सूचना युद्ध : भारत के सामने बडी चुनौती तथा नागरिक के रूप में स्वयं की भूमिका !

युद्ध अथवा सीमावर्ती कार्यवाही केवल सेना के सामर्थ्य पर निर्भर नहीं होती, अपितु सेना की वास्तविक शक्ति जनता का समर्थन तथा राष्ट्रभावना से प्रभावित कृतिशील जनता होती है । ऐसी स्थिति में देश की एकजुटता टिकाए रखना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । जहां १४० करोड जनता एक साथ भारतीय सेना के साथ खडी होते हुए भी कुछ विरोधियों ने पहलगाम आतंकवादी आक्रमण पर प्रश्न उठाए । कुछ राजनेताओं ने तो ‘आतंकियों ने धर्म पूछकर गोलियां चलाई ही नहीं’, यह भूमिका तक ली । भारत ने ९ आतंकी अड्डों को ध्वस्त कर ‘‘ऑपरेशन सिंदूर’ सफल किया । इस कार्यवाही में १०० से अधिक आतंकी मारे गए । पाकिस्तान द्वारा भारत पर दागे गए क्षेपणास्त्रों तथा ड्रोन्स का भारत ने मुंहतोड जवाब दिया । इसमें पाकिस्तान के हवाई अड्डे तथा गोलाबारूद के भंडार को बडी हानि पहुंची । इसके कारण ही पाकिस्तान ने घुटने टेककर भारत से युद्धविराम की मांग की, जो स्वीकार की गई ।

कुछ लोगों को भारत-पाकिस्तान युद्ध चाहिए था, तो अनेक लोगों ने पाक अधिकृत कश्मीर वापस लेने की मांग की थी । कुछ लोगों ने कहा कि ‘देश बिना जीते ही युद्ध का विजय मना रहा है ।’ पाकिस्तान ने उसकी हुई हानि की विस्तृत सूची भी प्रकाशित की । भारत का उद्देश्य सफल हुआ; परंतु भारत-पाकिस्तान युद्ध की प्रतीक्षा करनेवाले विरोधियों का उद्देश्य सफल न होने से उन्होंने केंद्र सरकार पर आलोचना की झडी लगाई ।

१. देशहित पर राजनीतिक आलोचना : कुछ प्रश्न 

पहलगाम आतंकवादी आक्रमण

भारत सरकार ने जहां अनेक देशों में सर्वदलीय शिष्टमंडल भेजने का निर्णय लिया था, ऐसे में कुछ राजनीतिक दल ‘प्रमाण दीजिए, इसमें पारदर्शिता कहां है ?’, ऐसी मांगें करते हुए दिखाई देते हैं । न्यूनतम देशहित के विषयों पर तो सर्वदलीय एकजुट अपेक्षित है ।

अनेक लोग यह पूछते हैं, ‘हमने कितने विमान गंवाए ?’; परंतु ये लोग ‘इस युद्ध में भारतीय सेना ने कितने पाकिस्तानी विमान गिराए अथवा कितने हवाई अड्डे ध्वस्त किए ?’, यह प्रश्न कभी नहीं पूछते ।

पहलगाम के आतंकी आक्रमण के विषय में कुछ लोगों ने कहा, ‘‘भाई-भाई को आपस में लडाने के लिए यह घटना हुई है ।’; परंतु इसमें ‘कौन और किसका भाई ?’, यह उन्हें स्पष्ट करना चाहिए । इन लोगों को अभी कितनी बार ऐसे आतंकी ‘भाईयों’ का आश्रय बनना है ? आतंकियों ने केवल हिन्दू होने के कारण २६ हिन्दुओं को उनकी पत्नियों तथा बच्चों के सामने मार दिया । क्या वे पुरुष मुसलमान हैं ?, इसकी पडताल करने के लिए उन्होंने उनके पैजामे उतरवाए । तब भी कुछ नेता कहने लगे, ‘‘क्या आतंकियों के पास इतना समय होता है कि वे किसी का धर्म पूछकर उन्हें मारेंगे ?’’ इसका अर्थ यही है कि ‘आतंकी आक्रमण के पीडित परिवार झूठ बोल रहे हैं । इन लोगों ने पीडितों को झूठा मानकर आतंकी ‘धर्मांध’ नहीं थे, ऐसा बताने का साहस कैसे किया ? एक राज्य के मुख्यमंत्री ने तो ‘पाकिस्तान के साथ युद्ध नहीं चाहिए’, ऐसा मत व्यक्त किया । इन लोगों को पाकिस्तान के प्रति इतना प्रेम क्यों ? साथ ही ‘उन आतंकियों ने महिलाओं को हाथ भी नहीं लगाया’, ऐसा भी कुछ लोगों ने कहा । आतंकियों ने केवल पुरुषों को मारा, महिलाओं को नहीं मारा; क्या इसके लिए उनका आभार व्यक्त किया जाए ? क्या वोटबैंक के लिए लाचार बनकर कुछ राजनेता कोई भी वक्तव्य दे सकते हैं ?

