वर्ष १९९८ में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी (गुरुदेवजी) ने ५६ वर्ष की आयु में सार्वजनिक रूप से विचार रखा, ‘भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना’, ही हिन्दुओं की सामाजिक, राष्ट्रीय एवं धार्मिक समस्याओं का एकमात्र उपाय है ।’ उन्होंने समय-समय पर यह भी स्पष्ट किया कि ‘केवल भारत में ही नहीं, अपितु पृथ्वी पर सर्वत्र ‘हिन्दू राष्ट्र (ईश्वरीय राज्य, सनातन धर्म राज्य, रामराज्य)’ की स्थापना करना’ मात्र राजनीतिक, सांस्कृतिक, वांशिक अथवा भौगोलिक प्रक्रिया नहीं है, अपितु यह मुख्यरूप से आध्यात्मिक प्रक्रिया है ।’ तथा इसके लिए वे आयु के ८४वें वर्ष में भी कार्यरत हैं !
हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु गुरुदेवजी का आध्यात्मिक स्तर पर कार्य
‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना अर्थात ‘ईश्वरीय राज्य की स्थापना’ न हो; इसके लिए अनिष्ट शक्तियां तीव्र विरोध कर रही हैं । इन अनिष्ट शक्तियां को पराजित किए बिना हिन्दू राष्ट्र की स्थापना नहीं हो सकती । गुरुदेवजी अनिष्ट शक्तियों के विरुद्ध सूक्ष्म की बडी लडाई लड रहे हैं । ‘हिन्दू राष्ट्र-स्थापना की ७० प्रतिशत लडाई सूक्ष्म स्तर पर है तथा उसके लिए आध्यात्मिक बल चाहिए’, ऐसा बतानेवाले तथा उसके लिए कृतिशील, गुरुदेवजी ही एकमात्र गुरु हैं ! सूक्ष्म के इस युद्ध में अनिष्ट शक्तियों को पराजित करने के लिए अधिक से अधिक सद्गुरुओं (८० प्रतिशत अथवा उससे अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त संत) की आवश्यकता है । ऐसे संतों के कारण ‘वातावरण में स्थित रज-तम न्यून होना तथा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु कार्यरत धर्मप्रेमियों के चारों ओर सत्त्वगुण का सुरक्षा-कवच बनकर उन्हें आध्यात्मिक बल प्राप्त होना’, यह भी साध्य होता है । गुरुदेवजी की कृपा से तथा उनके द्वारा साधना सिखाकर तैयार किए जाने से जनवरी २०२६ तक १३५ साधक संत बन गए, जबकि १ सहस्र ३५ साधक संतपद प्राप्त करने की ओर अग्रसर हैं ।
गुरुदेवजी द्वारा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु ‘क्षात्रधर्म साधना’ बताना
‘क्षात्रधर्म साधना’ अर्थात धर्म को ग्लानि आने के उपरांत समय की मांग अनुरूप, सत्त्वगुणी मनुष्यों की रक्षा एवं वैधानिक पद्धति से दुष्प्रवृत्तियों के निर्मूलन के लिए, सभी वर्ण के लागों के लिए आवश्यक साधना ! वर्ष १९९६ से गुरुदेवजी यह साधना बता रहे हैं तथा गुरुदेवजी यह साधना बतानेवाले इस आधुनिक काल के पहले संत हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी हिन्दू राष्ट्र-स्थापना के विषय में आध्यात्मिक स्तर पर दिशादर्शन करनेवाले एकमात्र गुरु हैं
अनेक विचारकों ने ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द की व्याख्या भले ही भूप्रदेश, इतिहास, संस्कृति एवं सिद्धांतों के आधार पर की हो; परंतु गुरुदेवजी ने ‘हिन्दू राष्ट्र’ के विषय की रचना आध्यात्मिक दृष्टिकोण से की है ।
१. गुरुदेवजी ने ‘विश्वकल्याण हेतु कार्यरत अनेक सत्त्वगुणी लोगों का (राज्यकर्ता एवं प्रजा का) राष्ट्र’, इस प्रकार ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द की आध्यात्मिक व्याख्या की है । वे स्वयं हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु आवश्यक सत्त्वगुणी लोगों को (नागरिकों को) तैयार करने के लिए प्रयासरत हैं ।
२. ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना केवल शारीरिक अथवा मानसिक स्तर पर प्रयास करने से नहीं होगी, अपितु उसके लिए आध्यात्मिक स्तर पर भी प्रयास करने आवश्यक हैं’, ऐसा दिशादर्शन गुरुदेवजी कर रहे हैं तथा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु वे स्वयं भी आध्यात्मिक स्तर पर कार्यरत हैं ।
हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु गुरुदेवजी का वैचारिक स्तर पर कार्य
हिन्दू राष्ट्र-स्थापना से संबंधित ग्रंथमाला की निर्मिति

