वर्तमान समय में महाकुम्भ पर्व में महाकुम्भ का महत्त्व बतानेवाले समाचार प्रसारित हो रहे हैं । विभिन्न समाचार वाहिनियां महाकुम्भ में आनेवाले भिन्न-भिन्न पद्धतियों से साधना करनेवाले साधुओं के विषय में जानकारी दे रहे हैं । अनेक श्रद्धालु तथा साधु विदेशों से भी आए हैं । एक विदेश स्थित भारतीय साधु के विषय में जानकारी देते हुए एक वाहिनी ने दिखाया कि उनके वहां की विदेशी वंश की महिला शिष्याएं भी उनके साथ कुम्भ पर्व में सम्मिलित होने के लिए आई हैं । उन विदेशी महिला शिष्याओं को उन्होंने ‘शुभंकरोती’, ‘हनुमानचालीसा’, साथ ही अन्य स्तोत्र आदि सिखाए हैैं । इन महिला शिष्याओं ने हाथ जोडकर उसे वाहिनी के कैमरामैन के सामने बोलकर दिखाया । यहां तक सब ठीक था; परंतु उसके उपरांत उन्होंने तालियां बजाते हुए ‘वाजले की बारा’, यह मराठी फिल्म का गीत गाना आरंभ किया । वाहिनी के समाचारों में यह समाचार बहुत चर्चा में रहा । यह देखकर बहुत खेद प्रतीत हुआ ।

कहां घोर-अघोर तपस्या कर कुम्भ पर्व में आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने हेतु तथा चैतन्यदायक स्नान करने के लिए आनेवाले साधु, संत-महंत, कथावाचक, साधक, भक्त तथा श्रद्धालु और कहां ऐसे पवित्र स्थान पर फिल्मों के शृंगाररस से युक्त गानेवाली इन विदेश स्थित साधुओं की (?) शिष्याएं ! उन्हें उनकी ऐसी कृति उनकी आध्यात्मिक प्रगति के लिए बिल्कुल भी लाभकारी नहीं है, यह कदाचित उनके ध्यान में न आता हो; परंतु संबंधित मार्गदर्शकों को उन्हें इसका भान कराना अपेक्षित है । ऐसा कुछ न कर, इसके विपरीत उन्होंने सस्ती लोकप्रियता के लिए वाहिनियों के कैमरे के सामने उसे प्रस्तुत किया । कुम्भ पर्व में जाकर शृंगारिक गीत गाने का कुछ भी प्रयोजन नहीं हो सकता, यह बात संबंधित लोगों के ध्यान में नहीं आती, इसका पुनः-पुनः आश्चर्य प्रतीत होता है । क्या इसका सूक्ष्म पाप उन्हें तथा संबंधित लोगों को नहीं लगेगा ? समाचार वाहिनियां भी इस प्रकार से कुम्भ पर्व के विशेष समाचार के रूप में यदि ऐसे समाचार दिखाते हों, तो यह वाहिनियों के द्वारा भी कुम्भ पर्व की पवित्रता का अनादर करने जैसा ही है ।
सच्चे साधु कभी भी उनके साधुत्व का प्रदर्शन नहीं करते, अपितु वे साधनारत होते हैं तथा वही उनके जीवन का लक्ष्य होता है । उनमें लोकप्रियता का लालच नहीं होता । लोकप्रियता का लालच रखनेवालों को क्या ‘साधु’ कहना भी उचित होगा ? स्वार्थ के लिए धर्म का आधार लेनेवालों को उसका पाप भी लगता है । उनके कारण सनातन हिन्दू संस्कृति की बदनामी होती है तथा उसके कारण तथाकथित आधुनिकतावादियों को भी मुफ्त का विषय मिलता है । आज जहां अनेक विदेशी लोग भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं, ऐसे में उन्हें भारतीय संस्कृति की उचित बातें ज्ञात होकर उस माध्यम से उनकी साधना होती हो, तो उन्हें उसका लाभ मिलेगा तथा उनतक भारतीय संस्कृति की अच्छी बातें पहुंचे, यह प्रत्येक भारतीय का दायित्व है !
– श्रीमती रूपाली अभय वर्तक, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल