केन्द्र सरकार ने संसद में किया स्पष्ट

नई दिल्ली – कुछ समूहों द्वारा संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने को लेकर चर्चा की जा रही है; परन्तु केन्द्र सरकार की वर्तमान में ऐसी कोई योजना अथवा उद्देश्य नहीं है, ऐसा केंद्रीय विधिमंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में स्पष्ट किया ।
१. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय सहकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने गत मास कहा था कि ‘समाजवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द आपातकाल के कालखंड में (४२ वें संविधान संशोधन द्वारा) संविधान की प्रस्तावना में जोडे गए थे । इस पर समाजवादी पक्ष के सांसद समुन ने अर्जुन राम मेघवाल से प्रश्न पूछा कि क्या कुछ सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी संविधान की प्रस्तावना से इन शब्दों को हटाने हेतु वातावरण निर्माण कर रहे हैं ?
२. इस पर विधिमंत्री मेघवाल ने कहा कि कुछ समूह अपनी राय व्यक्त कर रहे होंगे या उन शब्दों पर पुनर्विचार के लिए वातावरण तैयार कर रहे होंगे । ऐसी चर्चाओं से सार्वजनिक स्तर पर वाद-विवाद अथवा वातावरण का निर्माण हो सकता है; परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि इससे सरकार की अधिकृत भूमिका प्रकट होती है ।

३. जब सरकार की अधिकृत भूमिका के विषय में पूछा गया, तब विधिमंत्री मेघवाल ने कहा कि सरकार की अधिकृत भूमिका यह है कि संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों पर पुनर्विचार करने अथवा उन्हें हटाने की कोई योजना अथवा उद्देश्य नहीं है । प्रस्तावना में परिवर्तन हेतु विचारमंथन एवं व्यापक सहमति आवश्यक होती है; परन्तु अब तक सरकार ने इन शब्दों को बदलने हेतु कोई औपचारिक प्रक्रिया आरम्भ नहीं की है ।
सर्वोच्च न्यायालय ने किया है संविधान संशोधन को स्वीकार !
नवम्बर २०२४ में ‘डॉ. बलराम सिंह एवं अन्य बनाम भारत सरकार’ इस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने ४२ वें संविधान संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं को निरस्त कर दिया था । इस सन्दर्भ का उल्लेख करते हुए विधिमंत्री मेघवाल ने कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में समाजवाद एक कल्याणकारी राज्य का प्रतीक है । यह निजी क्षेत्र के विकास में बाधा उत्पन्न नहीं करता, तथा धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूल संरचना का अविभाज्य अंग है ।
इससे अधिक दुःखद क्या हो सकता है ? – अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन![]() संविधान से ‘समाजवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने की मांग करने वाली याचिका सर्वोच्च न्यायालय में प्रविष्ट (दाखिल) करनेवाले अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन से इस विषय पर ‘सनातन प्रभात’ ने चर्चा की । इस अवसर पर अधिवक्ता जैन ने कहा कि यदि विधिमंत्री मेघवाल ऐसा कह रहे हैं, तो कहना पडेगा कि केन्द्र सरकार की नीति ही स्पष्ट नहीं है । यह विधिक दृष्टि से एक शून्यता है, जिसे विधिमंत्री समझ ही नहीं पा रहे हैं । संविधान में ‘समाजवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ ये दो शब्द जोडे जाना ही सबसे बडा पाप था । यदि राष्ट्रवादी सरकार होते हुए भी विधिमंत्री इस विषय पर कोई भी विचार, चर्चा या वाद-विवाद करने के इच्छुक नहीं हैं, तो इससे अधिक दुःखद क्या हो सकता है ? ऐसा प्रतीत होता है कि केन्द्र में राष्ट्रवादी सरकार होते हुए भी कोई लाभ नहीं है ! |

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