महर्षि व्यासपूर्णिमा (गुरुपूर्णिमा)

महाभारत काव्य बताते महर्षि व्यास एवं उसे लिखते श्री गणेश

‘तस्मै श्री गुरवे नमः ।’ अर्थात ‘मैं उन गुरु को नमस्कार करता हूं ।’

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र ।

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ।।

अर्थ : संपूर्णतया खिली कमल की पंखुडी जैसी मोटी आंखोंवाले विशाल बुद्धि के व्यासजी, जिन्होंने महाभारतरूपी तेल से संपूर्ण ज्ञानमय दीप प्रज्वलित किया, ऐसे आपको नमस्कार !

ज्ञानमयः प्रदीपः ।

अत्यंत विशाल बुद्धि तथा खिली हुई कमल की पंखुडियों की भांति विशाल नेत्रवाले, जिन्हें पूरे हिन्दुस्थान में ज्ञान का दीप प्रज्वलित कर अज्ञानरूपी अंधकार दूर करने में सहायता की, उन महर्षि व्यासजी को नमस्कार ! महर्षि व्यासजी का ज्ञानदान का कार्य इतना प्रधान एवं लक्षणीय है कि हम उनका स्मृतिदिवस ‘गुरुपूर्णिमा’ के रूप में मनाते हैं । उनकी सीख संस्कृति को बनानेवाली है । व्यासः महर्षि मत्स्यकन्या सत्यवतीजी एवं ऋषिवर्य पराशरजी के पुत्र ! वे महान ज्ञानी थे । भिन्न-भिन्न ऋषियों के पास बिखरी पडी वेदों की ऋचाओं को एकत्रित कर तथा उनका वर्गीकरण कर उन्होंने ४ वेद बनाने का कार्य किया; इसलिए उन्हें वेदव्यास भी कहा जाता है ।

महर्षि व्यास अर्थात बिना ३ वदनवाले ब्रह्माजी, दो ही हाथवाले श्रीहरि तथा तृतीय नेत्ररहित भगवान शिवजी हैं । आगे जाकर अनेक विद्वान सनातन भारतीय धर्म की नींव ब्रह्मसूत्रों पर भाष्य करने का मोह टाल नहीं सके । आद्य शंकराचार्यजी ने भी उस पर भाष्य किया, यह उस तत्त्वज्ञान की विशेषता है ।

कुरुक्षेत्र पर महायुद्ध के समय भगवान ने अर्जुन की आड में इसी तत्त्वज्ञान को लोगों के लिए उसे स्वयं सुगम कर विशद किया । महर्षि व्यासजी ने भगवद्गीता के नाम से उस उपदेश का शब्दांकन करने का महान कार्य किया । आज भी जीवन के कुरुक्षेत्र पर भगवद्गीता कदम-कदम पर हमारा मार्गदर्शन करती है । उसे उपलब्ध कराना, तो महर्षि व्यासजी के पूरे विश्व पर अनंत उपकार हैं । १ लाख महाकाव्यों के ‘महाभारत’ की रचना भी व्यासजी की ही है !

सभी मनुष्यों की बुद्धि एकसमान नहीं होती, साथ ही भारी सिद्धांतों की अपेक्षा रंजक बातें अधिक परिणामकारक होती हैं, इसे वे भलीभांति जानते थे । मूर्ख एवं पंडित की बुद्धि जहां समानरूप से चलती है, ऐसी बात है दृष्टांत अथवा कथा ! व्यासजी ने अति अल्पमति मनुष्य के लिए भी भवसागर पार करने का मार्ग सुगम बनाया है ।

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे ।

धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।।

– महाभारत, पर्व १८, अध्याय ५, श्लोक ६२

अर्थ : (महर्षि व्यासजी कहते हैं) मैं बांहें फैलाकर ऊंचे स्वर में चिल्लाते हुए यह बता रहा हूं; परंतु कोई भी मेरी बात नहीं सुनता । धर्म से ही अर्थ एवं काम प्राप्त होते हैं, लोग उसका आचरण क्यों नहीं करते ?

मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर कंठशोष कर विश्व को मानवी जीवन का सारगर्भ बताता हूं; परंतु उसे कोई नहीं सुनता । ‘अर्थ एवं काम की प्राप्ति तो वास्तव में धर्म के पालन से ही होती है, तब भी लोग धर्म का पालन क्यों नहीं करते ?’ जैसे विचार व्यासजी को अस्वस्थ बना रहे थे । मन की ऐसी स्थिति में नारदजी उनसे मिले । उन्हें देवर्षि नारद को अपनी व्यथा बताई । नारदजी ने कहा, ‘अलंकारिक शब्द, रस एवं भाव से युक्त ऐसा चाहे कितना भी समृद्ध साहित्य लिखा जाए, तब भी जब तक श्रीकृष्णकथा का कथन नहीं किया जाता, तब तक सबकुछ व्यर्थ है । असुंदर रचना, दूषित शब्द, अलंकारहीन भाषा, रसोत्पत्ति का अभाव, ऐसा होते हुए भी प्रत्येक शब्द में यदि श्रीकृष्णस्तुति अथवा श्रीकृष्ण की भक्ति का वर्णन हो, तो वह रचना श्रेष्ठ सिद्ध होती है ।

आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।

बुद्धिर्हि तेषामधिको विशेषो बुद्ध्या विहीनः पशुभिः समानः ।।

अर्थ : मनुष्य एवं पशुओं में आहार, निद्रा, भय एवं मैथुन, ये बातें समान हैं । बुद्धि मनुष्य को प्राप्त एक अतिरिक्त विशेष बात है । बुद्धिहीन (मनुष्य) पशुसमान है ।

गुरु कैसे होने चाहिए ?, इसे समर्थ रामदासस्वामीजी के शब्दों में बताना हो, तो

जनीं भक्त ज्ञानी विवेकी विरागी । कृपाळू मनस्वी क्षमावंत योगी ।।

प्रभू दक्ष व्युत्पन्न चातुर्य जाणे । तयाचेनि योगे समाधान बाणे ।।

– मनाचे श्लोक, श्लोक १८३

अर्थ : जो ज्ञानी होते हुए भी भक्त, विवेकी, विरक्त, कृपालु, उदार मनवाला, क्षमाशील एवं स्थितप्रज्ञ होता है, वह मानो भगवान का ही रूप प्रतीत होता है । नित्य सावधान, विद्वान, अपनी चतुराई से शिष्यों का प्रबोधन करनेवाले, ऐसे उसके प्रसन्न दर्शन से संतोष प्राप्त होता है ।

ऐसे गुरु के पास संतोष प्राप्त होता है । समर्थ रामदासस्वामीजी द्वारा बताए गए सभी गुण वेदव्यासजी में समाहित हैं; इसलिए हम उन्हें ‘जगद्गुरु’ कहते हैं । स्वयं व्यासजी उनके शिष्यों को उनके नाम का जाप करने के लिए नहीं कहते अथवा न ही उनकी पूजा करने के लिए कहते हैं । इसके विपरीत, भागवतपुराण में वे स्पष्टता से बताते हैं, ‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।’ अर्थात ‘जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूं ।’

– श्रीमती ललिता सुनील मोदी, पेण, रायगड, महाराष्ट्र.

(साभार : ‘वैष्णव जागृति’)