‘जुलाई महिने के आरंभ में ही गोवा के कोलवाळ कारागृह में मादक पदार्थाें की तस्करी की घटना पुनः एक बार सामने आई । गोवा में मादक पदार्थाें की तस्करी होना, उनका व्यापार होना अथवा सेवन होना अब कोई नई बात नहीं रही है । अब तो बाहर के राज्यों में गोवा की प्रतिमा ‘गोवा मादक पदार्थाें के सेवन का मानो अधिकारक्षेत्र ही है’, ऐसी बन गई है ।
गोवा राज्य में पर्यटन व्यवसाय बडे स्तर पर होने के कारण कदाचित ऐसी घटनाएं अधिक संख्या में सामने आती हैेंं; परंतु देश के अन्य राज्यों में भी मादक पदार्थाें का सेवन तथा उसका व्यापार बडे स्तर पर होता है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता ।
केवल मादक पदार्थाें का सेवन तथा उनके व्यापार तक ही यह क्षेत्र सीमित नहीं है, अपितु उसके लिए आर्थिक आपूर्ति हो; इसके लिए युवा वर्ग बडे स्तर पर अपराधिक कृत्यों में संलिप्त होता है, यह भी स्पष्ट हुआ है । अतः सभी स्तरों पर इस समस्या पर गहन विचार करना तथा उसका समाधान ढूंढना अब आवश्यक हो गया है ।’

१. भारत में व्यसनाधीनता के भयावह आंकडे !

‘वर्ष २०१८ में केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था के (‘एम्स’ के) ‘नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर’ के सहयोग से किए गए राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार भारत में लगभग १६ करोड लोग मदिरा का सेवन करते हैं । (अब यह संख्या अनेक गुना बढी होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है । – संकलनकर्ता) लगभग ३ करोड लोग गांजा अथवा उससे बने पदार्थाें का सेवन करते हैं । लगभग ढाई करोड लोग अफीम का सेवन करते हैं । तंबाकू के व्यसन के विषय में तो कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है । भारत में घर-घर में तंबाकू का सेवन किया जाता है, ऐसा यदि कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । पुरुष एवं स्त्री, इन दोनों में भी तंबाकू का व्यसन बडे स्तर पर किया जाता है । अन्य मादक पदार्थाें का सेवन करनेवालों की संख्या भी करोडों में है ।
वर्ष २०१८ में सामने आए ये आंकडे अब वर्ष २०२५ में कितने बढे होंगे, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती । दुर्भाग्य की बात यह कि व्यसनाधीन लोगों में युवकों तथा बच्चों की संख्या लक्षणीय है । हाल ही के कुछ समय में महिलाओं में भी व्यसन का स्तर बढ रहा है । इससे इस समस्या की गंभीरता ध्यान में आएगी ।
२. जुए का बढता व्यसन !
भारत में अनेक लोगों में जुए का व्यसन है । अब तो घर-बैठे ही ‘ऑनलाइन रमी’ जैसा जुआ खेलने की सुविधा उपलब्ध होने के कारण न जाने कितने परिवार ध्वस्त हो रहे हैं, ऐसा दिखाई दे रहा है । इसके परिणामस्वरूप आत्महत्याओं का बढता स्तर चिंता का विषय बना हुआ है ।

३. व्यसनाधीनता के मानसशास्त्रीय कारण !
‘तनाव, चिंता, अकेलापन, निराशा, आत्मविश्वास का अभाव, मन पर हुए आघात, कुसंगति, परिवार में आंतरिक कलह, विवाद जैसे विभिन्न कारणों से मनुष्य व्यसनों की ओर मुडता है’, ऐसा मानसशास्त्र बताता है । मनोविकार विशेषज्ञ भी इसके लिए उनकी क्षमता के अनुसार उपचार बताते रहते हैं; परंतु उस पर मर्यादाएं हैं; क्योंकि व्यसनाधीन लोग उपचारों में निरंतरता नहीं रखते ।
४. व्यसनाधीनता के सामाजिक कारण
वर्तमान में समाजमानस पर प्रसारमाध्यमों तथा फिल्मों का बडा प्रभाव दिखाई देता है । फिल्म में भूमिका निभानेवाले कलाकार व्यसनी हों, तो युवक भी उनका आदर्श सामने रखकर व्यसन करने लगते हैं । इसके साथ ही व्यक्ति को व्यसनी बनानेवाले पदार्थ, उदा. तंबाकू, सिगरेट, गुटखा, मदिरा इत्यादि सहज उपलब्ध हो, तो युवकों के उनके अधीन होने की संभावना बढ जाती है । कुछ युवक मित्रों के आग्रह पर व्यसन करना आरंभ करते हैं, जबकि कुछ लोगों के घर में वंशपरंपरा से व्यसनाधीनता चलती रहती है । इसका अर्थ पिता यदि मदिरा का सेवन करता हो, तो बेटा भी मदिरा का व्यसनी बनने की संभावना अधिक होती है । कुछ लोग उत्सुकतावश, तो कुछ लोग शौक के रूप में पहली बार व्यसन करते हैं तथा उसके उपरांत व्यसन के अधीन हो जाते हैं ।
व्यसनाधीनता के कारण होनेवाले सूक्ष्म दुष्परिणाम अब वैज्ञानिक शोधकार्यं से भी हुए सिद्ध !

