
भारतीय फुटबॉल संघ ने उत्कृष्ट खेल दिखाकर ‘सैफ’ कप पर अपना नाम अंकित किया । उन्होंने अंतिम मैच में कुवैत को पराजित कर यह ऐतिहासिक विजय पाई । इस विजय के उपरांत कुछ ही क्षण में स्टेडियम में उपस्थित दर्शकों ने ए.आर. रहमान द्वारा गाया ‘वन्दे मातरम्’ गीत गाया । सामाजिक माध्यमों में इस रोमांचक क्षण का वीडियो प्रसारित हो रहा है । बेंगळूरु के श्री कांतिरवा स्टेडियम में यह मैच संपन्न हुआ । यह मैच देखने के लिए २६ सहस्र दर्शक उपस्थित थे । उपस्थित सभी दर्शकों को एकत्रित रूप से, जोशपूर्ण, एक सुर तथा एक लय में ‘वन्दे मातरम्’ गाते हुए देखकर किसी भी भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा होगा । यह मैच बहुत रोमांचक हुआ । आरंभ में भारत पीछे था; परंतु उसके उपरांत भारत ने बराबरी की । अंततः ‘पेनाल्टी शूटआउट’ में भारत ने कुवैत को ५-४ से पराजित कर दक्षिण एशियाई फुटबॉल प्रतियोगिता ‘सैफ’ में अपनी विजयी मुद्रा अंकित की ।

यह वीडियो देखने के उपरांत क्रिकेट प्रेमियों को वर्ष २०११ में संपन्न क्रिकेट विश्व कप के अंतिम मैच का स्मरण हुआ । उस समय भी क्रिकेट प्रेमियों ने रात के समय चल-दूरभाष संचों का टॉर्च चलाकर स्टेडियम में ‘वन्दे मातरम्’ गाया था । एक महत्त्वपूर्ण मैच जीतने पर दर्शक अपने-अपने ढंग से आनंद व्यक्त करते हैं । श्री कांतिरवा स्टेडियम में एकत्रित फुटबॉल प्रेमियों ने अपना आनंद व्यक्त करने के लिए ‘वन्दे मातरम्’ गीत चुना, यह विशेष बात है ।

आज भी देशप्रेम, देशाभिमान अथवा देश की विजय का आनंद व्यक्त करने के लिए अधिकतर भारतीयों को ‘वन्दे मातरम्’ गाकर ही उसे प्रकट करने की इच्छा होती है, इसे ध्यान में लें ! ये २ शब्द भारतीयों को संगठित करते हैं, उनमें नवचेतना जागृत करते हैं तथा देश के लिए कुछ करने का बल उत्पन्न करते हैं । स्वतंत्रता के उपरांत धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कांग्रेसी शासनकर्ताओं ने भारतीयों के मन में जिसका अटल स्थान है, उन ‘वन्दे मातरम्’ के २ शब्दों को उनके मन से हटाने का भरसक प्रयास किया; परंतु वे उसमें सफल नहीं हो पाए । आज भी भारत के युवकों को ये २ शब्द मोहित करते हैं । इसलिए स्टेडियम में युवा फुटबॉल प्रेमियों द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ गाया जाना एक प्रकार से ‘वन्दे मातरम्’ का अस्तित्व मिटाने का प्रयास करनेवालों के मुंह पर तमाचा है !
‘वन्दे मातरम्’ गीत की महिमा !
भारतीय फुटबॉल संघ के इस उत्कृष्ट प्रदर्शन से शरीर में रोंगटे खडे हो जाते हैं । अन्य मैच के समय युवा दर्शक खिलाडियों पर बोतल फेंकना, कागद फेंकना, स्टेडियम में खाद्य पदार्थ फेंकना, स्टेडियम में दौडकर आना, अंगविक्षेप करते हुए नाचना जैसे विकृत कृत्य करते हैं; परंतु बेंगळूरु के श्री कांतिरवा स्टेडियम का उस दिन का चित्र कुछ भिन्न ही था । इन युवा फुटबॉल प्रेमियों ने ऐसे कोई भी विकृत कृत्य न कर ‘वन्दे मातरम्’ गीत गाकर देश के प्रति प्रेम व्यक्त किया । यही देशभक्ति है । जिस मिट्टी में, देश में तथा कर्मभूमि में हमारा जन्म हुआ है, उस मिट्टी के साथ एकनिष्ठ रहकर देश के लिए संघर्षरत रहने की शक्ति ‘वन्दे मातरम्’ गीत से ही मिलती है ।

