
‘नवंबर २०२१ में मेरी सहसाधिका दीपावली के निमित्त घर गई थी । उस समय हिन्दी पाक्षिक ‘सनातन प्रभात’ से संबंधित ‘नियोजन, संकलन, संरचना करने तथा पाक्षिक छपाई के लिए भेजने’ की सेवाएं करते समय मुझे हुई अनुभूतियां यहां प्रस्तुत हैं ।
१. सेवाएं अल्प समय में पूर्ण होना
अ. पहले मैं तथा मेरी सहसाधिका दोनों को मिलकर ‘हिन्दी पाक्षिक ‘सनातन प्रभात’ से संबंधित सेवाएं करने के लिए जितना समय लगता था, उसकी तुलना में अकेले होते हुए भी मुझे सेवाओं के सभी स्तर पूर्ण करने में अल्प समय लगा ।
आ. दीपावली की अवधि में साधक घर जाते हैं; उसके कारण आश्रम स्तर की सेवाएं भी बढी हुई थीं । अन्य सेवाएं एवं आश्रम सेवा कर भी हिन्दी पाक्षिक ‘सनातन प्रभात’ से संबंधित सेवाएं अल्प समय में पूर्ण हुईं ।
२. दीपावली की अवधि में सेवा करते समय मेरे ध्यान में आया कि ‘मेरे हाथों की उंगलियों में सुगंध आ रही है ।’
३. ‘सेवा करते समय परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी सूक्ष्म से मेरे साथ हैं तथा वे ही मुझसे यह सेवा करवा रहे हैं’, यह मेरे ध्यान में आया ।
४. उस समय ‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने मुझमें कर्तापन बढने नहीं दिया’, यह ध्यान में आकर मुझे उनके प्रति कृतज्ञता प्रतीत हुई । अब सहसाधिका की अनुपस्थिति में भी मुझसे हिन्दी पाक्षिक ‘सनातन प्रभात’ की सेवाएं तथा सेवा के स्थान की अन्य सेवाएं भी सुचारु रूप से जारी रहती हैं ।
५. मुझे सेवाओं के कारण तनाव नहीं आता । सेवा से सीखने की ओर, सेवाएं परिपूर्ण एवं समय रहते पूर्ण करने की ओर मुझे ध्यान देना संभव हो पाता है । इस प्रक्रिया से मैं सेवा में विद्यमान आनंद ले पाई ।
६. हिन्दी पाक्षिक ‘सनातन प्रभात’ से संबंधित सेवाएं करते समय ‘साधिका को कष्ट पहुंचाने के लिए अनिष्ट शक्तियां आई हैं तथा उसी समय प.पू. गुरुदेवजी के सूक्ष्म रूप से साथ होने से वस्त्रों को सुगंध आ रही है’, ऐसा प्रतीत होना ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिकों के माध्यम से समाज के उद्बोधन का कार्य होता है; उसके कारण इन सेवाओं में अनिष्ट शक्तियां बहुत बाधाएं उत्पन्न करती हैं । वर्ष २०२२ में वैकुंठ चतुर्दशी के एक दिन पूर्व प्रातः ३ बजे तक मैं हिन्दी पाक्षिक ‘सनातन प्रभात’ की संरचना कर रही थी ।
अ. उस समय मैं परात्पर गुरु डॉक्टरजी के आंतरिक सान्निध्य में थी । उस समय मुझे प्रतीत हुआ कि ‘मेरे चारों ओर सूक्ष्म रूप से २ अनिष्ट शक्तियां हैं, जिनमें से एक मेरे निकट खडी है तथा दूसरी थोडी दूर आसंदी (कुर्सी) पर बैठी है ।’
आ. मैं बडी सहजता से उसे अनदेखा कर नामजप कर रही थी । उस समय मेरी भावजागृति हो रही थी ।
इ. उस समय मेरे वस्त्रों को सुगंध आ रही थी; परंतु सेवा करते समय मुझे उसका कुछ विशेष भान नहीं था । सेवा पूर्ण कर जब मैं कक्ष में गई, उस समय मुझे ध्यान में आया कि ‘अनिष्ट शक्तियां मुझे कष्ट पहुंचाने के लिए आई थीं तथा उस समय प.पू. गुरुदेवजी सूक्ष्म रूप से मेरे साथ होने के कारण मेरे वस्त्रों को सुगंध आ रही है ।’
ई. प.पू. गुरुदेवजी ने अनिष्ट शक्तियों से मेरी रक्षा की । उसके कारण मैं निर्विघ्न रूप से सेवा कर पाई तथा सेवा से मुझे आनंद भी मिला । प्रतिक्षण अपने बालकों की रक्षा करनेवाले परात्पर गुरु डॉक्टरजी के चरणों में मैं कोटि-कोटि कृतज्ञता व्यक्त करती हूं ।’
– कु. वर्षा जबडे, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.
(१९.१२.२०२२)
आध्यात्मिक कष्टइसका अर्थ है व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन होना । मंद आध्यात्मिक कष्ट अर्थात व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन ३० प्रतिशत से अल्प होना । मध्यम आध्यात्मिक कष्ट अर्थात नकारात्मक स्पंदन ३० से ४९ प्रतिशत होना; और तीव्र आध्यात्मिक कष्ट अर्थात नकारात्मक स्पंदन ५० प्रतिशत या उससे अधिक मात्रा में होना । आध्यात्मिक कष्ट प्रारब्ध, पितृदोष आदि आध्यात्मिक स्तर के कारणों से होता है । किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक कष्ट को संत या सूक्ष्म स्पंदन समझनेवाले साधक पहचान सकते हैं । |
| इस अंक में प्रकाशित की गई अनुभूतियां ‘जहां भाव, वहां भगवान’, इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । सभी को ऐसी अनुभूतियां होंगी ही, ऐसा आवश्यक नहीं है । – संपादक |
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