
रुद्राक्ष नाम के वृक्ष को आनेवाले फल को ‘रुद्राक्ष’ कहते हैं । रुद्राक्ष का अर्थ है शिवशंकरजी का तीसरा नेत्र ! यह शब्द ‘रुद्र + अक्ष’ से बना है । शिवभक्तों की दृष्टि से रुद्राक्ष का बडा महत्त्व है ।
प्राचीन काल में त्रिपुरासुर राक्षस बहुत उन्मत्त हो गया था । उसे मारने के लिए कालाग्निरुद्र ने ध्यान आरंभ किया । उसे करने से पूर्व उन्होंने अपनी आंखें बंद
की । उन आंखों से पृथ्वी पर जो आंसू टपके, उन आसुओं की बूंदों से रुद्राक्ष के वृक्ष बने तथा उनपर फल आए ।
रुद्राक्ष श्वेत, लाल, पीले तथा काले, इन ४ रंगों के होते हैं । इलाहाबादी बडे आमले से लेकर बहुत छोटे बेर तक उनके आकार होते हैं । खरबूज को जैसे बाहर से रेखाएं होती हैं, वैसी ही रुद्राक्ष पर रेखाएं होती हैं । रुद्राक्ष को १ से लेकर ४४ तक मुख हो सकते हैं । इनमें से प्रत्येक रुद्राक्ष का स्वतंत्र नाम है तथा वह भिन्न-भिन्न देवताओं को अधिक प्रिय है ।’
– श्री स्वामी समर्थ (साभार: श्री त्र्यंबकेश्वर विशेषांक १९९६)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
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