हम व्यसनों के दुष्परिणामों का अध्ययन स्थूल की घटनाओं से, अर्थात हमने स्थूल से जिन घटनाओं का अनुभव किया है, उन घटनाओं से कर सकते हैं; परंतु सूक्ष्म स्तर पर भी व्यक्ति पर व्यसनों के गंभीर परिणाम होते रहते हैं, यह बात अब वैज्ञानिक शोध से भी सिद्ध हुई है ।
महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय ने पिछले १० वर्षाें में इस पर तथा ऐसे विभिन्न सूत्रों पर शोध कार्य किया है । उन्होंने ‘यूनिवर्सल औरा स्कैनर’ इस वैज्ञानिक उपकरण की सहायता से यह सिद्ध किया है कि व्यसनाधीनता के कारण व्यक्ति का प्रभामंडल नकारात्मक हो जाता है तथा व्यक्ति में रज-तम गुणों का स्तर बढता है । उसके कारण उस व्यक्ति पर दीर्घकालीन परिणाम होते हैं । उसी प्रकार ‘इलेक्ट्रोसोमैटोग्राफी’ एवं ‘जीडीवी बायोवेल’ इस तकनीक से उन्होंने यह भी सिद्ध किया है कि व्यसन व्यक्ति के सप्तचक्रों पर विपरीत प्रभाव डालता है । तो उससे स्वाभाविक ही उसका शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य भी बिगड जाता है । संक्षेप में इसे समझ लेना हो, तो जो व्यक्ति व्यसनी होता है, वह बडे स्तर पर रज-तम गुणी तथा आत्मकेंद्रित होता है । उसके कारण ऐसे व्यक्ति से वातावरण में भी रज-तमजन्य स्पंदनों का प्रक्षेपण होता है । रज-तम गुणों का यह प्रक्षेपण तथा व्यसनाधीन व्यक्ति का नकारात्मक प्रभामंडल यदि अल्प करना हो, तो उस व्यक्ति में सत्त्वगुण बढाना आवश्यक होता है तथा उसके लिए साधना करना महत्त्वपूर्ण है ।
– श्री. योगेश जलतारे५. व्यसनाधीनता एक राष्ट्रीय संकट है !
भारतीय युवकों के व्यसनाधीन बनने के पीछे के मानसशास्त्रीय, पारिवारिक, सामाजिक जैसे विभिन्न कारणों का यदि अध्ययन किया जाए, तो इस समस्या का एक सीमा तक ही विचार होता है । वर्तमान में इसकी ओर एक अंतरराष्ट्रीय आक्रमण के रूप में देखने की आवश्यकता है; क्योंकि व्यसनाधीनता की समस्या के कारण केवल संबंधित व्यक्ति का ही जीवन ध्वस्त होता है, ऐसा नहीं है, अपितु उसका पूरा परिवार तथा उसके उपरांत समाज पर भी उसका विपरीत प्रभाव पडता है । अधिकांश मादक पदार्थाें के मुख्य विक्रेता पाश्चात्य अथवा इस्लामी देशों के होते हैं ।
अनेक संतों के शिष्यों एवं भक्तों ने साधना आरंभ करने पर व्यसन से मुक्त होने की अनेक प्रतीतियां की हैं । इसके संबंध में सनातन संस्था के अनेक साधकों को भी अनुभूतियां प्राप्त हैं । अनेक साधक व्यसनाधीनता से बाहर निकले हैं । आपको भी यदि साधना के विषय में अधिक जानकारी लेनी हो, तो आप सनातन संस्था के निकट के सत्संग में अथवा 7058885610 इस चल-दूरभाष क्रमांक पर अवश्य संपर्क करें । – श्री. योगेश जलतारे
अतः किसी देश में मादक पदार्थाें का जाल बिछाकर उस देश की पूरी पीढी को ही नष्ट कर देना, एक प्रकार का सुलभ छद्मयुद्ध होता है । हमारे देश के विरुद्ध भी इस प्रकार का युद्ध चल रहा हो, इसकी बडी संभावना है ।
६. व्यसनाधीनता दूर होने हेतु वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे प्रयास !