गुरुदेवजी ने ‘हिन्दू राष्ट्र स्थापना’ की भूमिका स्पष्ट करने के लिए ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना’ से संबंधित ग्रंथमाला का संकलन किया है तथा उसमें ‘ईश्वरीय राज्य की स्थापना’, हिन्दू राष्ट्र क्यों आवश्यक ?’, ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की दिशा’, ‘हिन्दू राष्ट्र : आक्षेप एवं खंडन’ इत्यादि ग्रंथों का समावेश है ।
संतों से मिलना, सर्वसंप्रदाय सत्संग, सर्वधर्मसभा इत्यादि का आयोजन

‘राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा हेतु विभिन्न संप्रदाय एवं संत एकत्रित होकर कार्य करें’, इसके लिए वर्ष २००० से २००२ की अवधि में गुरुदेवजी महाराष्ट्र, गोवा एवं कर्नाटक राज्य के ११० से अधिक संतों से मिले । कुछ स्थानों पर उन्होंने संत-बैठकें, सर्वसंप्रदाय सत्संग, सर्वधर्मसभा इत्यादि का आयोजन किया । इनमें करवीर पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य विद्याशंकर भारतीजी (कोल्हापुर), जगद्गुरु नरेंद्राचार्य महाराजजी (नाणीज, रत्नागिरी), प.पू. गगनगिरी महाराजजी (गगनबावडा, जिला कोल्हापुर), पीर सैय्यद हुसेनमियां कादरी नक्षबंदीजी (मुंबई) इत्यादि अनेक संत सम्मिलित हुए ।
लोकतंत्र में फैली दुष्प्रवृत्तियों के निर्मूलन के लिए कार्य

अनेक लोगों को ‘सरकारी कामों में भ्रष्टाचार एवं अकार्यक्षमता’ का अनुभव होता है । देश के न्यायालयों में ५ करोड २५ लाख से अधिक अभियोग लंबित हैं । शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार आदि सामाजिक क्षेत्रों में भी दुष्प्रवृत्तियां प्रबल हो गई हैं तथा प्रतिदिन जनता का शोषण कर रही हैं । लोकतंत्र में फैली इन दुष्प्रवृत्तियों के कारण स्वराज्य को सुराज्य बनाने में बाधाएं उत्पन्न होती हैं । गुरुदेवजी ने सीख दी है, ‘अन्याय सहन न करें, अपितु सरकारी एवं सामाजिक दुष्प्रवृत्तियों के विरोध में लोकतांत्रिक पद्धति से लडाई लडें !’ उनके मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से कार्य करनेवाले संगठनों एवं व्यक्तियों ने सरकारी क्षेत्र के ६ भ्रष्ट अधिकारियों को पकडवाया, साथ ही सरकार द्वारा नियंत्रित अनेक मंदिरों एवं कार्यालयों में चल रहा भ्रष्टाचार उजागर किया ।
अधिवेशनों के द्वारा देशभक्तों एवं हिन्दुत्वनिष्ठों का संगठन

वर्ष २०११ में गुरुदेवजी ने सर्वप्रथम यह विचार रखा कि ‘देशभक्तों एवं हिन्दुत्वनिष्ठों के संगठन से ही हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का कार्य हो सकता है तथा इसके लिए पूरे भारत के राष्ट्रप्रेमियों एवं हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों को एकत्रित करनेवाला व्यासपीठ होना चाहिए ।’ इस विचार से प्रेरणा लेकर वर्ष २०१२ से ‘हिन्दू जनजागृति समिति’ प्रतिवर्ष गोवा में ‘अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन’ तथा अन्य स्थानों पर राज्य स्तरीय एवं जिला स्तरीय हिन्दू अधिवेशनों का आयोजन कर रही है । वर्ष २०२३ से ‘अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन’ का स्वरूप और व्यापक होने के कारण उसका नामकरण ‘वैश्विक हिन्दू राष्ट्र महोत्सव’ किया गया ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?