परात्पर गुरु पांडे महाराजजी द्वारा चैतन्यमय शब्दों में वर्णित गुरुमहिमा !

गुरु की आवश्यकता

१. ‘बाल्यावस्था से ही बालक को अक्षर की पहचान तथा आगे चलकर सभी विषयों के ज्ञानार्जन के लिए गुरु की आवश्यकता होती है । भौतिक ज्ञान का विषय पढानेवाले शिक्षक उस विषय की भौतिक जानकारी देकर अपना कर्तव्य निभा सकते हैं, किंतु अध्यात्म के मार्ग में गुरु के बिना ईश्वरप्राप्ति सहजता से नहीं हो सकती ।

२. गुरु ही मनुष्य को उसके उद्धार का मार्ग दिखाते हैं तथा उससे साधना करवाते हैं । इससे मनुष्य अपना कल्याण कर अपने जीवन में ‘ईश्वरप्राप्ति’ का ध्येय साध्य कर सकता है ।

३. गुरु के बिना कोई भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता । जिस प्रकार रोगनिवारण के लिए योग्य वैद्य की आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार इस भवसागर से तर जाने के लिए जीव के स्वभावदोष, दुर्गुण, मनोभूमिका, आत्मिक स्तर तथा प्रगति के जानकार गुरु की आवश्यकता होती है ।

४. योग्य गुरु शिष्य को केवल आत्मकल्याण का मार्ग ही नहीं बताते, अपितु उसके लिए उसे योग्य साहस, बल एवं उत्साह भी देते हैं ।

५. गुरुकृपायोग के अनुसार साधना करते समय केवल शिक्षा ही पर्याय नहीं रहता, यहां गुरु द्वारा शिष्य को प्रसादरूप में आत्मबल प्राप्त हो सकता है । इसके लिए तपस्वी गुरु की आवश्यकता होती है । ऐसे गुरु के पास साधना, तपस्या, विद्या एवं आत्मबल का सामर्थ्य होना आवश्यक है ।

मानव जीवन के कल्याण हेतु गुरु के बिना पर्याय नहीं !

(परात्पर गुरु) परशराम पांडे महाराजजी


कळे ते ना कळे । ना कळे ते कळे ।

वळे ते ना वळे गुरुविणे ।। – हरिपाठ

अर्थ : मनुष्य को अपने उद्धार के लिए जो जानना चाहिए, वह समझ में नहीं आता, किंतु जिससे मायापाश में फंसकर अकल्याण होगा, वह अच्छी तरह समझ में आता है; इसलिए अपनी विकृति (स्वभावदोष तथा अहं) नष्ट कर, अर्थात बुरी आदत छोडकर अच्छी आदतों के लिए (सच्चे उद्धार के लिए) गुरु के बिना पर्याय नहीं है ।

– (परात्पर गुरु) परशराम पांडे महाराजजी (२.७.२०१८)

आचार्याें का महत्त्व

१. ‘आचार्य’ किसे कहें ?

अ. ‘जो शास्त्र जानते हैं, स्वयं सदाचारी होकर जनता को सदाचार तथा धर्माचरण में लगाते हैं, उन्हें ‘आचार्य’ कहते हैं ।’ (लिंगपुराण (जालस्थल से)

आ. ‘स्वयं श्रेष्ठ आचरण करनेवाला एवं दूसरों को वैसे आचरण की प्रेरणा देनेवाला, शास्त्र के मर्मज्ञ को ‘आचार्य’ कहते हैं ।’ (वायुपुराण)

२. सभी गुरुओं में ‘आचार्य’ ही सबसे श्रेष्ठ !

उपाध्याय, पिता, माता, ज्येष्ठ बंधु, राजा, मामा, श्वसुर, मातामह, पितामह तथा ब्राह्मण, यह दस गुरु कहलाते हैं । इन सबमें श्रेष्ठ गुरु ‘आचार्य’ को कहा गया है ।

३. साधक के पुरुषार्थ को अध्यात्म द्वारा जागृत करनेवाले आचार्य ही सच्चे अर्थाें में जन्मदाता होते हैं ।

यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।

तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ।।

– श्वेताश्वतरोपनिषद्, अध्याय ६, वाक्य २३

अर्थ : जिस शिष्य के मन में परमात्मा के समान गुरु की भक्ति है, उसके हृदय में ज्ञान प्रकाशित होता है । माता-पिता केवल जन्मदाता हैं; किंतु आचार्य अध्यात्म के द्वारा साधक का पुरुषार्थ जागृत करते हैं; इसलिए सच्चे अर्थ में वही जन्मदाता हैं ।

गुरुपूर्णिमा का महत्त्व !

‘प्राचीन काल में गुरुकुल के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी । गुरु से जीवन का सत्यज्ञान सीखने के कारण शिष्य का जीवन सफल होता था । गुरु से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए शिष्य गुरुपूर्णिमा मनाते हैं । इस दिन गुरुतत्त्व अपने दिव्य चैतन्यप्रकाश से प्रकाशित होकर आनंदावस्था में रहता है । वे जिस शिष्य पर प्रसन्न होते हैं, उस पर उनकी कृपा हजार गुना होती है । इस कारण इस दिन का महत्त्व अनन्यसाधारण है । पूर्णिमा के दिन चंद्र पूर्ण कला से प्रकाशित होता है, उसी प्रकार शिष्य की साधना में प्रगति करवाते हुए गुरु उसे पूर्णता की ओर ले जाते हैं । ऐसे ब्रह्मस्वरूप गुरु को हम नमस्कार करते हैं ।’

– (परात्पर गुरु) पांडे महाराज, सनातन आश्रम, पनवेल. (३०.६.२०१४)

गुरुदेव की कृपा से भवसागर तरकर जाया जा सकता है ।

गुरु जब जीवन में आते हैं, तो वे चरण-दर-चरण ‘कृति, कर्म, दृष्टांत, साक्षात्कार, अनुभूति से सिखाना, स्वस्वरूप की अनुभूति देना, अस्तित्व से सिखाना एवं आत्मज्ञान करा देना’, इन माध्यमों से जीव की प्रत्येक चरण पर होनेवाली यात्रा अपनी कृपा के बल पर तथा संकल्पशक्ति के बल पर सहजता से करवा लेते हैं । इस कारण जीव की भवसागर से शीघ्र मुक्ति होती है ।