
१. तत्कालीन राज्यकर्ताओं की अनुचित नीतियों में छिपे हैं मणिपुर हिंसाचार के बीज
‘जब हम भारत की महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व के विषय में जानने का प्रयत्न करते हैं, तब अनेक परतें खुलती जाती हैं और अनेक आश्चर्यजनक घटनाएं सामने आती हैं । अभी कुछ समय पूर्व ‘प्रधानमंत्री मोदी को संसद में बुलाएं और वे मणिपुर में हो रहे हिंसाचार के विषय में अपनी भूमिका स्पष्ट करें’, इस मांग को लेकर विपक्ष आक्रामक हो गया था । इसी उद्देश्य से उन्होंने संसद में अविश्वास प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया था; परंतु मोदीजी संसद में कुछ बोलते, इससे पूर्व ही पूरा विपक्ष सदन से बाहर निकल गया । इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने मणिपुर के विषय में सीधे न बोलते हुए कुछ पुरानी बातों का संदर्भ दिया । उन्होंने कांग्रेस के जन्मदाताओं की पोल खोलकर रख दी । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू कितने कायर थे, इसका उदाहरण मोदी ने प्रस्तुत नहीं किया । नेहरू दायित्व संभालने में सक्षम नहीं थे, फिर भी प्रधानमंत्री बनने के लिए उन्होंने बडे-बडे दिग्गजों के पत्ते कैसे काटे ? मोहनदास गांधी को अपने विश्वास में लेकर नेहरू ने नेताजी से लेकर सरदार पटेल सहित डॉ. आंबेडकर को कैसे अलग-थलग कर दिया, इस विषय में हमने पढा ही है ।
‘पूर्वाेत्तर के राज्य चीनी साम्राज्य के प्रभाव में अवश्य आएंगे । उस युद्ध की स्थिति का सामना हम कैसे कर पाएंगे ?’, इस बात से घबराए नेहरू क्या इन राज्यों को हिन्दुस्थान में विलीन करना भी चाहते थे ? ऐसी शंका उत्पन्न होती है । स्थिति की विडंबना देखिए भारत का पडोसी राष्ट्र नेपाल उस समय राजतंत्र को छोडकर स्वतंत्र भारत का राज्य बन संघराज्य में सम्मिलित होने को इच्छुक थे; परंतु इतना बडा भूभाग संभालना कठिन होगा, इस भय से नेपाल के राजा के इस प्रस्ताव को नेहरू ने कचरे की टोकरी में फेंक दिया । अन्यथा नेपाल आज भारत का एक भाग होता । जिन पूर्वाेत्तर के राज्यों का भारत में समावेश हुआ, उनकी जानबूझकर उपेक्षा करने की नीति तत्कालीन राज्यकर्ताओं ने अपनाई । इसलिए इन राज्यों के विकास की नींव कमजोर रह गई । ‘अब जो संघर्ष का समय हम अनुभव कर रहे हैं, उसके बीज क्या नेहरू ने बोए हैं ?’, ऐसी भी शंका उत्पन्न हो सकती है ।

२. इंदिरा गांधी द्वारा मिजोरम पर किए ‘एयर स्ट्राइक’ का (हवाई आक्रमण का) इतिहास !
