । उनका श्रीविग्रह नित्य, चित्घन एवं आनंदस्वरूप है । वे अनादि, सर्वश्रेष्ठ तथा सभी कारणों के कारणस्वरूप गोविंद हैं ।

हमारे इंद्रिय सीमित हैं, इसका अर्थ है हाथ का काम हाथ ही कर सकते हैं । आंखों का देखने का कार्य आंखें ही कर सकती हैं । यहां मानवीय इंद्रियों की मर्यादाएं ध्यान में आती हैं; परंतु भगवान श्रीकृष्ण के संदर्भ में ऐसा नहीं है । उनके कोई भी

 इंद्रिय कोई भी कार्य कर सकते हैं, इसका अर्थ आंखें हाथ का कार्य कर सकती हैं तथा हाथ आंखों का देखने का कार्य क

र सकते हैं । इसकी पुष्टि निम्न प्रकार से है –

अङ्गानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति ।

पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति ।

आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वलविग्रहस्य ।

गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ।। 

– ब्रह्मसंहिता, अध्याय ५, श्लोक ३२

अर्थ : जिसके दिव्य स्वरूपवाले प्रत्येक अंग में जो पूर्णता से अंतर्भूत है, जिसके इंद्रिय सदासर्वदा भौतिक एवं आध्यात्मिक जैसे अनंत ब्रह्मांडों को देख पाते हैं, उन्हें संभालते हैं तथा प्रकट करते हैं; ऐसे तेजस्वी सच्चिदानंद स्वरूप का, उस श्री गोविंद का अर्थात आदिपुरुष का मैं पूजन करता हूं ।

ऐसे इन परमावतार पूर्णपुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण दिन ! भाद्रपद कृष्ण अष्टमी !

१. श्रीकृष्ण का अर्थ है पूर्णावतार

‘कर्षयति इति कृष्णः ।’ (जो आकर्षित करते हैं, वे हैं कृष्ण ) संस्कृत धातु ‘कृ’ से ‘कृष्ण’ शब्द आया है । श्रावण कृष्ण अष्टमी के दिन रात १२ बजे वसुदेव एवं देवकीमाता के गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ । वसुदेव का अर्थ है विशुद्ध विवेक तथा देवकी का अर्थ है ऋतंभरा प्रज्ञा ! इन दोनों के गर्भ से आनंदकंद परब्रह्म सच्चिदानंद प्रकट हुए । दुष्टों का संहार तथा सज्जनों की रक्षा हेतु यह पूर्णावतार प्रकट हुआ । अन्य सभी अवतारों में से केवल इसी अवतार को पूर्णावतार माना जाता है । श्रीमद्आद्यशंकराचार्यजी ने भी ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।’ अर्थात ‘श्रीकृष्ण स्वयं भगवान हैं’, ऐसी पुष्टि की है ।

सर्वोत्कृष्ट पुत्र, पिता, प्रशासक, राजनीतिज्ञ, कुशल संगठक, दार्शनिक, कूटनीतिज्ञ आदि उनकी अनेक विशेषताएं हैं ! सभी विषयों में ही पूर्णता तक पहुंचे हुए व्यक्तित्व ! षड्गुणऐश्वर्यसंपन्न (यश, कीर्ति, सामर्थ्य, सौंदर्य, श्री एवं वैराग्य) ऐसे वे परब्रह्म परमात्मा ! भगवान श्रीकृष्ण के जीवनचरित्र के मुख्य आधार हैं ‘श्रीमद्भागवतपुराण’, ‘गर्गसंहिता’ एवं ‘महाभारत !’ इसके लिए अन्य पुराण भी हैं ही ! ‘श्रीमद्भागवतपुराण’ १२ स्कंधोंवाला है, उसमें १०वें स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण का जीवनचरित्र आता है । इसमें ९० अध्याय हैं तथा पूर्वाध एवं उत्तरार्ध है । उसी प्रकार ‘गर्गसंहिता’ विस्तृत रूप से श्रीकृष्ण का जीवनचरित्र प्रतिपादन करती है । यह अवतार ‘पूर्णावतार’ कैसे है, वह यहां दे रहा हूं ।

२. श्रीकृष्ण पूर्णावतार है, यह दर्शानेवाली विशेषताएं !

