‘डूम्सडे’ मछली के दिखाई देने से दुनिया में चिंता का वातावरण !

(‘डूम्सडे’ अर्थात् सृष्टि का अंतिम दिन । हिन्दू धर्म के अनुसार इसे प्रलयकाल कहा जा सकता है ।)

चेन्नै (तमिलनाडु) – जब संपूर्ण विश्व तृतीय विश्वयुद्ध के द्वार पर खडा है, ऐसे समय में एक और कारण से संसार को चिंता सताने लगी है । कारण है ‘डूम्सडे’ नामक मछली ! तमिलनाडु के समुद्र में यह विशालकाय मछली दिखाई दी है । यह इतनी लम्बी थी कि उसे पकडने के लिए ७ व्यक्ति लगे । यह मछली समुद्र में अत्यन्त गहराई में रहने वाली होती है और उसका दिखाई देना किसी बडे प्राकृतिक संकट का संकेत माना जाता है । इस कारण विश्वभर में चिंता का वातावरण निर्मित हुआ है ।

१. वर्ष २०१० में जापान के तटों पर ऐसी अनेक मछलियां मृत पाई गई थीं । इसके पश्चात् एक वर्ष में ही जापान में भूकम्प और सुनामी आई थी, जिसमें १५ सहस्र नागरिकों का निधन हुआ था ।

२. गत तीन सप्ताहों में यह मछली चार ४ बार दिखाई दी । भारत और न्यूजीलैण्ड में एक बार, तथा ऑस्ट्रेलिया में दो बार यह मछली देखी गई । विशेष बात यह है कि ‘जापान की बाबा वेंगा’ कही जाने वाली भविष्यवक्ता रायो तात्सुकी (गत शतक की युरोप की महिला भविष्यवक्ता) ने वर्ष २०२१ में लिखी गई एक पुस्तक में जुलाई २०२५ में एक बडे प्राकृतिक संकट की भविष्यवाणी की थी ।

३. गहरे समुद्र में जल की अत्यधिक गति या गतिविधियां बढने पर बडा प्राकृतिक संकट आ सकता है । इसी कारण से यह मछली ऊपर आ जाती है, ऐसी मान्यता है ।

‘डूम्सडे’ मछली की विशेषताऐं :

१. ‘डूम्सडे’ मछली को ‘ओअरफिश’ भी कहा जाता है । इसका वैज्ञानिक नाम ‘रेगेलेकस ग्लेस्ने है ।
२. इसकी लम्बाई लगभग ग्यारह ११ फीट होती है ।
३. यह मछली समुद्र की लगभग तीन सहस्र फीट गहराई में रहती है । इतनी गहराई में प्रकाश नहीं पहुंचता, जिससे वहां का तापमान अत्यन्त न्यून रहता है ।

लोककथाएं क्या कहती हैं ?

इस मछली के विषय में अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं । इसे दुर्भाग्य, मृत्यु या बडे प्राकृतिक संकट का संकेत माना जाता है । यह मछली यदि दिखाई दे, तो उसे भूकम्प या सुनामी की चेतावनी माना जाता है ।

विज्ञान क्या कहता है ?

‘डूम्सडे’ मछली को यदि कोई चोट या रोग हो, तभी वह समुद्र की सतह पर आती है । समुद्र के जल के तापमान में परिवर्तन होने पर अथवा जलवायु में बदलाव आने पर भी यह मछली ऊपर आ जाती है, ऐसा विज्ञान कहता है ।