मारिया वर्थ मूल जर्मन लेखिका हैं तथा उन्होंने हॅम्बर्ग विश्वविद्यालय से मानसशास्त्र विषय में ‘स्नातकोत्तर’ (जर्मन समकक्ष) उपाधि प्राप्त की है । वर्तमान में वे देहरादून (उत्तराखंड) में रह रही हैं । उन्होंने जर्मन भाषा में २ तथा अंग्रेजी भाषा में १ पुस्तक लिखी है । उनकी एक और अंग्रेजी भाषा की पुस्तक जुलाई २०२५ में प्रकाशित होनेवाली है । उनके द्वारा किए गए अनेक संकलनों में जर्मन मानसशास्त्र के छात्रों के लिए ‘भगवद्गीता’ पर आधारित एक अध्याय भी अंतर्भूत किया गया है । मासिकों एवं जालस्थलों पर मारिया वर्थ के जर्मन एवं अंग्रेजी भाषा के १०० से अधिक लेख प्रकाशित हुए हैं, जिनमें ‘हिन्दुइजम टुडे’, ‘योगा एक्च्युअल’, ‘ऑपइंडिया’, ‘हिन्दू पोस्ट’, ‘विश्व हिन्दू’, ‘ऑर्गनाइजर’, ‘लाईफ पॉजिटिव’ इत्यादि का समावेश है । इनमें से कुछ लेखों का हिन्दी, मराठी, तमिल एवं फ्रेंच भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है । उन्होंने अनेक अंतरराष्ट्रीय परिषदों में वक्ता के रूप में भाग लिया है, जिसमें वर्ष २०२३ में बैंकॉक में आयोजित ‘वर्ल्ड हिन्दू कांग्रेस’ भी सम्मिलित है ।

विशेष स्तंभ

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज्य हेतु उनके वीर योद्धाओं ने जो त्याग किया था, वह सर्वोच्च है, उसी प्रकार वर्तमान में भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा हेतु ‘वीर योद्धा’ के रूप में कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके द्वारा हिन्दू धर्मरक्षा हेतु किए संघर्ष की जानकारी करानेवाले ‘हिन्दुत्व के वीरयोद्धा’, इस स्तंभ के द्वारा अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी तथा इन उदाहरणों से आपके मन की चिंता दूर होकर उत्साह निर्माण होगा !
– संपादक
१. मारिया वर्थ का संक्षेप में परिचय तथा ईश्वर के प्रति उनकी जिज्ञासा
मारिया वर्थ ने दक्षिण जर्मनी के एक कैथॉलिक परिवार में जन्म लिया । उन्होंने एक कॉन्वेंट बोर्डिंग विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की । आयु के १६वें वर्ष से ही उनके मन में ईसाई भगवान के विषय में प्रश्न उठने लगे । धर्मोपदेशक पादरियों से उनके प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर न मिलने से वे ईसाई धर्म से दूर चली गईं । आगे जाकर उन्होंने रविवार के दिन प्रार्थना के लिए चर्च में जाना बंद कर दिया, जिसे ईसाई धर्म में पाप माना जाता है । तब तक मारिया वर्थ ‘शाश्वत नरक’ की संकल्पना के भय से मुक्त हो चुकी थीं । वह १९६० का दशक था, जिस समय सामान्यतः ईसाईविरोधी वातावरण था तथा ‘हिप्पी’ आंदोलन आरंभ होने के पथ पर था ।

उसके उपरांत भी ईश्वर के विषय में उनके प्रश्न अनुत्तरित ही रहे । ‘क्या सच में ईश्वर होते हैं ?’, यह उन्हें निश्चितरूप से जानना था; परंतु उसके लिए क्या करना चाहिए, यह उनकी समझ में नहीं आ रहा था । एक बार भौतिकी के वर्ग में जब उन्हें यह सुनने को मिला, ‘सभी प्रकार की ऊर्जा एक ही है’, तब उन्हें यह विचार सूझा, ‘यदि ईश्वर है, तो वे यही होंगे’; परंतु वह विचार उन्हें बहुत ही अमूर्त लगा !