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में ५ मार्च १९६६ की घटना का उल्लेख किया । इस दिन भारतीय वायु सेना ने भारत की ही सीमा पर स्थित मिजोरम जैसे राज्य पर ‘एयर स्ट्राइक’ की थी । प्रधानमंत्री ने इस घटना का केवल उल्लेख किया; परंतु उसकी पृष्ठभूमि हमें समझ लेनी चाहिए । उस समय मिजोरम असम राज्य का ही एक भाग था । स्वतंत्रता से पूर्व से ही यह प्रदेश ईसाईबहुल था । वहां भारी मात्रा में बांस की खेती की जाती थी । इस बांस के पौधे में वर्ष में एक ही बार फूल आते हैं और उसे खाने के लिए चूहे आते हैं । वर्ष १९५९ में प्रथम असम से लगे मिजोरम में बांस में बौर और फूल आए । इसके परिणामस्वरूप वहां चूहों की संख्या बढ गई । वे बांस के फूलों के साथ-साथ आसपास अनाज की फसल भी नष्ट करने लगे । उनकी संख्या इतनी बढ गई कि खेत में कोई भी फसल शेष नहीं रही । इस क्षति से किसान लाचार हो गए । अगले ७-८ वर्षाें में कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ । चूहों का उपद्रव इतना बढ गया था कि उन्होंने खेत का अनाज समाप्त कर दिया । घर के एवं सरकारी गोदाम का अनाज भी चूहों ने खाना आरंभ कर दिया । मिजोरम में फैले इस अकाल का अनुचित लाभ सरकारी बाबू एवं व्यापारियों ने उठाया । उनकी काला बाजारी से जनता व्यथित हो गई । वहां भुखमरी फैल गई, तो जनता सरकार की ओर आशा से देखने लगी; परंतु असम एवं केंद्र की कांग्रेस की इंदिरा गांधी की सरकार ने जनता को दिलासा नहीं दिया । इसलिए जनता के मन में एक सुप्त आक्रोश सुलग रहा था । सरकार के इस सौतेले व्यवहार ने उस आग में घी डालने का काम किया ।
वर्ष १९५० से ही इस भाग में ‘मिजो कल्चर’ नामक एक संगठन कार्यरत था । वह संस्कृति के नाम पर अलगाववादी आंदोलन चलाता था । लाल डेंगा नामक व्यक्ति ने जनता के असंतोष का लाभ उठाकर ‘मिजो नेशनल फ्रंट’ नामक संगठन की स्थापना की । इस संगठन के माध्यम से ‘मिजोरम को स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिले’, इसके लिए संघर्ष आरंभ हुआ । लाल डेंगा को पडोसी राष्ट्रों से आर्थिक सहायता एवं शस्त्र मिल रहे थे । स्वतंत्र राज्य की मांग आगे स्वतंत्र राष्ट्र में परिवर्तित हो गई । उन्हें भारत से अलग होना था । इससे देश की सार्वभौमिकता पर संकट निर्माण हो गया, तब भी भारत सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी थी । फरवरी १९६६ में ‘मिजो नेशनल फ्रंट’ के उकसाने पर मिजो प्रांत में ये लोग आक्रामक हो गए । हिंसाचार आरंभ हो गया । मिजो जनता असम एवं केंद्र सरकार पर भी अप्रसन्न थी । मिजो विद्रोहियों की सशस्त्र गतिविधियां बढ गईं थीं और जनता द्वारा की गई सहायता की मांग सरकार पूर्ण नहीं कर सकती थी । इसलिए सेना की ‘असम राइफल्स्’ के कुछ मिजो सैनिकों ने विद्रोह के संकेत दिखाए । तब भारी संख्या में मिजो सैनिकों को सेना से निकाल दिया गया । इन प्रशिक्षित सैनिकों का बडा गुट सरकारी शस्त्रों सहित ‘मिजो नेशनल फ्रंट’ से जा मिला । इससे मिजो विद्रोहियों की एक छोटी-सी सेना निर्माण हो गई । स्थिति संभालने में केंद्र सरकार असफल थी ।
