खालिस्तान के रूप में भारत का एक और विभाजन टालने के लिए हिन्दू एवं राष्ट्रनिष्ठ सिखों का वैश्विक विद्रोह आवश्यक !

लंडन एवं सैन फ्रांसिस्को, इन शहरों में स्थित भारतीय दूतावासों के कार्यालयों पर आक्रमण करने के पश्चात खालिस्तानियों ने अब वॉशिंग्टन में चल रहे खालिस्तान समर्थकों के आंदोलन में एक भारतीय पत्रकार पर आक्रमण किया है । इस पत्रकार का नाम ललित झा है तथा वह भारतीय समाचार संस्था ‘पीटीआई’ का पत्रकार होने से यह आक्रमण सीधा भारत पर ही किया गया है । पिछले कुछ सप्ताह में ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिन्दू मंदिरों पर खालिस्तानियों द्वारा किए गए आक्रमण हिन्दुओं के लिए संकटकारी हैं । वर्ष १९८४ में भारतीय सेना ने अमृतसर के स्वर्णमंदिर में जो ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाया, उसका प्रतिशोध लेने के लिए वर्ष १९८५ में खालिस्तानियों ने टोरंटो से मुंबई की यात्रा कर रहे ‘एयर इंडिया १८५’ विमान में बमविस्फोट कराकर उसमें यात्रा कर रहे सभी ३२९ यात्रियों को मार डाला था । भारत ने विभिन्न देशों में फैल रही खालिस्तानी शक्तियों का तत्परता से निर्मूलन नहीं किया, तो ऐसे आक्रमण की पुनरावृत्ति हो सकती है । इस संभावना को कौन अस्वीकार कर सकेगा ?

विदेश नीति में परिवर्तन आवश्यक !
अगस्त २०१९ में जब भारत ने कश्मीर को विशेषाधिकार प्रदान करनेवाले अनुच्छेद ३७० को निरस्त कर वहां केंद्र सरकार का जो ऐतिहासिक वर्चस्व प्रस्थापित किया, उसी समय से जिहादी पाकिस्तान के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई । हुर्रियत कॉन्फरेंस’ के नेताओं को अनेक दिनों तक बंदी (नजरबंद) बनाए रखने से पाकिस्तान स्तब्ध रह गया । उसी से भारत को पाठ पढाने के लिए पाकिस्तान के गुप्तचर संगठन आई.एस.आई. ने काम करना आरंभ किया । कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन में स्थित खालिस्तानी शक्तियों को सहायता देकर उन्हें पुनः एक बार भारत विरोधी गतिविधियां चलाने के लिए उकसाया गया । कोरोनाकाल में इन्हीं खालिस्तानियों ने भारत के विषय में विश्व समुदाय में विष फैलानेवाले तथा झूठी जानकारी देनेवाले वीडियो प्रसारित किए । अब कुछ माह से उन्होंने सडकों पर उतरकर भारत का तथाकथित अत्याचारी चेहरा विश्व के सामने रखने का प्रयास आरंभ किया है । ब्रिटेन के भारतीय दूतावास पर किए गए आक्रमण का विरोध करते हुए विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ब्रिटिश सरकार सुरक्षा का दायित्व निभाने में असफल रहने का स्पष्ट वक्तव्य किया है । अमेरिका के भारतीय राजदूत तरनजीत सिंह संधू स्वयं सिख होने से उनके माध्यम से अमेरिका में चल रही खालिस्तानी गतिविधियों के विरुद्ध वाइट हाउस पर प्रभावकारी कोडे चलाना संभव है । ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी एल्बानीज कुछ ही दिन पूर्व भारत की यात्रा पर थे, उस समय प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें ऑस्ट्रेलिया के हिन्दू मंदिरों तथा वहां के भारतीयों की रक्षा पर उन्हें ध्यान देने की बात स्पष्टता से कही । हथियारधारियों को हथियारों की ही भाषा समझ में आती है ! उसके कारण इस संदर्भ में केवल कठोर वक्तव्य देना पर्याप्त नहीं है, अपितु संबंधित देश भारत की चिंता को गंभीरता से लेकर खालिस्तानियों पर कार्यवाही करे, इसके लिए भारत को उन्हें बाध्य करना चाहिए । भारत को खालिस्तानवाद का निर्मूलन करने के लिए अपनी विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है । इसमें पाकिस्तान को विश्व में अलग-थलग करने का सूत्र आना स्वाभाविक ही है !