परंतु इस घटना के उपरांत एक बात सिद्ध हुई कि इस देश का शत्रु सीमापार ही नहीं, अपितु भारत के अंदर भी घात लगाकर बैठा है । समाजकारण, राजनीति एवं प्रसारमाध्यमों में स्थित देश के शत्रुओं का खुलेआम अथवा छिपा समर्थन करनेवाले इन विषैले सापों का क्या करना चाहिए ?, यही प्रश्न है ।

२. आंतरिक शत्रुओं पर कठोर कार्रवाई की आवश्यकता

सीमा के बाहर तथा अंदर गृहयुद्ध पुकारनेवाले ऐसे लोगों पर कठोर कार्रवाई होना आवश्यक ही है । इन देशद्रोहियों को कुचला ही जाना चाहिए ।

ब्रिगेडियर हेमंत महाजन (सेवानिवृत्त)

३. भारतविरोधी प्रचार

पाकिस्तान एवं चीन ने सूचना युद्ध (इंफर्मेशन वॉरफेयर) में विजय प्राप्त करने के लिए भारतविरोधी अथवा देशद्रोही प्रचार का पूरा उपयोग कर लिया है । पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने एक पत्रकार वार्ता में अंतरराष्ट्रीय माध्यमों पर वीडियो दिखाया । उसमें भारत के प्रसिद्ध पत्रकार करण थापर कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के साथ भेंटवार्ता कर रहे थे । उस भेंटवार्ता में सत्यपाल मलिक ने बताया, ‘पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के सैनिकों को पाकिस्तानी आतंकियों ने नहीं, अपितु भारत ने ही मारा था तथा उसका झूठा आरोप पाकिस्तान पर लगाया ।’ जब पुलवामा का आक्रमण हुआ था, उस समय सत्यपाल मलिक कश्मीर के राज्यपाल थे; इसलिए उनके वक्तव्य को महत्त्व दिया जाता है ।

पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय माध्यमों के सामने १०० से अधिक भारतीयों के वीडियो दिखाए, जिनमें ये भारतीय भारतविरोधी भाषा बोल रहे थे तथा पाकिस्तान का पक्ष रखते हुए यह सिद्ध कर रहे थे कि भारत द्वारा अथवा भारतीय प्रवक्ताओं द्वारा दी गई जानकारी गलत थी तथा पाकिस्तान जो बता रहा था, वह उचित था ।

४. पाकिस्तान को प्राप्त ‘मानसिक विजय’

क्या इस युद्ध में पाकिस्तान ने बडी मानसिक विजय प्राप्त की ? पाकिस्तान ने आतंकवाद अथवा आतंकी आक्रमणों से विश्व का ध्यान भटकाया तथा ‘भारत कश्मीर में अपने नागरिकों की रक्षा नहीं कर पाया । पाकिस्तान ने भारत को बडी सामरिक हानि पहुंचाई है । युद्ध में भारत की पराजय हुई है तथा पाकिस्तानी सेना ने बहुत बडा पराक्रम दिखाया है ।’, इस पर ध्यान केंद्रित किया ।

इसका परिणाम यह हुआ कि पश्चिमी माध्यमों द्वारा लिखे लेख अथवा संपादकीय अधिकांशत: भारत के विरोध में तथा पाकिस्तान के पक्ष में थे । वास्तव में देखा जाए, तो पश्चिमी माध्यमों को भारत का समर्थन करना चाहिए था; क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है; परंतु उन्होंने सेना की कठपुतली बने पाकिस्तान का कहना सही है, ऐसा बताया । पश्चिमी माध्यमों ने इस प्रकार के मत बनाए जाने में भारत के अंदर के कुछ भारतियों द्वारा दिए गए देशविरोधी वक्तव्यों का बहुत उपयोग किया ।