अंत में उसके अगले महीने में, ५ मार्च १९६६ को भारतीय वायु सेना ने मिजो प्रांत में बम बरसाना आरंभ किया । ‘मिजो नेशनल फ्रंट’ के विद्रोहियों को नियंत्रित करने के लिए भूमि पर युद्ध लडना, असम राइफल्स् के सैनिकों के लिए कठिन हो रहा था; क्योंकि मिजो विद्रोही ‘गुरिल्ला युद्ध’ में अर्थात छापामार युद्ध में पारंगत थे । उनका आक्रमण करके भाग जाना, भारतीय सेना के लिए भारी पड रहा था । ऐसा कहते हैं कि तब अन्य कोई उपाय शेष न देख, वायु सेना का उपयोग किया गया । इस हवाई आक्रमण में सैकडों लोगों के प्राण गए ।
३. भारत के माथे पर लगा सदैव हरा रहनेवाला घाव है पूर्वाेत्तर भारत
‘वास्तव में ऐसा हवाई आक्रमण कभी हुआ ही नहीं’, ऐसा दावा केंद्र सरकार आज तक करती आई है; परंतु इन आक्रमणों के पीछे एक दंतकथा इस प्रकार है । वह सही है या गलत ? इसकी पुष्टि किसी ने नहीं की । मेरी समझ के अनुसार भले ही सरकार ने यह आक्रमण न होने का दावा किया हो, तब भी इस आक्रमण के लिए जिन्हें उत्तरदायी माना गया था, उन दोनों पायलटों को निलंबित कर दिया गया । तदुपरांत वे दोनों कांग्रेस पक्ष में सम्मिलित हुए और राष्ट्रीय राजनीति में बडे नेता के रूप में विख्यात हुए । इनमें से एक पुणे के ही सांसद और बडे मंत्री थे । मिजोरम पर हुए इस हवाई आक्रमण में प्रचंड प्राणहानि हुई । इन बातों का रोष आज भी मिजो जनता के मन में है । इसलिए आज भी ५ मार्च को वे ‘काला दिवस’ मनाते हैं ।
जिसने वर्ष १९८६ में मिजोरम को ‘स्वतंत्र राज्य’ घोषित किया, उन राजीव गांधी ने अनेक ढीली-ढाली नीतियां बनाईं । इस कारण पूर्वाेत्तर भारत झुलसता रहा । मणिपुर में जो हुआ, वह अब तक के शासनकर्ताओं के पाप हैं । उसे मोदी-शाह पर थोपा जा रहा है । ‘पूर्वाेत्तर भारत हिन्दुस्थान के माथे पर लगा कभी न ठीक हुआ घाव है । वह घाव ब्रिटिशों ने दिया है । कांग्रेस और वामपंथी विचारों के अलगाववादियों ने उसे बार-बार कुरेदा है । इसलिए वह नासूर बन गया है । इसका उत्तरदायी कौन है ?’, इन विचारों पर आरोप-प्रत्यारोप करने के स्थान पर मणिपुर को संभालना, सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए । सरकार यह करेगी ही; परंतु राहुल गांधी जैसे लोग वहां जाकर अलगाव के बीज न बोएं और मीठी-मीठी बातें करके पीठ में छुरा न घोंपें । लोगों को भडकाएं नहीं । ‘वर्ष १९६६ में इंदिरा गांधी ने जो किया, वही मोदीजी करें’, ऐसा कहने की स्थिमि में हम नहीं हैं; परंतु ऐसी अपेक्षा है कि मोदीजी मतों की राजनीति के परे जाकर देश की सार्वभौमिकता को महत्त्व देंगे और वैसा निर्णय लेंगे । कांग्रेस के शासनकाल में एक से बढकर एक, ऐसी अनेक काली करतूतें हुई हैं । उन्हें बाहर निकालना आवश्यक है ।’
– प्रभाकर सूर्यवंशी
(साभार : ‘आकार डिजी ९’ यू ट्यूब वाहिनी)
| ‘वीर सावरकर एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस, इन दोनों के साथ अंग्रेजो ने जो क्रूरता की, उससे अधिक क्रूरता स्वतंत्र भारत के अहिंसावादी शासनकर्ताओं ने की । उन्होंने उनके कार्य को प्रकाशित न करना, उनका साहसी इतिहास छुपाना आदि जैसे घृणात्मक कृत्य किए ।’ – श्री. पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ, प्रखरराष्ट्रवादी वक्ता |
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