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नई देहली – राज्य में पहली कक्षा से तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी भाषा को अनिवार्य करना है अथवा नहीं ?, इसका निर्णय अब महाराष्ट्र की सरकार को ही लेना पडेगा । राज्य में हिन्दी भाषा को अनिवार्य बनाने के विषय में महाराष्ट्र द्वारा निरस्त शासन निर्णय के सूत्र पर तमिलनाडू के ‘डी.एम्.के.’ (द्रविड मुन्नेत्र कळघम् अर्थात द्रविड प्रगति संघ) दल के सांसद माथेश्वरन् वी.एस्. ने लोकसभा में यह प्रश्न उठाया । केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने इस प्रश्न का लिखित उत्तर दिया है । इस उत्तर में चौधरी ने कहा, ‘‘त्रिभाषा सूत्र के अंतर्गत कौनसी भाषाएं सिखानी हैं ?’, इस पर राज्य सरकार को निर्णय लेना है । महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार को उसका पिछला शासन निरस्त करने की जानकारी दी है, जब भी त्रिभाषा सूत्र स्थाई रहेगा; परंतु भाषा कौनसी सिखानी हैं ?’, यह निर्णय राज्य सरकार का होगा । उस पर केंद्र सरकार का कोई बंधन नहीं है । माध्यमिक शिक्षा पूरी होने तक छात्रों को ३ भाषाएं सिखनी हैं । अतः छात्र ६ठी अथवा ७वीं कक्षा में अपनी भाषाएं चुन सकते हैं; परंतु इन ३ में से २ भाषाएं भारतीय होनी चाहिएं, यही केवल राष्ट्रीय शिक्षा नीति की दृष्टि से केंद्र सरकार की अपेक्षा है ।’’ इसलिए अब राज्य में हिन्दी अनिवार्य बनानी है अथवा नहीं ?’, इसका निर्णय राज्य सरकार को ही लेना है ।
हिन्दी भाषा को अनिवार्य बनाने के संदर्भ में अब तक का घटनाक्रम !
१. कुछ दिन पूर्व महाराष्ट्र में तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी भाषा को अनिवार्य करने के सूत्र पर वातावरण बहुत गर्म था । महाराष्ट्र के अनेक राजनीतिक दल तथा संगठनों की ‘पहली कक्षा से हिन्दी भाषा अनिवार्य न हो’, यह भूमिका थी ।
२. इस अनिवार्यता के विरुद्ध महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने आवाज उठाई । उसके उपरांत राज ठाकरे के भाई उद्धव ठाकरे ने भी आंदोलन की चेतावनी दी । इसके साथ ही अनेक संगठन, कलाकार आदि ने भी इस निर्णय का विरोध किया ।
३. पूरे राज्य से हो रहे बढते विरोध के कारण अंततः राज्य सरकार को त्रिभाषा सूत्र के विषय में जारी किए गए दोनों शासन निर्णयों को वापस लेना पडा था ।
४. इसके उपरांत राज्य सरकार ने त्रिभाषा सूत्र का अध्ययन करने हेतु डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की । इस समिति का ब्योरा प्राप्त होने के उपरांत ही त्रिभाषा सूत्र के विषय में आगे का निर्णय लिया जाएगा ।
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