संक्षेप में कहा जाए, तो सूचना युद्ध में अथवा मानसिक युद्ध में भारत बहुत पीछे रहा । अब पाकिस्तान को यह मानसिक युद्ध जीतने में उसकी सहायता करनेवाले भारत के अंदर के लोगों पर क्या कार्रवाई करनी चाहिए, यह भारतीय जनता को सुनिश्चित करना होगा ।

५. देशविरोधी प्रचार पर लगाम लगाने के उपाय

विदेशी समाचारपत्रों के अनेक पत्रकार जो भारत के विरुद्ध लिखते हैं, उनकी पहचान कर उनके विरुद्ध कार्रवाई करना भी आवश्यक है, उदा. भारत में उनका बहिष्कार किया जा सकता है । उनका भारत आने का ‘वीजा’ रोका जा सकता है । केवल इतना ही नहीं, अपितु वे जिस समाचारपत्र में लिखते हैं, उस समाचारपत्र का भी बहिष्कार किया जा सकता है अथवा उन्हें भारत के अंदर ‘ब्लॉक’ (प्रतिबंधित) किया जा सकता है । ‘ऑपरेशन सिंदूर’ समाप्त होकर बहुत दिन बीत गए हैं; परंतु अभी भी यह दुष्प्रचार युद्ध अथवा मानसिक स्तर का युद्ध जारी है ।

६. नागरिक के रूप में स्वयं का दात्यिव निभाएं अर्थात ‘सूचनायोद्धा बनें !

ऐसे युद्ध में देशभक्त नागरिक अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं । विदेशों के सामाजिक माध्यमों, प्रिंट मीडिया (समाचारपत्र, मासिक) अथवा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जब-जब भारत के विरुद्ध कुछ बोला जाएगा, उसका संबंधित माध्यम से ही तुरंत उत्तर देना आवश्यक है, उदा. ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने यदि कोई भारतविरोधी लेख लिखा, तो ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ को ई-मेल भेजकर लेख में दी गई जानकारी का खंडन करना चाहिए तथा उन्हें यह दिखा देना चाहिए कि उनके द्वारा लिखा गया लेख संपूर्णत: अनुचित है । अंतरराष्ट्रीय माध्यमों की व्यापकता प्रचंड है; इसलिए प्रत्येक शिक्षित भारतीय को ‘सूचना योद्धा’ बनकर इस प्रकार के भारतविरोधी लेखन पर ध्यान रखकर उसका उत्तर देना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । क्या हम ऐसे उत्तरदायित्व निभाने के लिए तैयार हैं ?

– ब्रिगेडियर हेमंत महाजन (सेवानिवृत्त), पुणे, महाराष्ट्र.

‘ऑपरेशन सिंदूर’ का अर्थ है पाकिस्तान सहित राष्ट्रद्रोही शक्तियों को दिया गया एक निर्णायक संदेश !

‘ऑपरेशन सिंदूर’ केवल एक सैनिकी कार्रवाई नहीं है, अपितु वह आतंकी, पाकिस्तान तथा देश की आंतरिक राष्ट्रद्रोही शक्तियों को दी गई एक निर्णायक चेतावनी है । भारत अब केवल प्रतिक्रिया देनेवाला एक राष्ट्र नहीं रह गया है, अपितु वह निर्णायक कृति करनेवाला, विश्वसनीयता बनाए रखनेवाला तथा दायित्वपूर्ण कार्रवाई करनेवाले देश के रूप में विश्वस्तर पर उभर रहा है । यह सफलता एक रात में नहीं मिली है, अपितु विगत दशक की दूरदृष्टि, संकल्प तथा निरंतर प्रयासों का वह फल है । इस सफलता को स्थाईरूप से बनाए रखना हो, तो राजनीतिक, सामाजिक एवं वैचारिक स्तर पर ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना से एकत्रित होना ही समय की मांग है । राष्ट्रद्रोही शक्तियों को कुचल देना ही चाहिए !

– ब्रिगेडियर हेमंत महाजन (सेवानिवृत्त)