विद्यालयीन शिक्षा के उपरांत मारिया वर्थ ने ‘लुफ्तांसा’ इस नगर विमानन प्रतिष्ठान में ‘इंटर्नशिप’ (काम का अनुभव प्राप्त करने हेतु कुछ विशिष्ट समय के लिए किसी प्रतिष्ठान में कार्य करना) के रूप में कार्य आरंभ किया । वहां उन्हें बहुत यात्रा करने का अवसर मिला, जो उनकी बचपन की इच्छा थी । आयु के २०वें वर्ष में उन्होंने ‘ट्रांसेडेंटल मेडिटेशन’ (अतींद्रिय ध्यान) यह पाठ्यक्रम पूर्ण किया । उसके उपरांत वे प्रतिदिन ध्यान करने लगीं; परंतु जब उन्हें अन्य माध्यमों से यह ज्ञात हुआ, ‘यह ध्यान करने से मनुष्य पागल हो सकता है’, तब उन्होंने ध्यान करना बंद किया । ४ वर्ष उपरांत उन्होंने ‘लुफ्तांसा’ प्रतिष्ठान छोडा तथा वे हॅम्बर्ग विश्वविद्यालय में मानसशास्त्र की शिक्षा ग्रहण करने लगीं ।

२. भारत आने पर मारिया वर्थ को ईश्वर से संबंधित प्रश्न का उत्तर मिलना
मारिया वर्थ दिसंबर में भारत आईं । ‘भारत में बहुदैवत्ववाद है’, ऐसा सिखाए जाने से ‘यहां (भारत में) मुझे मेरे प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे’, यह उनकी अपेक्षा नहीं थी; परंतु संयोगवश उन्हें भारत का प्राचीन ज्ञान हाथ लगा तथा उस ज्ञान की गहनता देखकर मारिया वर्थ अचंभित हुईं । उन्हें उनके सभी अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मिल गए ! ऋषियों ने जो ज्ञान दिया, मानो वही उन्हें अंतःकरण से प्रतीत हो रहा था; परंतु उसके लिए उन्हें शब्द नहीं सूझ रहे थे ।
स्वामी विवेकानंद लिखित ‘ज्ञानयोग’ मारिवा वर्थ के पढने में आई पहली पुस्तक थी । उसके पश्चात मारिया वर्थ हरिद्वार के कुंभपर्व में पहुंची । वहां देवराहा बाबा एवं श्री आनंदमयी मां के सान्निध्य में उन्हें ऋषियों के ज्ञान का वास्तविक अर्थ समझ में आया ।
‘इस विश्व की प्रत्येक बात का, अपितु हमारे व्यक्तित्व का मूलतत्त्व भी एक ही है, जिसका निरंतर अस्तित्व है तथा वह निराकार एवं शाश्वत है । सभी रूप समुद्र में आनेवाली तात्कालिक लहरे हैं, जो उनके स्वरूप से चिपकी रहती हैं तथा उनके खो जाने का भय रखती हैं; परंतु अंततः ये सभी लहरें अर्थात समुद्र ही हैं तथा जब उनका यह रूप नष्ट होता है, तब वो कुछ खोती नहीं हैं । उसी प्रकार से हम स्वयं को पूरे विश्व से भिन्न समझते हैं, साथ ही अपने क्षणिक व्यक्तित्व से चिपके रहते हैं; परंतु स्वयं का वास्तविक अस्तित्व तो शुद्ध एवं आनंदमय भान है तथा भले यह व्यक्तित्व खो भी गया, तब भी उससे हमारी सच्ची पहचान खो नहीं जाती’, इस प्रकार मारिया वर्थ का चिंतन हुआ । इसके कारण उन्हें अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य भी ज्ञात हुआ अर्थात ‘सच में मैं कौन हूं ?’ की खोज !
हिन्दू धर्म की महानता एवं साधना की आवश्यकता !