लडाई की गहराई बढाएं !
खालिस्तानी भारत की आंतरिक स्थिति को अस्थिर करने के लिए जीतोड प्रयास कर रहे हैं । पंजाब पुलिस एवं केंद्र सरकार उनके विरुद्ध जो कार्यवाही कर रही है, उसका भय (दहशत) निर्माण किया जा रहा है । उनके समर्थन में विभिन्न देशों में उत्पात मचाया जा रहा है । इसलिए खालिस्तानी आंदोलन जैसे षड्यंत्र को कुचल डालने के लिए केवल हथियारों का उपयोग करना पर्याप्त नहीं है । पंजाब सहित संपूर्ण देश के राष्ट्रनिष्ठ सिखों को संगठित होकर खालिस्तानियों का विरोध रोकना आवश्यक है । इसमें यह भी प्रश्न है कि ‘क्या पुलिस एवं केंद्र सरकार ऐसे राष्ट्रनिष्ठ सिखों की रक्षा करेगी ?’ विश्व स्तर पर भी राष्ट्रप्रेमी सिख भाईयों तथा हिन्दुओं को एकत्रित होकर खालिस्तानी आंदोलन किस प्रकार मानवता विरोधी, आतंकवादी तथा हिंसक है, यह दिखा देना चाहिए । इसके लिए भारतीय दूतावासों को उनकी सहायता करना आवश्यक है ।
वैचारिक परिवर्तन !
मूलरूप से सिखों का गौरवशाली इतिहास अतुलनीय शौर्य एवं तेजस्वी आध्यात्मिक गुरुओं की शिक्षा पर आधारित है । विगत ५०० वर्षाें में भारत की रक्षा के लिए असंख्य सिखों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया । इस्लामी आक्रमणकारियों ने गुरु तेगबहादुर जैसे अनेक सिख गुरुओं की हत्या की । आज उन्हीं के वंशज खालिस्तान की मांग को लेकर शत्रु के वंशजों से हाथ मिला रहे हैं । क्या यह सिख गुरुओं के बलिदान पर कलंक नहीं है ? जिस हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए सिख पंथ की स्थापना की गई, उन सिखों के मन में ब्रिटिशों ने हिन्दू विरोधी बीज बोए तथा उसी का वृक्ष है आज का खालिस्तानी आंदोलन ! ब्रिटिश कार्यकाल में ईसाई मिशनरी तथा शासक मैक्स आर्थर मैकालिफ ने सिखों एवं हिन्दुओं में विभाजन करने का बीडा उठाया । इसके लिए सिख भारतीय प्रशासनिक अधिकारी वीर सिंह को साथ लेकर ‘सिख धर्म कैसे हिन्दू धर्म से भिन्न है’, यह दिखाने के लिए झूठा इतिहास लिखा गया । यह महत्त्वपूर्ण ‘सबवर्जन’ आज के समय में भारत के एक और विभाजन का मार्ग प्रशस्त कर रहा है । इसलिए खालिस्तानियों के इस आंदोलन को कुचलने के लिए इस वैचारिक प्रदूषण को तोडकर भटके हुए सिखों का भारत के पक्ष में खडा रहना हितकारी होगा । इस मूलभूत परिवर्तन के लिए अब मोदी सरकार मोर्चाबंदी करे, तभी स्थायी रूप से खालिस्तानियों पर धाक जमेगी !
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