२ अ. अवतरण : भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को वसुदेव एवं देवकी के गर्भ से रात १२ बजे श्रीकृष्ण का जन्म हुआ । जन्म के समय ही उन्होंने वसुदेव एवं देवकीमाता के सामने अपना चतुर्भुज रूप दिखाया । इससे उन्होंने यह दिखा दिया, ‘मैं भगवान विष्णु हूं ।’ उस समय उन्होंने वसुदेव एवं देवकीमाता को उनके द्वारा दिए गए वरदान का स्मरण दिलाया । जन्म के समय ही श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर हास्य विलस रहा था ।

२ आ. बाललीला : श्रीकृष्ण की बाललीलाएं भागवत धर्म का परमरहस्य है । अपनी नटखट बाललीलाओं से समस्त विश्व को मोहित करनेवाले ये परब्रह्म गोकुल में रहे । उनकी लीलाओं में शकट, यमलार्जुन वृक्ष तथा उन्हें विषपान करानेवाली पूतना राक्षसी इन सभी का उद्धार, यशोदामैया को अपने मुख में अखिल ब्रह्मांड के दर्शन कराने जैसी तथा अन्य अनेक लीलाओं का समावेश है ।

२ इ. माखनचोरी : ऐसा कहते हैं कि श्रीकृष्ण के जन्म के समय उनका भविष्य बतानेवाले गर्ग ऋषि ने यह भविष्यवाणी करते हुए कहा, ‘यह बडा होकर बहुत बडा चोर (चित्तचोर) होगा; क्योंकि वह माखन चुराएगा, साथ ही सभी के मन भी चुरा लेगा ।’ इस कृति के पीछे भगवान की भक्तों के प्रति प्रेमासक्ति दिखाई देती है ।

२ ई. चीरहरण लीला : यमुना के जल में विवस्त्र होकर स्नान करनेवाली गोपियों के वस्त्रहरण की लीला आलोचकों के लिए आलोचना का विषय है; परंतु जिनके मन में कामक्रोधादि षड्‌रिपु बसते हैं, उन्हीं को इसकी आलोचना करने का मन होता है ।
७ वर्ष के बालक में लेशमात्र भी कामवासना होना संभव है क्या ? भगवान श्रीकृष्ण ने इस लीला में गोपियों के वस्त्र चुराए । वे विवस्त्र स्नान कर रही थीं । इस लीला का आध्यात्मिक अर्थ ऐसा है, ‘यदि आपको ईश्वर से मिलना है, तो आप अपने मन पर ओढे अहंकार तथा अन्य वासनाओं के मलीन वस्त्र उतारें, तभी जाकर आप ईश्वर तक पहुंच पाएंगे ।’ इसका अर्थ ईश्वरप्राप्ति हेतु कामक्रोधादि षड्‌रिपुओं को त्यागना आवश्यक है । गोपियों के वस्त्रों की तुलना स्वयं के मन में समाहित कामक्रोधादि षड्‌रिपुओं से कीजिए, जिससे कोई संदेह नहीं रहेगा ।

