
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) – नौकरी अथवा अन्य संपत्ति द्वारा अपना पेट न भर सकनेवाली अविवाहित बेटी की जीविका चलाने का दायित्व पिता का होता है, ऐसा महत्त्वपूर्ण निर्णय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिया । ‘हिन्दू दत्तक एवं देखभाल कानून’ की धारा २० में इस प्रकार का प्रावधान किया गया है । यह धारा हिन्दू सिद्धांतों का प्रतीक है । इसके अंतर्गत ही अविवाहित बेटी का दायित्व पिता पर निश्चित किया गया है, ऐसा न्यायालय द्वारा उल्लेखित किया गया है ।पत्नी को २५ सहस्र रुपए, जबकि बेटी को २० सहस्र रुपए प्रतिमाह देखभाल व्यय के रूप में देने के आदेश हाथरस परिवार न्यायालय ने पिता को दिए थे । इस आदेश के विरुद्ध पिता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की । बेटी को देखभाल व्यय देने का हाथरस न्यायालय का आदेश रहित किया जाए, ऐसी मांग पिता ने की थी । तदुपरांत पत्नी ने विनती करते हुए उच्च न्यायालय में याचिका की, ‘देखभाल व्यय का शुल्क बढाया जाए ।’ इन दोनों याचिकाओं पर न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम के एकल पीठ के सामने एकत्रित सुनवाई हुई ।
क्या है प्रकरण ?
इस दंपति का विवाह वर्ष १९९२ में हुआ था । पति एवं ससुराल के लोग पत्नी को पीडा दे रहे थे । ससुराल की पीडा से त्रस्त होकर वर्ष २००९ में पत्नी, बेटी को लेकर पीहर (मैके) चली गई । जीविका का कोई स्रोत न था । इसलिए पत्नी ने स्वयं के एवं बेटी की देखभाल व्यय के लिए परिवार न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की । परिवार न्यायालय ने याचिका का स्वीकार करते हुए देखभाल व्यय देने का आदेश दिया था । इसके विरुद्ध प्रविष्ट की गई याचिका में अविवाहित बेटी की देखभाल व्यय का प्रकरण उपस्थित हुआ था । बच्चों की देखभाल का नैतिक दायित्व परिवार प्रमुख के रूप में पिता का ही होता है, इस पर उच्च न्यायालय ने मुहर लगा दी । यद्यपि पत्नी द्वारा देखभाल व्यय की राशि में वृद्धि करने की गई मांग अस्वीकार कर दी !
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