हिन्दुओं को उनके ऋषियों द्वारा अविष्कारित सिद्धांतों को समझकर उसके अनुसार आचरण करना आवश्यक है । वर्तमान में विशेषकर युवा पीढी में यह बहुत अल्प दिखाई देता है । उन्हें यह भी ज्ञात नहीं है कि हिन्दुओं की परंपराएं अन्य अंधविश्वासों पर आधारित धर्मव्यवस्थाओं की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं; क्योंकि हिन्दू धर्म ज्ञान की खोज पर आधारित धर्म है, अंधविश्वास पर आधारित नहीं है ! वह विज्ञान का विरोध नहीं करता, जबकि विज्ञान को प्रेरणा देनेवाला है ।
नई शिक्षा नीति में ‘भारतीय ज्ञानप्रणाली’ का समावेश होने के कारण स्थिति में सुधार आएगा, यह आशा है; परंतु इसे सफल बनाने हेतु साधना आवश्यक है । शिक्षक एवं छात्र इन दोनों को साधना करनी होगी । विद्यालयों में प्रतिदिन यदि १५ मिनट का शांत ध्यान किया गया, तो वह बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा ।
– मारिया वर्थ

३. मारिया वर्थ द्वारा विभिन्न आध्यात्मिक गुरुओं से की गईं भेंट !
आरंभिक २० वर्षाें में मारिया वर्थ ने एक सामान्य जीवन जीया । प्रमुखता से वे आश्रमों में रहीं तथा वे अनेक गुरुओं से मिलीं । उन सभी में ‘ओशो’, ‘सत्य साईबाबा’, ‘स्वामी चिन्मयानंद’, ‘हैदाखान बाबाजी’ तथा बहुत प्रसिद्ध नहीं ऐसे भी अनेक गुरुओं से वे मिलीं । उसके उपरांत वे ‘अम्मा’, ‘श्री श्री रविशंकर’ एवं ‘योगगुरु स्वामी रामदेव’ से मिलीं ।
४. भारत का इतिहास जान लेने का कारण
‘ईश्वर का अस्तित्व है, वे ही सभी के निर्माता हैं तथा सर्वव्यापी हैं’, इस ज्ञान की प्राप्ति के कारण मारिया वर्थ को बहुत ही आनंद मिला । पाश्चात्त्य देश में इस ज्ञान के विषय में किसी को जानकारी न होने से उन्होंने इस ज्ञान को वहां पहुंचाना सुनिश्चित किया । उसके कारण उन्होंने इस विषय में जर्मन मासिक में लेख लिखना आरंभ किया ।
वर्ष २००२ में मारिया वर्थ देहराडून रहने के लिए गईं । वहां उनके मित्र परिवार में उच्चशिक्षित लोग थे; परंतु आश्चर्य की बात यह कि वे हिन्दू धर्म की आलोचना करते थे । उसी समय मारिया वर्थ ने भारतीय इतिहास को जानना आरंभ किया । उसके पश्चात यह बात उनके ध्यान में आई की विशेषकर ‘शिक्षित’ भारतीय उनकी परंपराओं की आलोचना क्यों करते हैं ? अंग्रेजों ने भारतीयों को इस प्रकार की शिक्षा दी कि वे ब्रिटेन की ओर सम्मान की दृष्टि से देखें तथा भारत की ओर तुच्छ दृष्टि से !
कालांतर से मारिया ने ईसाई एवं इस्लाम के साथ हिन्दू धर्म की तुलना कर अध्ययन करना आरंभ किया तथा मुख्यरूप से अंग्रेजी में लेखन करना आरंभ किया । उस समय में विभिन्न धर्माें में तुलना करना हिन्दुओं में वर्जित माना जाता था । ‘आक्रांताओं के धर्म अर्थात अंधविश्वास फैलानेवाले तथा समाज को तोडनेवाले सिद्धांत हैं’, यह सच्चाई बताने में भी हिन्दुओं को भय प्रतीत होता था । इस बात का मारिया को बुरा लगता था । सौभाग्यवश स्थिति बदलती गई ।

