हवन के द्वारा उपचार करने के लिए मिली मान्यता !

अजमेर (राजस्थान) – अजमेर मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी (सूक्ष्मजीवशास्त्र) विभाग की डॉ. विजयलता रस्तोगी को हवन के द्वारा उपचार करने का ‘पेटंट’ (स्वामित्व) मिला है । पेटंट मिलने का अर्थ इस उपचारपद्धति को वैज्ञानिकदृष्टि से वैध माना गया है ।
१. अपने अनेक वर्षाें के शोधकार्य से उन्होंने यह प्रमाणित किया है कि हवन सामग्री में उपयोग की जानेवाली औषधि वनस्पतियां तथा प्राकृतिक घटकों से निर्माण होनेवाले धुएं में कुछ विशिष्ट हानिकारक जीवाणुओं को (बैक्टेरिया को) नष्ट करने की क्षमता रखता है।
२. कुछ विशिष्ट हवन सामग्री में जिवाणुनाशक गुणधर्म होते हैं, जो संक्रमण फैलानेवाले बैक्टेरिया पर सीधा परिणाम करते हैं ।
हवन के द्वारा उपचार कैसे किए जाते हैं ?
रोगी को एक विशेष कक्ष में रखा जाएगा, उस कक्ष में हवन किया जाएगा तथा उसका धुआं पूरे कक्ष में फैलाया जाएगा । रोग उस धुएं को सांस के द्वारा ग्रहण करेगा तथा उससे उसके शरीर में स्थित हानिकारक बैक्टेरिया पर उसका परिणाम होगा । राजस्थान सरकार ने इस उपचारपद्धति के लिए अपने अर्थसंकल्प में निधि का प्रावधान किया है ।
इस पर वैज्ञानिक क्या कहते हैं ?
वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के शोध में यह कहा गया है कि हवन के कारण वातावरण में स्थित हानिकारक सूक्ष्म जिवाणुओं की संख्या ९४ प्रतिशत तक घट सकती है । हवन के कारण घरों में तथा चिकित्सालयों में हवा के द्वारा होनेवाली बीमारियों की संभावना अल्प हो जाती है ।
अन्य अनेक शोधों से भी यह सिद्ध हुआ है कि हवन के कारण पर्यावरण शुद्ध होता है । जहां हवन किया जाता है, वहां हानिकारक जिवाणुओं की संख्या अल्प होती है ।
इससे पूर्व राजस्थान के शिक्षामंत्री मदन दिलावर ने कहा था कि हवन में मात्र १० ग्राम देसी गाय का घी डालने से एक टन ऑक्सिजन उपलब्ध होती है । आज इस वक्तव्य की सच्चाई ध्यान में आती है ।
संपादकीय भूमिकाहिन्दुओं की धार्मिक कृतियों के पीछे विज्ञान है, जिसका लाभ मनुष्य एवं प्रकृति को मिलता है, यह उनका ठीक से अध्ययन करने पर ध्यान में आता है; परंतु हिन्दूद्वेषी, नास्तिकतावादी तथा आधुनिकतावादी ‘हमें बहुत ज्ञान है’, इस अहंभाव से हिन्दुओं की धार्मिक कृतियों की आलोचना करते हैं, यह ध्यान रखें ! |
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