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नई देहली – यदि राष्ट्रपति फांसी से दंडित अपराधियों की दया याचिका अस्वीकार कर दें, तो उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाती थी । परंतु अब केंद्र सरकार ने इस कानून में परिवर्तन कर यह सुविधा रद्द कर दी है । इस कारण इससे आगे अपराधियों की दया याचिका पर राष्ट्रपति का निर्णय ही अंतिम रहेगा । राष्ट्रपति द्वारा लिए गए निर्णय को देश के किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती । केंद्र सरकार द्वारा वर्षाकालीन सत्र में पारित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक में यह परिवर्तन किया गया है । इसके द्वारा राष्ट्रपति को अनेक अधिकार दिए गए हैं ।
इससे पूर्व फांसी से दंडित अपराधी को राष्ट्रपति से दया याचिका देने की सुविधा थी, तथा राष्ट्रपति यदि उसका दंड अल्प करें, तो उनको देश के न्यायालय में इसका कारण भी स्पष्ट करना पडता था । परंतु अब न्यायालय में इसका कारण स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं रहेगी । राष्ट्रपति के निर्णय के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दे सकते । राष्ट्रपति का निर्णय ही अंतिम रहेगा । राष्ट्रपति के निर्णय से संबंधित कोई भी प्रश्न देश के किसी भी न्यायालय में पुनरावलोकन हेतु नहीं उठाया जा सकता । इससे पूर्व राष्ट्रपति के लिए गए निर्णय को भी आवाहन दिया जा सकता था, ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक बार स्पष्ट किया था ।
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