४ फरवरी २०२१ को डेढ लाख से अधिक लोगों ने चौरीचौरा शताब्दी महोत्सव में हुतात्माओं की स्मृति में उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ सहित उत्तर प्रदेश के नागरिकों द्वारा नमस्कार की मुद्रा में ‘वन्दे मातरम्’ गायन का वीडियो अपलोड किया । इससे ‘वन्दे मातरम्’ के प्रति सभी की जनभावना दिखाई देती है ।
देशभावना की जागृति के लिए ‘वन्दे मातरम्’ आवश्यक !
‘वन्दे मातरम्’ गीत केवल हिन्दुओं के लिए है, इस गीत में हिन्दू देवी-देवताओं का स्तुतिगान किया गया है तथा हमारे इस्लाम पंथ से इस गीत का कोई संबंध नहीं है; ऐसे कारण देकर कुछ धर्मांध (कट्टर) मुसलमान यह गीत गाना अस्वीकार करते हैं । आधुनिकतावादी एवं धर्मनिरपेक्षतावादी भी इस गीत का विरोध करते हैं । ‘वन्दे मातरम्’ में समाहित शक्ति को प्रत्येक भारतीय बार-बार अनुभव करता है । इस कारण प्रतियोगिताओं, कार्यक्रमों, महोत्सवों, अधिवेशनों जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘वन्दे मातरम्’ गाया जाना चाहिए, जिससे प्रत्येक युवक में राष्ट्राभिमान, देशप्रेम, कृतज्ञता आदि सद्गुण अंतर्भूत होंगे तथा प्रतिदिन उनके मन में ‘हमें देश, राष्ट्र एवं धर्म के लिए कुछ करना चाहिए’, यह भावना जागृत होगी । वर्ष १९०५ में हीरालाल जैन ने भारत की पहली राजनीतिक फिल्म बनाई तथा उन्होंने उसका अंत ‘वन्दे मातरम्’ गीत से किया था । पिछले कुछ वर्षाें से सिनेमाघरों में फिल्म समाप्त होने के उपरांत राष्ट्रगीत गाया जाता है, उस समय सभी दर्शक खडे रहकर राष्ट्रगान गाते हैं, यह अच्छी बात है । इससे कुछ समय के लिए ही सही; परंतु देशप्रेम जागृत होकर देश के लिए कुछ करने की अभिलाषा जागृत होती है ।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम वर्ष १८५७ की सशस्त्र क्रांति से आरंभ हुआ । यह क्रांति सफल नहीं हुई; परंतु उसके प्रज्वलित स्वतंत्रता की मशाल आगे जाकर अखंडित विभिन्न रूप से प्रकट होती रही । बंगाल, महाराष्ट्र एवं पंजाब सशस्त्र क्रांति के केंद्र बने; परंतु यह क्रांति व्यक्तिगत स्तर पर अथवा छोटे समूहों तक सीमित थी । वर्ष १८७० के दशक में एक भिन्न आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के पूर्व का अर्थात वर्ष १८८५ पूर्व का वह काल था । अंग्रेजों के कुटिल षड्यंत्र तथा अत्याचारी राज्य के कारण भारतीयों में स्वतंत्रता की भावना जागृत होने लगी । ऐसे वातावरण में ‘वन्दे मातरम्’ गीत का जन्म हुआ । स्वतंत्रता के आंदोलन में ‘वन्दे मातरम्’ अत्यंत लोकप्रिय घोषणा थी । उस समय किसी भी फेरी में ‘भारतमाता की जय’ एवं ‘वन्दे मातरम्’ होता ही था । आज की स्थिति का विचार किया जाए, तो देश में आज के समय स्वतंत्रता के पूर्व जो स्थिति थी, वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई है । इससे राष्ट्रद्रोहियों की देशविरोधी गतिविधियों को तोडकर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना तथा भारतीयों में देशाभिमान जागृत होने के लिए सर्वत्र राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ का गायन होना ही चाहिए !
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