देवद (पनवेल) के सनातन आश्रम की तत्त्वनिष्ठ और पूरे मन से सेवा करनेवाली पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमाला दळवी (आयु ४४ वर्ष) के सम्मान समारोह का भाववृत्तांत !

पू. (सुश्री) रत्नमाला दळवी

अनेक दिनों से साधक प्रतीक्षा कर रहे थे कि रत्नाजी (सुश्री (कु.) रत्नमाला दळवी) संत कब बनेंगी ? ६ मार्च २०२२ को सभी की रत्नादीदी पू. रत्नाजी हो गईं ! सभी के लिए हर्ष का यह मंगलक्षण आया और साधकों की प्रतीक्षा समाप्त हो गई…! देवद (पनवेल) के सनातन के आश्रम में एक भावसमारोह में सनातन की ६९ वीं संत पू. (श्रीमती) अश्विनी अतुल पवार ने काव्यसुमनों के माध्यम से सुश्री (कु.) रत्नमालाजी दळवी का सनातन की संत होने का अत्यंत शुभवार्ता दी । उस समय परात्पर गुरुदेवजी का (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का) शब्दपुष्परूप संदेश उन्होंने पढकर सुनाया । गुरुदेवजी की कृपा का अनुभव करते उपस्थित सभी के मन गुरुदेवजी के प्रति कृतज्ञता से भर गए ।

शांत, स्थिर, आनंदी स्वभाव की और परिपूर्ण सेवा करनेवाली देवद आश्रम के सनातन की ११८ वीं संत सुश्री (कु.) रत्नमाला दळवी (आयु ४४ वर्ष) !

परात्पर गुरु डॉ. आठवले

मूलतः तिवरे (तहसील राजापुर, जनपद रत्नागिरी) की सुश्री (कु.) रत्नमालाजी दळवी (आयु ४४ वर्ष) वर्ष २००३ से सनातन के माध्यम से साधना कर रही हैं । अध्यात्म में सबसे महत्त्व की बात यह होती है कि समझ में आई साधना को कृति में लाना ! सुश्री (कु.) रत्नमालाजी ने आज तक की उनकी साधनायात्रा में यह बात उत्तम प्रकार से साध्य की । गुरुकृपायोग के अनुसार साधना समझ में आने पर उन्होंने व्यष्टि और समष्टि साधना का अच्छा तालमेल बिठाया । इससे उनका आज्ञापालन का गुण ध्यान में आता है ।

सुश्री (कु.) रत्नमालाजी की सेवाभावी वृत्ति बहुत प्रशंसनीय है । अनेक शारीरिक कष्ट रहते भी वे भावपूर्ण, परिपूर्ण और ईश्वर के अनुसंधान में रहकर सेवा करती हैं । वे वर्तमान में देवद आश्रम में सेवा कर रही हैं । जो दिखाई दे वही कर्तव्य, ऐसा उनका भाव होकर आश्रम की अन्य सेवाएं भी वे अगुवाई से करती हैं । पहले किया तदनंतर कहा, यह कथन उनके विषय में सार्थ है । उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहसाधकों के मन पर व्यष्टि साधना और परिपूर्ण सेवा का महत्त्व अंकित किया है और वे उन  सभी से उत्तम प्रकार से साधना करा रही हैं ।

शांत, स्थिर, अंतर्मुख, सेवा की लगन आदि गुणरत्नों की माला सुश्री (कु.) रत्नमालाजी की आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र गति से हो रही है । वर्ष २०१३ में उन्होंने ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर पहुंचकर जन्म-मृत्यु का चक्र पार किया । आज के इस शुभदिन पर ७१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर पहुंचकर समष्टि संत के रूप में वे सनातन के ११८ वें संतपद पर विराजमान हुई हैं ।

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी दळवी की आगे की प्रगति भी ऐसे ही शीघ्रता से होगी, इसका मुझे विश्वास है ।

– (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले (६.३.२०२२)

… ऐसे हुआ भावसमारोह !