वर्तमान समय में देश में युद्ध स्तर पर व्यसनाधीनता दूर करने के प्रयास चल रहे हैं । व्यसनाधीन युवकों का समुपदेशन करना, उन्हें व्यसनमुक्ति केंद्र में भर्ती कर उन पर उपचार करना, युवकों में व्यसन आरंभ होने के कारणों की खोज कर उन्हें दूर करने का प्रयास करना, विभिन्न विज्ञापन तैयार कर उस माध्यम से युवकों को व्यसनों से दूर रखने का प्रयास करना, समय-समय पर मादक पदार्थाें के विक्रेताओं को पकडकर उनका जाल ध्वस्त करने का प्रयास करना जैसे विभिन्न प्रयास होते हुए दिखाई देते हैं; परंतु ये प्रयास अधूरे हैं; क्योंकि व्यसन छोडने के लिए उस व्यक्ति की स्वयं की तीव्र इच्छाशक्ति होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । कुछ व्यसनमुक्ति केंद्रों में व्यसन की आवश्यकता को अल्प करने हेतु योगासन, ध्यान, प्राणायाम, व्यायाम जैसी बातें सिखाई जाती हैं, जिससे तनाव अल्प होता है । कुछ लोगों को उनके प्रिय कामों में व्यस्त बने रहने हेतु प्रेरित किया जाता है ।
७. व्यसनाधीनता से स्थायी रूप से मुक्ति प्राप्त करने हेतु साधना आवश्यक !
व्यसनमुक्ति एक लंबी प्रक्रिया है । एक बार कुछ अवधि के लिए व्यसन छूट गया, इसका अर्थ वह स्थायी रूप से छूट जाएगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता । इसलिए संयम रखना, उसके लिए निरंतर प्रयास करना तथा आवश्यकता पडने पर पुनः सहायता लेना आवश्यक है । वर्तमान समय में व्यसनाधीनता पर किए जा रहे विभिन्न उपाय कुछ समय तक भले ही परिणामकारक लगते हों; परंतु तब भी यदि उसकी तीव्रता अधिक हो, तो कुछ अंतराल पश्चात वह व्यसन पुनः उस व्यक्ति को घेर लेता है । इसलिए व्यसन पर मनोचिकित्सक जो उपचार करते हैं, उन पर मर्यादाएं हैं ।
अतः यदि वास्तव में व्यसन से संपूर्णतया मुक्ति चाहिए हो, तो उसके लिए साधना के बिना अन्य कोई विकल्प नहीं है । आरंभ में साधना करना बहुत कठिन लग सकता है; परंतु जिस व्यक्ति की व्यसनमुक्त होने की इच्छा है, उसे आरंभ में कुछ दिन तक किसी संत के सत्संग में ले जाना, तीर्थयात्रा के लिए ले जाना, मंदिरों की नियमित स्वच्छता करने के लिए कहना, प्रिय अथवा इष्टदेवता का नामजप करने के लिए कहना जैसी कुछ बातें सिखानी चाहिए । इसके साथ ही उससे धर्माचरण की कुछ नित्य कृतियां करवा लेने से उस व्यक्ति में सत्त्वगुण बढेगा तथा इस सत्त्वगुण से उसमें व्यसन से दूरी बनाने का मनोबल उत्पन्न होगा । इसके कारण कुछ समय उपरांत वह उस व्यसन पर निश्चित ही विजय प्राप्त कर पाएगा । संक्षेप में कहा जाए, तो व्यसन से मुक्ति प्राप्त करनी हो, तो उसके लिए साधना के बिना अन्य कोई विकल्प नहीं है, इसे हमें समझना होगा ।’
– श्री. योगेश जलतारे, समूह संपादक, ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक समूह (४.७.२०२५)
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