‘इस्रो’ के अध्यक्ष एस. सोमनाथ का गंभीर आरोप

उज्जैन (मध्य प्रदेश) – बीजगणित, वर्गमूल, समय की गणना, वास्तुकला, ब्रह्मांड का आकार, धातुविज्ञान एवं वायुयान चलाना सर्व प्रथम वेदों द्वारा सिखाया गया था । वेद ही विज्ञान के मूल हैं; परंतु यह ज्ञान अरबस्तान से पश्चिमी देशों में पहुंच गया तथा वहां के विज्ञान विशेषज्ञों ने अपने नाम से उनका प्रचार किया । वे उज्जैन के ‘महर्षि पाणिनी संस्कृत एवं वेद विद्यापीठ’ में छात्रों को संबोधित करते हुए ऐसा बोल रहे थे । पाणिनी के द्वारा संस्कृत का व्याकरण लिखा गया है ।
“विज्ञान का मूल वेद है, अरब के रास्ते यह पश्चिमी देशों तक पहुंचा, उन्होंने अपने नाम से प्रचारित किया “
◆ ISRO के चेयरमैन एस सोमनाथ ने कहा
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— News24 (@news24tvchannel) May 25, 2023
एस. सोमनाथ ने कहा,
१. विविध विषयों का ज्ञान संस्कृत भाषा में था एवं इस भाषा की लिपी नहीं थी । लोग एक-दूसरे से ज्ञान अर्जित करते एवं स्मरण में रखते थे । आगे जा कर उसे लिखने के लिए देवनागरी लिपी का उपयोग किया गया ।
२. अभियंता एवं शास्त्रज्ञों को संस्कृत भाषा बहुत अच्छी लगती है । यह भाषा संगणक के लिए अत्यंत सरल है तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) उसे सरलता से पढ सकती है । ‘संस्कृत का उपयोग गिनती में कैसे किया जाए’, इस पर बहुत शोध चल रहे हैं ।
३. भारत में संस्कृत भाषा में निर्मित साहित्य केवल साहित्यिक दृष्टिकोण से ही नहीं, अपितु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण हैं । संस्कृत के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक अध्ययन में अंतर नहीं है ।
४. भारतीय शास्त्रज्ञों ने प्राचीन काल से अपना शोध संस्कृत में लिखा है । परंतु कुछ समय पश्चात उस पर बहुत शोध नहीं हुआ । ८ वें शतक में लिखा गया ‘सूर्य सिद्धांत’ इसका उदाहरण है । इस पुस्तक में पृथ्वी की परिधि, सूर्यमाला एवं अनेक बातें लिखी गई थीं, जिसका श्रेय बाद में पाश्चात्य देशों ने लिया ।
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