सूक्ष्म ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधक श्री. निषाद देशमुख को ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद’ महोत्सव के बोधचिह्न के संदर्भ में अनुभव हुए सूक्ष्म स्तरीय सूत्र !

१७ से १९ मई २०२५ की अवधि में गोवा में संपन्न होनेवाले ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद’ महोत्सव के बोधचिह्न का लोकार्पण २१ मार्च २०२५ को किया गया । इस बोधचिह्न को देखकर अनुभव हुए सूक्ष्म स्तर के सूत्र आगे दिए गए हैं ।

 

१. बोधचिह्न में ‘स्वयंभू तेज’ होना

बोधचिह्न को देखने पर ‘उससे श्वेत रंग का प्रकाश प्रक्षेपित हो रहा है’, ऐसा मुझे अनुभव हुआ । बोधचिह्न में ‘स्वयंभू तेज’ (टिप्पणी) जागृत हुआ है’, ऐसा मुझे लगा ।

टिप्पणी – स्वयंभू तेज : जिस समय मानवीय प्रयत्नों से नहीं, अपितु ईश्वरीय इच्छा से कोई वस्तु, चित्र या स्थान पर चैतन्य घनीभूत होता है, तब उसे ‘स्वयंभू तेज’ कहते हैं । स्वयंभू तेज की विशेषता यह है कि उसे खंडित नहीं किया जा सकता । उस पर बुरी शक्तियों के कितने भी आक्रमण हों, तो भी वह तेज सतत प्रवाहित होता रहता है ।

२. बोधचिह्न में तेजतत्त्व के साथ आकाशतत्त्व भी कार्यरत होना

मुझे अनुभव हुआ कि बोधचिह्न को लगातार कुछ सेकंड देखने पर ‘वह बडा-बडा होकर विश्व को व्याप्त कर रहा है ।’ ‘व्यापकता’ आकाशतत्त्व का गुणधर्म है । प्रत्यक्ष में बोधचिह्न यह चित्र होने से उसमें तेजतत्त्व अधिक होना चाहिए था; पर ‘तेजतत्त्व के साथ उसमें आकाशतत्त्व भी कार्यरत हुआ है’, यह विशेषतापूर्ण है ।

श्री. निषाद देशमुख

३. बोधचिह्न से चैतन्य और आनंद के स्पंदन सर्वाधिक मात्रा में प्रक्षेपित होना

मुझे अनुभव हुआ कि बोधचिह्न से ‘चैतन्य ४० प्रतिशत, आनंद ३० प्रतिशत तथा शक्ति, भाव एवं शांति के स्पंदन १० प्रतिशत प्रक्षेपित हो रहे हैं ।’ व्यष्टि स्तर पर बनाए गए बोधचिह्न में ‘शक्ति, भाव एवं शांति’ अधिक मात्रा में होती है, समष्टि स्तर पर कार्य करनेवाले बोधचिह्नों में ‘चैतन्य और आनंद’ अधिक मात्रा में होता है । इससे बोधचिह्न का कार्य ‘व्यष्टि स्तर का नहीं, अपितु समष्टि स्तर का है’, ऐसा ध्यान में आया ।

४. ‘इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति’ के संगम से युक्त बोधचिह्न !

बोधचिह्न में ध्वज की ओर देखने पर मुझे इच्छाशक्ति के स्पंदन अनुभव हुईं । शंखनाद करनेवाले श्रीकृष्ण की ओर देखने पर मुझे क्रियाशक्ति के स्पंदन एवं बोधवाक्य की ओर देखने पर मुझे ज्ञानशक्ति के स्पंदन अनुभव हुए । इससे ‘बोधचिह्न में ‘इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति’ का संगम हुआ है’, ऐसा मुझे अनुभव हुआ ।

५. बोधचिह्न का व्यक्ति, वास्तु और वायुमंडल पर अनुभव हुआ परिणाम

५ अ. व्यक्ति पर कष्टदायक शक्ति का आवरण नष्ट होना : बोधचिह्न में ‘स्वयंभू तेजतत्त्व’ है । इसलिए उसकी ओर देखने पर व्यक्ति पर कष्टदायक शक्ति का आवरण नष्ट होकर उसे प्राणशक्ति मिलती है ।

५ आ. मन निर्विचार होने में सहायता मिलना : बोधचिह्न में आकाशतत्त्व कार्यरत होने से उसकी ओर देखने पर मन के रज-तम युक्त अनावश्यक विचार ब्रह्मांड रिक्ति से शोषित किए जाने से मन निर्विचार होने में सहायता मिलती है ।

५ इ. चैतन्य और आनंद अनुभव करने में सहायता होना : बोधचिह्न से प्रक्षेपित होनेवाला चैतन्य सीधे व्यक्ति के अनाहत और आज्ञा चक्रों पर परिणाम करता है । इसलिए व्यक्ति के अनाहत चक्र पर उसे चैतन्य अनुभव करने में तथा आज्ञाचक्र जागृत होने से देहबुद्धि अल्प होकर आनंद अनुभव करने में सहायता मिलती है ।

५ ई. वातावरण का दबाव नष्ट होने में सहायता मिलना : बोधचिह्न में श्रीकृष्ण अर्थात देवत्व है । इसलिए बोधचिह्न से वास्तु और वायुमंडल में चैतन्य प्रक्षेपित होता है । इसलिए वातावरण का दबाव, कष्टदायक शक्ति और अशुद्धि नष्ट होने में सहायता मिलती है तथा  वास्तु के चारों ओर कुछ मात्रा में चैतन्य का सुरक्षा-कवच निर्माण हो सकता है ।

कृतज्ञता

ईश्वर स्वयंपूर्ण हैं । इसलिए उनके द्वारा निर्मित छोटी से छोटी वस्तु में भी उसका तत्त्व कार्यरत होने से उसकी अनुभूति ले सकते हैं । ‘बोधचिह्न’ ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद’ महोत्सव का एक छोटा सा भाग है, तब भी उससे इतनी अनुभूतियां होती हैं, तो ‘प्रत्यक्ष महोत्सव में कितनी अनुभूतियां होंगी ?’, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । साधकों को ‘न भूतो न भविष्यति’ ऐसे आध्यात्मिक समारोह का अनुभव लेने का अवसर प्रदान करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता !

– श्री. निषाद देशमुख (आध्यात्मिक स्तर ६३ प्रतिशत) (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२४.३.२०२५)

  • बुरी शक्ति : वातावरण में अच्छी तथा बुरी (अनिष्ट) शक्तियां कार्यरत रहती हैं । अच्छे कार्य में अच्छी शक्तियां मानव की सहायता करती हैं, जबकि अनिष्ट शक्तियां मानव को कष्ट देती हैं । प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के यज्ञों में राक्षसों ने विघ्न डाले, ऐसी अनेक कथाएं वेद-पुराणों में हैं । ‘अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर अनिष्ट शक्तियां, उदा. असुर, राक्षस, पिशाच को प्रतिबंधित करने हेतु मंत्र दिए हैं ।’ अनिष्ट शक्तियों से हो रही पीडा के निवारणार्थ विविध आध्यात्मिक उपचार वेदादि धर्मग्रंथों में वर्णित हैं ।
  • सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।