बाएं से पू. उमेश शेणै, पू. दत्तात्रेय देशपांडे, पू. रमेश गडकरी, पू. (श्रीमती) अश्विनी पवार, श्री. अनिरुद्ध राजंदेकर (आध्यात्मिक स्तर ६१ प्रतिशत), (गोद में) पू. वामन राजंदेकर, पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमाला दळवी, पू. शिवाजी वटकर और सद्गुरु राजेंद्र शिंदे

सभी जिसकी उत्कंठा से प्रतीक्षा कर रहे थे उस भावसमारोह का आरंभ होने पर पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने कहा, परात्पर गुरुदेवजी के (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के) विश्वव्यापी समष्टि कार्य में प्रकृति, कौशल्य, आयु, क्षमता और मर्यादा आदि के अनुसार आबालवृद्ध,  तथा रुग्ण साधकों के लिए समष्टि सेवा उपलब्ध है । जितनी व्यक्तियां उतनी प्रकृतियां, उससे भी अधिक साधना और सेवा मार्ग हो गए हैं । विविध प्रकार की सेवाएं करते समय साधकों की अडचनों का सुश्री (कु.) रत्नमालाजी समाधान करती है, उनका नियोजन कराती है, इतना ही नहीं, तो उनसे समष्टि सेवा के साथ ही उनसे व्यष्टि साधना भी करा लेती है । इसीलिए वह विविध प्रकार की सेवा करनेवाले साधकों का आधार बनी है !

पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने प्रथम आश्रम के साधकों को उनके सेवा के अनुभव बताने कहा । साधकों के अनुभव बताते समय सुश्री (कु.) रत्नमालाजी की उन्हें सहायता कैसे मिलती है, यह ध्यान में आया । तदनंतर सुश्री (कु.) रत्नमालाजी साधकों की किस प्रकार सहायता करती हैं, इस विषय में पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने उनसे विविध प्रश्न पूछकर उनके गुणरत्नों का संग्रह सहजता से सामने लाया !

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी गुणरत्नों की खदान… !

व्यापकता

(सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी ने प्रश्नोत्तर में कहा, आश्रम की अन्य सेवाएं भी मुझे मेरी ही लगती हैं । मैं स्वयं उन्हें नहीं कर पायी, तो भी साधकों की समष्टि सेवा का नियोजन कराना, यह मुझे मेरा दायित्व लगता है । गुरुदेवजी को साधकों का नामजप की ओर अनदेखी करना नहीं भाएगा । इसलिए साधकों के नामजप आदि उपाय कैसे होंगे, यह मैं देखती हूं ।

इस पर पू. (श्रीमती) अश्विनीजी बोलीं, इससे (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी का व्यापकत्व ध्यान में आता है । गुरुजी को क्या अपेक्षित है, यह पहचानकर वे सेवा करती हैं ।

कर्तापन अर्पित करना

आश्रम में साधकसंख्या अल्प रहते अलग अलग प्रकार की सेवाओं का नियोजन करना, तथा बहुत शारीरिक कष्ट रहते भी सहजता से सेवा करना, यह कैसे साध्य होता है ?, ऐसा प्रश्न पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने पूछने पर (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी बोलीं, ‘‘सारी सेवा ईश्वर ही करवा लेते हैं, ऐसा भेरा भाव रहता है ।

इस पर पू. (श्रीमती) अश्विनीजी बोलीं, कर्तापन नष्ट हो रहा है, यही इससे ध्यान में आता है । सेवा में अपनापन, देहबुद्धि अल्प रहना, गुरुदेव को अपेक्षित करने की लगन, सब कुछ गुरुदेवजी ही कर रहे हैं, ऐसा अपार भाव, इसके साथ सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी की गुणविशेषताएं पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने काव्यरूप में स्पष्ट किए अन्य गुणगंधों की सुगंध से महक उठीं !

(मराठी कविता का हिंदी में अनुवाद )

गुरुसेवा की  तीव्र लगन है जिसके मन में ।

अनेक सेवाओें का दायित्व जो लीलया है निभाती ॥ १ ॥

स्थिरता, सहजता, नम्रता और तत्त्वनिष्ठता ।

इन दिव्य गुणरत्नों की वह गूंथती है माला ॥ २ ॥

सातत्य, दृढता, परिपूर्णता जैसे अनेक गुणाें का साज ।

उसकी साधना का लेखा देता है ईश्वर आज ॥ ३ ॥

गुणाें का करके जोड, किया व्यवकलन दोषों का ।

गुना किया भक्ति-प्रीति का, अंतस् में शेष कृतज्ञता ॥ ४ ॥

वर्ष-अंत में ठीक मिला साधना का लेखा-जोखा ।

अनेक गुणरत्नों की माला बनी पू. रत्नमाला ॥ ५ ॥

संतपद घोषित होने के उपरांत पू. (सश्री (कु.)) रत्नमालाजी दळवी ने व्यक्त किया मनोगत !

