पौराणिक ग्रंथों के संदर्भ को नकारते हुए श्रीकृष्ण जन्मभूमि प्रकरण में देवी श्रीजी राधा रानी को सह-मालिक के रूप में पक्षकार बनाने की याचिका भी अस्वीकार कर दी !

वाराणसी (उत्तर प्रदेश) – मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि की सह-मालिक होने का देवी श्रीजी राधा रानी का दावा पौराणिक ग्रंथों में लिखे तथ्यों पर आधारित है । श्रीकृष्ण जन्मभूमि से संबंधित संपत्ति की राधा रानी सह-मालिक हैं, यह केवल पौराणिक ग्रंथों से सिद्ध नहीं किया जा सकता । विवादित संपत्ति की सह-मालिक राधारानी थीं अथवा विवादित संपत्ति में उनका कोई मंदिर था, यह सिद्ध करने के लिए उनके पक्ष से कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, ऐसा कहते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि प्रकरण में देवी श्रीजी राधा रानी को पक्षकार बनाने की याचिका अस्वीकार कर दी । इस दावे के समर्थन में स्कंद पुराण, श्रीमद् भागवत और ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे सनातन धर्मग्रंथों का संदर्भ दिया गया था । राधा रानी को श्रीकृष्ण की पहली पत्नी घोषित कर पक्षकार बनने की मांग की गई । इस प्रकरण की अगली सुनवाई ४ जुलाई को होगी ।
⚖️ Allahabad High Court rules Devi Shriji Radha Rani as fictional
📜 Rejecting references from ancient scriptures, the court also dismissed the petition to include Radha Rani as a co-owner in the Shri Krishna Janmabhoomi case.
🛕 “Calling Radha Rani imaginary shows judicial… pic.twitter.com/2Lbx74KgaZ
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) May 31, 2025
राधा रानी को काल्पनिक मानना, यह न्यायाधीशों का अज्ञान ! – शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती

ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने न्यायालय के इस निर्णय पर कहा कि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि प्रकरण की जांच करते हुए श्रीकृष्ण काल्पनिक हैं, राधाजी काल्पनिक हैं, ऐसा कहा है । इससे न्यायाधीशों की अज्ञानता का पता चलता है । उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि, ९ नवंबर २०१९ को सर्वोच्च न्यायालय ने श्रीराम जन्मभूमि पर निर्णय दिया था । जिसमें निर्णय केवल भगवान राम के पक्ष में नहीं दिया गया । स्कंद पुराण सहित विविध पुराण एवं ग्रंथों को भी इसका प्रमाण माना गया । यदि न्यायाधीशों ने ये सभी बातें ध्यान में रखी होतीं, तो वे ऐसा नहीं बोलते । न्यायाधीशों को कम से कम यह ध्यान रखना चाहिए था कि, भारत में एक स्थापित व्यवस्था है । यदि हिन्दुओं के संदर्भ में कोई धार्मिक निर्णय देना पडे, तो वह निर्णय हिन्दू धर्मग्रंथों के आधार पर ही देना होगा । न्यायाधीशों को एक बार अपने नियम पढने चाहिए । अपने देवताओं और धर्मग्रंथों को काल्पनिक कहकर हमें १०० करोड हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने से बचना चाहिए ।
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