अन्य धर्मों में मानव जाति को दो भागों में विभाजित किया जाता है, जो सही हैं तथा जो गलत हैं (और जो नरक जाते हैं) यह सब एक व्यक्ति के कथन पर आधारित होता है । इसके विपरीत, हिन्दू धर्म वास्तव में सर्वसमावेशी एवं वैश्विक है । यहां परमेश्वर इब्राहिमी धर्मों में दिखाई देता है, वैसे कोई भिन्न अथवा प्रतिशोध लेनेवाली सत्ता की भांति नहीं होते । हिन्दुओं को उनकी बुद्धि का उपयोग कर अंतःकरण की बात सुनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । ईसाई एवं मुसलमान धर्माें में धर्मांतर किए हुए लोगों को (केवल भारत ही नहीं, अपितु सर्वत्र के ईसाई एवं मुसलमान भी मूलरूप से धर्मांतरित ही हैं) स्वयं विचार करने के लिए प्रेरित नहीं किया जाता ।
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ऐसे विचारों एवं लेखन के कारण मारिया से जुडा ‘धर्मनिरपेक्ष’ मित्र परिवार संतुष्ट नहीं था तथा वे उन्हें ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थानीय प्रचारक’ कहने लगे । कुल मिलाकर इन लोगों पर अंग्रेजी माध्यम से मिली शिक्षा का प्रभाव स्पष्टता से दिखाई दे रहा था । उसके कारण मारिया ने कुछ समय उपरांत इन लोगों से दूरी बनाई । आगे जाकर उनके लेखन के समर्थक उनसे जुडे ।

५. ‘डीप स्टेट’ तथा भारत को हानि पहुंचानेवाली शक्तियों के विषय में …
समाज में अराजकता फैलाने की इच्छुक शक्तियां अर्थात तथाकथित ‘डीप स्टेट’ ! (‘डीप स्टेट’ अर्थात सरकारी अधिकारियों तथा निजी संगठनों का गुप्त जाल) के पास समाज में अशांति फैलाने के लिए असीमित धन है । सरकार ने यदि अल्पसंख्यकों को मिलनेवाली विशेष सुविधाएं हटाईं, तो ऐसी शक्तियों को भारत को हानि पहुंचाने का अवसर मिल सकता है । विशेषकर मुसलमान समुदाय को यह समझ लेना चाहिए कि उनका उपयोग सडक पर हंगामा मचाने के लिए किया जाता है । ‘युनाईटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनैशनल डेवलपमेंट’ के (यू.एस्.ए.आई.डी. के) कोष का जो खुलासा हुआ, उसमें अनेक मुसलमान संगठनों का समावेश था, जो आंखें खोलनेवाली बात थी ।
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Maria Wirth: “Christians & Muslims who deride Hindus must realise that their ancestry is Hindu.” (सौजन्य : The Festival of Bharat) |
६. बौद्धिक लडाई के विरोध में हिन्दुओं के लिए आवश्यक प्रयास
भारतीयों को और एक यह महत्त्वपूर्ण सूत्र जान लेना अति आवश्यक है कि लोगों को बौद्धिक दृष्टि से शिथिल बनाने के लिए कुछ शरारती प्रयास चल रहे हैं । कुछ शक्तियां जिन लोगों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जोडने की योजना बना रही हैं, उससे पहले वे हमें ‘जंक फूड्स’, ‘गेम्स’ तथा इससे भी बुरे अर्थात अश्लीलता एवं मादक पदार्थाें के जाल में फंसाने का प्रयास कर रही हैं । इन सभी का उद्देश्य यह है कि हमें अपनी आंतरिक शक्ति से तोडा जाए । हिन्दू धर्म में स्वयं में विद्यमान आंतरिक शक्ति से जुड जाने के विषय में स्पष्टतापूर्ण मार्गदर्शन है तथा इसीसे ही इन शक्तियों को संकट लगता है; क्योंकि जो मनुष्य स्वयं की आत्मशक्ति से जुडा होता है, उसे सहजता से नियंत्रित नहीं किया जा सकता ।
हमारे विरोधियों की आर्थिक शक्ति अक्षरशः असीमित है । उसके कारण उनकी संपूर्ण व्यवस्था से केवल आर्थिक स्तर पर लडना कठिन है; परंतु सत्य हमारे पक्ष में है । भारतीय तत्त्वज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों को किसी भी संभावित माध्यम से लोगों तक पहुंचाना पडेगा । पश्चिमी मुख्य प्रवाह के माध्यम तथा उसमें भी समाजमाध्यम हिन्दू धर्म एवं हिन्दुअों के विषय में दुष्प्रचार कर रहे हैं । तब भी ‘प्राच्यम्’, ‘क्युरियस प्लस’ जैसे कुछ प्लैफॉर्म्स उत्कृष्ट तथा छोटे वीडियोज बना रहे हैं, जो वीडियोज हिन्दू धर्म का सकारात्मक दर्शन कराते हैं । इसके अतिरिक्त मेरे ‘ब्लॉग’के साथ अनेक स्थानों पर लेख भी प्रकाशित हो रहे हैं, जो लोगों में हिन्दू धर्म के प्रति स्पष्टता उत्पन्न कर रहे हैं । ये वीडियोज एवं लेख अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने चाहिए तथा संभव हो, तो विद्यालय-महाविद्यालयों तक भी; परंतु अभी तक तो इन विषयों का प्रसार बढाने हेतु बहुत कुछ सहायता अथवा समर्थन नहीं मिल रहा है, यही बडी समस्या है ।
भारत ‘हिन्दू राष्ट्र’ ही है !