गुरुदेवजी ने मुझे आगे की सेवा के लिए बहुत बडा दायित्व दिया है !  पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमाला दळवी

ऐसा लगता है कि गुरुदेवजी ने मुझे आगे की सेवा के लिए बहुत बडा दायित्व सौंपा है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी तथा मेरी सहायता करनेवाले सभी साधकों के प्रति बहुत कृतज्ञता लगती है । आज जो कुछ दिया है, वह १०० प्रतिशत परात्पर गुरुदेवजी ने ही दिया है । इस में मेरा तिनके जितना भी योगदान नहीं है ( इसमें मेरे प्रयास नगण्य हैं ) ।

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाताई द्वारा दिया संदेश !

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी कृतज्ञताभाव से गद्गद हो जाने से वे अधिक बोल नहीं पायीं । इस समय साधकों को संदेश देते हुए वे बोलीं, साधकाें को  गुरुदेवजी को अपेक्षित स्वभावदोष और अहं निर्मूलन प्रक्रिया कर उनके समष्टि कार्य में अधिक से अधिक योगदान देना चाहिए ।

संतसम्मान का अलौकिक क्षण कृतज्ञता के भावाश्रुओं से मना !

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी दत्ताराम दळवी का  सम्मान करते पू. (श्रीमती) अश्विनी अतुल पवार (बायीं ओर)

उस समय (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी ७१ प्रतिशत स्तर पर पहुंचकर सनातन के ११८ वें संतपद पर  विराजमान होने के विषय में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के संदेश का पठन  पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने किया । तदनंतर पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने पुष्पहार पहनाकर उनका सम्मान किया । उन्हें उपहार दिया और उनको आलिंगन दिया ! इस भावमिलन के उपरांत पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने  पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी के  चरणों पर मस्तक रखकर वंदन किया । तदनंतर पू. (श्रीमती) अश्विनीजी का   भाव जागृत हुआ । उस समय  पू. (सुश्र्ी (कु.)) रत्नमालाजी कृतज्ञताभाव से गद्गद हुई और कुछ समय तक उसी भाव में थी ।

तदनंतर पू. रमेशजी गडकरी, पू. शिवाजी वटकर, सद्गुरु राजेंद्रजी शिंदे और पू. उमेशजी शैणे ने पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी के गुणगौरवयुक्त अनुभव बताने से साधक अधिक ही भावविभोर हुए !

भावसमारोह में उपस्थित सद्गुरु और संत !

सद्गुरु राजेंद्रजी शिंदे, पू. (श्रीमती) निर्मलाजी दाते, पू. बलभीमजी येळेगावकर, पू. दत्तात्रेयजी देशपांडे, पू. गुरुनाथजी दाभोलकर, पू. उमेशजी शेणै, पू. शिवाजी वटकर और पू. रमेशजी गडकरी

उस समय देवद आश्रम के पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी की सेवा से संबंधित साधक उपस्थित थे, साथ ही मिरज के सनातन आश्रम के उनकी सेवा से संबंधित कुछ साधक ऑनलाईन उपस्थित थे ।

इस समारोह से पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी के बडे भाई श्री. वसंत दळवी, भाभी श्रीमती वैभवी दळवी और भांजी कु. नयना दळवी संगणकीय प्रणाली द्वारा जुडे थे ।

संतपद घोषित किए जाने पर मुझे परात्पर गुरुदेवजी और श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदाजी सिंगबाळ के अस्तित्व का अनुभव हो रहा था । –  पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी

देह प्रारब्धावरी सोडा, चित्त चैतन्याशी जोडा ! (हिंदी में अर्थ-देह प्रारब्ध पर छोडो, चित्त चैतन्य से जोडो )  यह प.पू. भक्तराज महाराज के भजन की पंक्ति यथावत् कृति में लानेवाली पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी !

