
‘केवल पानी देने का समय हो गया; इसलिए पेड-पौधों को प्रतिदिन पानी डाल दिया, ऐसा न करते हुए पेड-पौधों एवं मिट्टी का निरीक्षण कर आवश्यकता होने पर ही पानी दें । गमले में से थोडी-सी मिट्टी लेकर उसका लड्डू समान गोला बन पाता है अथवा नहीं ? यदि बन जाता है, तो पानी की आवश्यकता ही नहीं । इससे यह समझें कि पानी में पर्याप्त नमी है । (एक बार अनुमान आ जाने पर प्रत्येक बार मिट्टी खोदकर देखने की आवश्यकता नहीं होती ।) इसके साथ ही जब पानी देने की आवश्यकता होगी, तो पौधे मुरझाए दिखाई देंगे; ऐसे समय पर पानी दें । किसी भी परिस्थिति में पौधों को अति पानी देना टालें !’ – श्रीमती राघवी मयूरेश कोनेकर, ढवळी, फोंडा, गोवा. (३०.७.२०२२)
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
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