मेरी दृष्टि में भारत एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ है; क्योंकि यहां बहुसंख्यक हिन्दू हैं । भारत को हिन्दू राष्ट्र बोलने पर कुछ भारतीय अस्वस्थ क्यों हो जाते हैं ?, यह बात कभी भी मेरे ध्यान में नहीं आई । यही लोग जर्मनी को ‘ईसाई राष्ट्र’ अथवा पाकिस्तान को ‘इस्लामी राष्ट्र’ बोले जाने पर कुछ भी नहीं बोलते । वर्तमान में जर्मनी में केवल ४९ प्रतिशत लोग ईसाई हैं, तब भी जर्मनी को ‘ईसाई राष्ट्र’ कहा जाता है । कोई इस पर आपत्ति नहीं दर्शाता । आधिकारिकरूप से जर्मनी भी भारत जैसा ही ‘धर्मनिरपेक्ष’ है । किसी देश की आधिकारित धार्मिक पहचान होने के कानूनी लाभ क्या होते हैं, यह मुझे ज्ञात नहीं है; किंतु मेरे विचार में सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि सभी धर्माें के लोगों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार किया जाए ! स्वतंत्रता के उपरांत भारत में यह नहीं हुआ है । उसके कारण भारत वास्तव में ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश नहीं है । धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह होता है, ‘राज्य एवं केंद्र सरकार को नागरिकों के धर्म के प्रति पूर्णतया निष्पक्ष होना चाहिए ।’ मेरी यह इच्छा है कि भारत को सभी के साथ समानतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए ।
– मारिया वर्थ
७. वर्तमान में चल रहा है आध्यात्मिक युद्ध !
मारिया वर्थ की यह भावना है कि वर्तमान में हम एक आध्यात्मिक युद्ध लड रहे हैं, ऐसा युद्ध जैसा पुराणों की कथाओं में देवताओं एवं अहंकारी असुरों के मध्य संग्राम था वैसा! आज असुरी प्रवृत्तियां पाश्चात्य जगत में अधिक बलशाली लगती हैं, जहां शैतान की पूजा जैसी बातों को भी धर्म की श्रेणी दी जाती है तथा यहां भारत में आज भी देवताओं की पूजा की जाती है । कुछ भारतीय स्वयं के स्वार्थ को सबकुछ मानते हैं; परंतु उनकी संख्या अल्प है । बहुत अल्प लोग सत्ता एवं संपत्ति के बदले में स्वयं की अंतरात्मका बेचने के लिए तैयार होंगे । हिन्दुओं में अभी भी धार्मिक आचरण तथा धर्म का बीज गहराई तक बोया हुआ है तथा कदाचित यही वो कारण है, जिनके कारण हिन्दू धर्म एवं हिन्दू लोगों पर इतने तीव्र आक्रमण किए जा रहे हैं । धर्म हमें सशक्त बनाता है तथा एक बार जब मनुष्य आंतरिकदृष्टि से सशक्त बनता है, तब उसे सहजता से नियंत्रित नहीं किया जा सकता ।
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