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी को कटि का तीव्र कष्ट रहने से पेटी पहननी पडती है । दाएं हाथ की  स्थिति दुर्बल हो जाने से उन्होंने बाएं हाथ से संगणक का माऊस चलाना सीख लिया । संगणक से संबंधित सेवा होकर भी वे  संगणक पर अधिक समय तक सेवा नहीं कर पाती । तब भी पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी के मुखमंडल पर कभी भी तीव्र शारीरिक कष्टों का तनाव दिखाई नहीं देता, न ही कभी उस कारण उन्हाेंने अधिक समय तक विश्रांती ली ! गुरुदेवजी की इस कृपा पर कृतज्ञता व्यक्त करते हुए वे बोलीं ‘शारीरिक कष्ट रहते भी सेवा का आरंभ करने पर कष्ट कब नष्ट हो जाता है , इसका पता ही नहीं चलता !’ सेवा की तीव्र लगन के कारण वे यह अनुभूति विगत कुछ वर्षाें से सातत्य से ले रहीं हैं । पू. (सुश्री (कु.)) ‘रत्नमालाजी देह प्रारब्धावरी सोडा । चित्त चैतन्यासी जोडा ।’ (हिंदी में अर्थ-देह प्रारब्ध पर छोडो, चित्त चैतन्य से जोडो ) यह प.पू. भक्तराजजी महाराज के भजन की पंंिक्त प्रत्यक्ष में जी रही हैं, यह ध्यान में आया और साधनारत सभी के लिए वह प्रेरणादायी हुआ !

संतपद घोषित करने पर पू. (सश्री (कु.)) रत्नमालाजी को अनुभव हुई भावावस्था !

संतपद घोषित करने के पश्चात् पू. (श्रीमती) अश्विनीजी पवार ने मेरा हाथ अपने हाथ में लेने पर ईश्वर ने मुझे  उसके चरणाें के पास लिया है, ऐसा लगकर बहुत भावजागृति हुई । भीतर से आनंद का फुहारा उमड रहा था । समारोह मेरा होने पर भी किसी दूसरे के समारोह का अनुभव कर रही हूं, ऐसा लग रहा था । चार घंटों से अधिक घंटे बैठने पर भी समारोह समाप्त होने के पश्चात् अधिक शारीरिक कष्ट नहीं लगा, ऐसा  पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी ने बताया ।

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी के परिजनों का व्यक्त किया मनोगत

केवल हमारे उद्धार के लिए ही हमें रत्नमालाजी के सहवास में रखा है ! – वसंत दळवी (पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी के  बडे भाई), तिवरे (जनपद रत्नागिरी)

श्री. वसंत दळवी

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी दळवी का संतपद पर विराजमान हुईं हैं, यह जानने के पश्चात ऐसा लग रहा है कि आज का यह क्षण केवल गुरुदेवजी के कारण अनुभव हो रहा है ।’, ऐसा कहते हुए श्री. वसंत दळवी कृतज्ञताभाव से गद्गद हो गए । उस समय उन्होंने पू. रत्नमालाजी के जीवन का २० वर्ष पहले का एक प्रसंग बताया । श्री. वसंत दळवी ने कहा, ‘‘वर्ष २००२ में आधुनिक वैद्यों ने बताया था कि पू. रत्नमालाजी के हृदय में छिद्र है । कुछ भी करो, वह नहीं बचेगी !’ तब हमने यह स्थिति परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को बताई । वे बोलें, ‘‘आप इसका शस्त्रकर्म करो ।’’ तदनंतर आश्रम में आकर १५ दिन रहो और तत्पश्चात् घर जाना । हमने वैसा किया । पू. रत्नमालाजी का जीवित रहना, यह गुरुदेवजी की ही कृपा है । उस समय उसकी आयु समाप्त हो गई थी; कितु गुरुदेवजी ने ही उसे जीवनदान देकर उससे साधना करवा ली । केवल हमारा उद्धार करने के लिए ही गुरुदेवजी ने हमें उसका साथ दिया । यह हमारा भाग्य ही है । इसके लिए गुरुदेवजी के चरणों में कोटि कोटि कृतज्ञता !

