China’s Debt Trap : चीनी ड्रैगन के शिकंजे में १५० देश : गरीब देशों पर ₹९४ लाख करोड का ऋण !

  • ४२ देशों पर चीन द्वारा दिया गया ऋण उनकी ‘जीडीपी’ के १० प्रतिशत से भी अधिक !

  • ऋण चुकता न कर पाने की स्थिति में सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने का अधिकार चीन को सौंपा गया !

(जीडीपी का अर्थ है ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट, अर्थात् सकल देशांतर्गत उत्पादन)

बीजिंग (चीन) – चीन विश्व का सबसे बडा ऋण वसूल करने वाला देश बन गया है । ऑस्ट्रेलिया की शोध संस्था ‘लोवी इन्स्टिट्यूट’ के अनुसार, चीन वर्ष २०२५ तक विकासशील देशों से लगभग ₹३ लाख करोड की वसूली करेगा । इनमें से भी ७५ सबसे गरीब देश लगभग ₹२ लाख करोड की राशि चीन को लौटाएंगे । वर्तमान में विकासशील देशों पर चीन का कुल ऋण ₹९४ लाख करोड है । साथ ही ४२ देशों पर उनकी सकल देशांतर्गत उत्पादन (जीडीपी) के १० प्रतिशत से अधिक का ऋण चीन का है । चीन के दबाव के कारण इन देशों में स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे क्षेत्र संकट में आ गए हैं ।

ऋण की राशि न चुका पाने पर प्राकृतिक संसाधनों या संपत्तियों को गिरवी रखने की कठोर शर्तें रखी गई हैं । श्रीलंका, वेनेजुएला और अंगोला जैसे देशों में ऐसा किया गया है । ये देश विकास की दिशा में अग्रसर होने के स्थान पर अब संसाधनों का उपयोग कर चीनी ऋण चुका रहे हैं ।

चीन के ऋण का ऐसा है शिकंजा !
१. विकासशील देश चीन को ऋण चुकाने की लहर से संघर्ष कर रहे हैं ।

२. चीन की आक्रामक ऋण नीति ‘बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव’ परियोजना से प्रारंभ हुई । राष्ट्रपति शी चिनपिंग ने वर्ष २०१३ में इसका आरंभ किया । इस परियोजना से १५० देश जुड चुके हैं । वैश्विक ‘जीडीपी’ में इन देशों की भागीदारी ४० प्रतिशत है ।

३. वर्ष २०१७ में ही चीन ‘विश्व बैंक’ और ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ को पीछे छोडते हुए विश्व का सबसे बड़ा ऋणदाता बन गया ।

४. ५३ देशों के लिए चीन सबसे बडा ऋणदाता देश है ।

चीनी ऋण से देशों की आर्थिक कमर टूटी !
१. वर्ष २०२२ तक कुल चीनी ऋण में से ६० प्रतिशत ऋण आर्थिक संकट में फंसे देशों को दिया गया । वर्ष २०१० में यह आंकडा केवल ५ प्रतिशत था । चीन द्वारा दिए गए ऋण पर ब्याज दरें ४.२ से ६ प्रतिशत तक हैं । वहीं आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन की दर केवल १.१ प्रतिशत है । अधिक ब्याज दर के कारण कई देशों को ऋण चुकाने में कठिनाई हो रही है ।

२. पाकिस्तान : वर्ष २०२४ में चीन ने पाकिस्तान में ₹१७ हजार करोड का निवेश किया तथा ऋण अवधि को भी बढा दिया ।

३. अंगोला : अफ्रीकी देश अंगोला ने मार्च २०२४ में चीन के साथ मासिक किश्तों को कम करने पर सहमति बनाई ।

४. श्रीलंका : वर्ष २०२२ में श्रीलंका ऋण चुकता न कर सका और ‘डिफॉल्टर’ बन गया । परिणामस्वरूप उसे अपना हम्बनटोटा बंदरगाह ९९ वर्षों के पट्टे पर चीन को देना पड़ा ।

५. झांबिया : वर्ष २०२० में झांबिया ऋण भुगतान में विफल रहा । ऋण पुनर्गठन पर चर्चा जारी है ।

६. लाओस : यह देश आर्थिक दबाव में है । उसका ऋण उसकी ‘जीडीपी’ से भी अधिक हो गया है ।

संपादकीय भूमिका

गरीब देशों की विवशता का लाभ उठाने वाला कपटी चीन ! इस माध्यम से चीन विश्व में भू-राजनीतिक रूप से अपना प्रभुत्व स्थापित कर अमेरिका को भी चुनौती दे रहा है । चीन और अमेरिका से भारत को सावधान रहना ही हितकारी है ।