२ उ. रासलीला – रासरासेश्वर भगवान श्रीकृष्ण : आध्यात्मिक दृष्टि से रासलीला का अर्थ समझना होगा । शरद पूर्णिमा की रात में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियोंसहित रासलीला की । ‘गोपी’ शब्द का अर्थ है ‘गोभिः रसं पिबति इति गोपी’ अर्थात ‘जो (सभी) इंद्रियों से (भक्ति) रस प्राशन करती हैं, वे गोपियां !’, ऐसा है । यहां ‘गो’ का अर्थ है इंद्रिय ! रासलीला में भगवान ने अपने अधरों से बांसुरी बजाई तथा उसके मधुर निनाद से गोपियां दौडती हुईं श्रीकृष्ण से मिलने चली आईं । श्रीकृष्ण ने जब बांसुरी बजाई, उस समय कोई गोपी अपने पति को भोजन परोस रही थी, कोई बच्चे को दूध पिला रही थी, कोई बडों की सेवा कर रही थी, तो कोई अन्य कुछ काम कर रही थीं । जब गोपियां भगवान से मिलीं, तब भगवान ने उनके आने का कारण पूछा तथा रात का समय होने से वापस घर जाने के लिए कहा, तब जिन्होंने अपने मन संपूर्णतया गोविंद के चरणों में समर्पित किए थे, वो गोपिकाएं निराश हुईं । उसके उपरांत श्रीकृष्ण से अनुरोध करने पर गोविंद ने उन्हें रुकने की अनुमति दी तथा उसके उपरांत रासलीला आरंभ हुई ।

  यहां कुछ आलोचकों को इसमें कामक्रीडा दिखाई देती है; परंतु यह असत्य है । उसका कारण तो ऊपर दिया ही है । तब भी कुछ लोग कहेंगे, ‘भगवान श्रीकृष्ण तो सभी अवस्थाओं में समान हैं, चाहे वे बचपन के हों अथवा वयस्क अवस्था में; परंतु ‘भागवत’ में इस पर सुस्पष्ट उत्तर है, ‘गोपियां भले ही श्रीकृष्ण के प्रति कामासक्त थीं, तब भी उनकी कामासक्ति शुद्ध प्रेम में परिवर्तित हुई’, यही इस लीला का तात्पर्य एवं ध्येय है । रासलीला का आध्यात्मिक अर्थ है, ‘वृंदावन अर्थात स्वयं का अंतःकरण ! श्रीकृष्ण अर्थात स्वयं की आत्मा ! श्रीकृष्ण की बांसुरी का ज्वार अर्थात स्वयं के अंतःकरण से निकलनेवाली अनाहत ध्वनि, जो योगियों को सुनाई देती है । इस ध्वनि से प्रस्फुटित होनेवाली अंतःकरण की भावनाएं तथा तरंग हैं गोपियां ! इन तरंगों का आत्मा के साथ होनेवाले मिलन का साधर्म्य रासलीला से है; क्योंकि ‘जीवन एक महारास है तथा भगवान श्रीकृष्ण के साथ होनेवाली यह रासलीला ही मनुष्य जीवन की अंतिम पराकाष्ठा तथा परम ध्येय है ।’

२ ऊ. वृंदावनबिहारी 

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ।
रन्ध्रान्वेणोरधरसुधयापूरयन्गोपवृन्दैर्
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः ।। 
– श्रीमद्भागवत, स्कन्ध १०, अध्याय २१, श्लोक ५ 

अर्थ : भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गोपमित्रों के साथ वृंदावन में प्रवेश किया है ।

भगवान श्रीकृष्ण के मस्तक पर मोरपंख है, कानों में कन्हेर के पीले पुष्प हैं । उन्होंने शरीर पर सोने जैसा पितांबर धारण किया है तथा गले में वैजयंती माला है । उनका रूप किसी अभिनेता से भी कहीं गुना सुंदर है ! वे बांसुरी के छेदों को स्वयं के अधरामृत से भर रहे हैं । गोपाल उनकी कीर्ति का गुणगान कर रहे हैं । यह वृंदावन उनके चरणस्पर्श के कारण और भी रमणीय हो गया है ।
२ ए. कंसवध : श्रीकृष्ण ने अपने सगे मामा कंस का वध किया; क्योंकि वह अन्यायी था । केवल इतना ही नहीं, अपितु श्रीकृष्ण ने उसे सायुज्य मोक्ष भी प्रदान किया । श्रीकृष्ण ने उसका राज्य जीतकर भी स्वयं उसका उपभोग नहीं किया, अपितु उसे स्वयं के दादा शूरसेन को दे दिया ।