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी की भाभी श्रीमती वैभवी दळवी यह शुभवार्ता सुनकर बहुत हर्षित होने से वे कुछ भी नहीं बोल सकी ।

बुआजी परिवार और घर में नहीं उलझी रही हैं ! – कु. नयना दळवी (पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी की भांजी), कोल्हापुर

कु. नयना दळवी

बुआजी का संतपद पर विराजमान होना सुनकर मुझे बहुत आनंद हुआ । इस समारोह में हम प्रत्यक्ष में उपस्थित नहीं हैं, तो भी गुरुदेवजी के कारण हम वहीं उपस्थित हैं, ऐसा लगता है । मैं छोटी थी तबसे बुआजी के पूर्णकालीन साधना करने के लिए आश्रम में जाने से मुझे उसका प्रत्यक्ष सहवास अल्प मिला । तो भी उससे कुछ बाते सीखने मिलीं । बुआजी परिवार और घर में ही नहीं फंसी रही । त्योहारों के समय अन्य साधक घर जाना चाहते हैं; इसलिए वह घर नहीं आती । त्योहार के उपरांत आती है । घर आने पर भी वह सेवा ही करती है । सेवा करने की बहुत लगन होने से शारीरिक कष्ट रहने पर भी वह लेटकर सेवा करती है ।

उसकी गुरुदेवजी पर बहुत श्रद्धा है । अपनी प्रत्येक कृति दूसरों को आनंद देनेवाली होनी चाहिए, ऐसा उसका भाव रहता है । इसलिए सेवा की व्यस्तता रहते हुए भी दादा-दादी को (पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी के माता-पिताजी को) संपर्क कर उनकी कुशलता पूछती है ।

तिवरे (जनपद रत्नागिरी) में वास्तव्य करनेवाली पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी की माता श्रीमती शोभना दळवी और पिता श्री. दत्ताराम दळवी को भी यह शुभवार्ता सुनकर बहुत आनंद हुआ ।

विशेष

भावसमारोह का सूत्रसंचालन ६३ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरवाली श्रीमती तनुजा गाडगीळ ने अत्यंत मधुरवाणी में भावपूर्वक किया । उन्होंने किए भावप्रयोगों के कारण सभी साधक श्रीकृष्ण के अस्तित्व का अनुभव कर रहे थे । भावप्रयोग बताते समय वे भाव से गद्गद हो रहे थे । समारोह में बीच-बीच में भावपूर्वक लिए गए भावप्रयोगों के कारण वातावरण में भी भावतरंगों का अनुभव हो रहा था ।

रत्नमालाजी ने पू. (श्रीमती) दातेजी से आशीर्वाद लिया, तदनंतर सद्गुरु और संतों को वंदन कर उसने आशीर्वाद लिए । भावसमारोह का समापन करते हुए पू. (श्रीमती) अश्विनीजी ने कहा, संत तुकारामजी महाराज को संतों में ईश्वर दिखाई देता है । संतों के बीच रहकर एक बार पाप नष्ट हो जाने पर जीवन के त्रिविध ताप भी नष्ट हो जाते हैं । संत उनके सत्संग से मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियां परिवर्तित करते हैं । संतों का समुदाय है सनातन । परात्पर गुरुदेवजी की कृपा से ऐसे संत हमें देखने मिल रहे है, हम उनकी सेवा कर पा रहे हैं, इसलिए उनके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करें ।

पू. (सुश्री (कु.)) रत्नमालाजी संतपद पर विराजमान होने पर सूझी कविता

(मराठी कविता का हिन्दी में अनुवाद)

रत्नागिरी का रत्न

संतपद पर हुआ विराजमान ।

देह प्रारब्ध पर छोडो

चित्त चैतन्य से जोडो ।

यह संतवचन

कृति में लाया ॥ १ ॥

शारीरिक व्याधियों को पछाडकर लगन से की सेवा ।

जीवन का सार्थक किया गुरुदेवजी की कृपा ने कुछ ही वर्षाें में उन्होंने ॥ २ ॥

सहजता, नम्रता, प्रेमभाव, निर्मलता

और तत्त्वनिष्ठता ही है उनका स्थायीभाव ।

ऐसी पू. रत्नमालाजी के चरणों में कोटिशः कृतज्ञता ॥ ३ ॥

– वैद्या (सुश्री (कु.)) माया पाटील, सनातन आश्र्म, देवद, पनवेल.