२ ऐ. रणछोड श्रीकृष्ण : कंसवध करने से आक्रोशित कंस के ससुर ने अर्थात जरासंध ने १७ बार अपनी २१ अक्षौहिणी सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया । भगवान श्रीकृष्ण ने उसके सभी आक्रमण विफल कर दिए; परंतु १८वें आक्रमण के समय मथुरा पर कालयवन नामक एक यवन का भी आक्रमण हुआ । इन दोनों आक्रमणों का सामना करते समय भगवान श्रीकृष्ण ने एक चतुराई दिखाई । उन्होंने दोनों सेनाओं को अपरिमित हानि पहुंचाकर भी जरासंध एवं कालयवन को जीवित छोड दिया तथा कालयवन के सामने से किसी रणछोड की भांति रणभूमि छोडकर श्रीकृष्ण भाग गए । कालयवन ने श्रीकृष्ण को धिक्कारा; परंतु श्रीकृष्ण के ऐसा करने के पीछे राजनीतिक उद्देश्य था । कालयवन द्वारा लाई गई अपार संपत्ति यदि यदुवंशियों के हाथ लग जाती, तो सभी यादव इस संपत्ति के मद से उन्मत्त हो जाते तथा दूसरी बात यह कि कालयवन की मृत्यु श्रीकृष्ण के हाथों लिखी नहीं गई थी ।

२ ओ. रुक्मिणी स्वयंवर : भगवान श्रीकृष्ण एवं रुक्मिणी का विवाह है रुक्मिणी स्वयंवर ! आनंदकंद परमात्मा मायापति ब्रह्मांडनायक एवं चित्‌शक्ति आदिमाया परब्रह्मस्वरूपिणी माता लक्ष्मीजी का अनुपम संगम !

२ औ. १६ सहस्र नारियों के पति : ‘पाति इति पति ।’ अर्थात ‘जो रक्षा करता है, वह पति होता है ।’ नरकासुर के बंदीवास से १६ सहस्र नारियों को छुडानेवाले रक्षणकर्ता… ! नरक चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करने के उपरांत कारागृह में बंदी बनाई गईं १६ सहस्र स्त्रियों को जब समाज ने तथा उनके घरवालों ने भी नहीं स्वीकारा, तब उनका स्वीकार कर उन्हें अभय प्रदान करनेवाले पूर्णपुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण थे । इन १६ सहस्र स्त्रियों ने श्रीकृष्ण को ही पति मान लिया तथा श्रीकृष्ण ने भी उन स्त्रियों को स्वयं का नाम दिया ।

२ अं. भगवद्गीता के रचयिता : कुरुक्षेत्र पर किंकर्तव्यमूढ हुए सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी अर्जुन को कर्मयोग का अलौकिक सिद्धांत विशद करनेवाले तथा युद्ध के लिए प्रेरित करनेवाले परमेश्वर ! धनंजय अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखानेवाले तथा अंततः ‘तुम युद्ध करो’, यह आज्ञा करनेवाले… !

२ क. निरहंकारी भगवान श्रीकृष्ण : पांडवों के राजसूय यज्ञ में सभी का काम बांटकर स्वयं पधारे हुए अतिथियों का पादप्रक्षालन करनेवाले ! जिनके चरणकमल अंतःकरण में धारण कर योगी विमलाशय बन जाते हैं, उनके चरणकमल देवी-देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं, वे अन्यों का पादप्रक्षालन कर रहे थे !

२ ख. धर्म के रक्षणकर्ता : ‘धर्मो रक्षति रक्षितः ।’ (मनुस्मृति, अध्याय ८, श्लोक १५) अर्थात ‘जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म (ईश्वर) करते हैं ।’ महाभारत युद्ध के समय प्रत्येक वीर ने अपनी प्रतिज्ञा एवं प्रतिष्ठा संजोने का प्रयास किया । महारथी कर्ण ने दानवीरता की प्रतिज्ञा, पितामह भीष्म ने कौरवों के सिंहासन के लिए ली प्रतिज्ञा तथा आजीवन ब्रह्मचर्य तथा अन्य अनेक वीरों ने अपनी-अपनी प्रतिज्ञाओं का जीवनभर पालन किया; परंतु युद्ध के आरंभ में ‘न धारण करूंगा शस्त्र कभी; परंतु बातें करूंगा चतुराई की’, इस स्वयं की प्रतिज्ञा को युद्ध में तोडनेवाले तथा भीष्म पितामह की ओर रथ का पहिया लेकर जानेवाले, यही धर्म के रक्षक भगवान श्रीकृष्ण थे ।

२ ग. कर्मयोगी श्रीकृष्ण

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ।। 
– श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक १४

अर्थ : मुझे कर्माें के फल की इच्छा नहीं है; इसलिए कर्म मुझे नहीं बांधते । इस प्रकार जो मुझे तत्त्वतः जानते हैं, उसे भी कर्माें
का बंधन लागू नहीं होता । जीवनभर कर्मयोग का आदर्श सामने रखनेवाले तथा उसके अनुसार ही अपना आचरण रखनेवाले महान कर्मयोगी !

२ घ. कूटनीतिज्ञ एवं राजनीतिज्ञ : महाभारत युद्ध के समय कर्ण को उसका जन्मवृत्तांत बताकर उसे पांडवों के पक्ष में करने का प्रयास करनेवाले, जरासंध को १७ बार पराजित कर उसकी पूरी सेना का संहार कर भी उसे जीवित छोड देनेवाले (पृथ्वी पर स्थित अनावश्यक बोझ को उतारनेवाले), युद्ध न हो; इसके लिए मध्यस्थता करनेवाले, भीष्म पितामह की ओर रथ का पहिया लेकर दौडनेवाले, कालयवन को जीवित छोडकर स्वयं रणभूमि से भाग जानेवाले… ! इतिहास में भगवान श्रीकृष्ण के उपरांत इस प्रकार की युद्धनीति केवल आर्य चाणक्य एवं छत्रपति शिवाजी महाराज ने यथार्थरूप से अपनाई ।

२ च. आत्मकाम पूर्णकाम श्रीकृष्ण : जगत्जननी माता रुक्मिणी के साथ विनोद करते हुए भगवान श्रीकृष्ण उनसे कहते हैं,

उदासीना वयं नूनं न स्त्र्यपत्यार्थकामुकाः
आत्मलब्ध्याऽस्महे पूर्णा गेहयोर्ज्योतिरक्रियाः ।। 
– श्रीमद्भागवत, स्कन्ध १०, अध्याय ६०, श्लोक २०

अर्थ : हम सचमुच ही देह एवं घर-बार के विषय में उदासीन हैं । स्त्री, संतान एवं धन की हमें अभिलाषा नहीं है । हम निष्क्रिय हैं तथा दीप की भांति साक्षी हैं । हम हमारी आत्मा के साक्षात्कार से ही पूर्णकाम हैं ।

२ छ. गोपालक श्रीकृष्ण : भगवान श्रीकृष्ण गाय के पूजक हैं; इसलिए उन्हें गोपालक कहते हैं ।
ऐसे इन पूर्णपुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण दिवस पर हम उनका स्मरण कर अपना जीवन उन्हीं को समर्पित करते हैं ।

वासनात् वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ।।

अर्थ : तीनों लोक वासुदेव के अस्तित्व से ओतप्रोत हैं तथा सभी प्राणिमात्रों में उनका वास है, ऐसे श्री वासुदेव को मेरा प्रणाम ।

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

अर्थ : वसुदेव के पुत्र, साथ ही कंस, चाणूर इत्यादि का निःपात करनेवाले, देवकीमाता को परमानंद देनेवाले तथा समस्त जगत के लिए गुरुस्थान पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूं ।

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ।।

अर्थ : वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण को, समस्त दुखों का हरण करनेवाले परमात्मा को तथा शरणागतों के क्लेश दूर करनेवाले श्री गोविंद को मेरा प्रणाम !
– श्री. तुकाराम चिंचणीकर
(श्री. तुकाराम चिंचणीकर के ब्लॉग से साभार)