धर्मनिरपेक्ष भारत में खडी हो रही धर्म पर आधारित अर्थव्यवस्था’ को ध्वस्त कीजिए !

हलाल मांस क्या होता है ?
पशु का मुंह मक्का की दिशा में कर उसके गले की नस काटने से बडी मात्रा में लहू बहता है और उसके उपरांत तडप-तडपकर उस पशु की मृत्यु होती है । इस पद्धति से मारे गए पशु का ‘हलाल मांस’ खाना मुसलमानों में अनिवार्य माना गया है । सामान्यरूप से हलाल मांस की दुकान में कसाई इस प्रकार से पशु को मारते हुए दिखाई नहीं देते; परंतु केवल कसाई मुसलमान होने से उस मांस को ‘हलाल’ प्रमाणित किया जाता है । इसके कारण यह व्यवसाय मुसलमानों के नियंत्रण में रहा है ।

१. हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन
अ. संख्या में देश के अधिकांश राज्य में मात्र १५ प्रतिशत मुसलमान समुदाय को इस्लाम के अनुसार वैध हलाल मांस खाना है; इसलिए उसे शेष ८० प्रतिशत जनता पर भी थोपा गया । तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा मुसलमानों के तुष्टीकरण की नीति के कारण उन्हें आर्थिक लाभ मिले; इसलिए निर्यात मांस की नियमावली में वह ‘हलाल’ होना चाहिए, यह नियम बनाया गया ।
आ. ‘रेलवे’, ‘एयर इंडिया’, ‘पर्यटन विभाग’ जैसे सरकारी प्रतिष्ठानों में मिलनेवाले पदार्थ भी ‘हलाल प्रमाणित’ किए गए । भारत के ‘मैकडोनाल्ड’, ‘पिज्जा हट’ आदि प्रतिष्ठानों में भी हलाल मांस के पदार्थ बेचना अनिवार्य किया गया । इस प्रकार बहुसंख्यक हिन्दू जनता की इच्छा न होते हुए भी विवश होकर हलाल मांस के पदार्थ खाने पडते हैं । यह हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन है, साथ ही एक प्रकार से इस्लामीकरण भी है !
२. खटक समुदाय के साथ अन्याय
हलाल मांस की बिक्री को प्रधानता दिए जाने से हिन्दू खटक समुदाय के साथ अन्याय हुआ; क्योंकि वे झटका पद्धति से (एक ही झटके में पशु की हत्या करने से उसे अल्प पीडा होती है ।) पशु की हत्या कर मांस बेचते हैं । कांग्रेस सरकार के हलाल मांस बेचने की नीति के कारण ही वार्षिक २३,६४६ करोड रुपए के मांस का निर्यात, साथ ही देश के ४०,००० करोड से भी अधिक रुपए के मांस का व्यापार मुसलमानों के नियंत्रण में जाने से पहले ही निर्धन और पिछडा हिन्दू खटक समाज ध्वस्त हो गया है ।
– श्री. सुनील घनवट, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ राज्य संगठक, हिन्दू जनजागृति समिति
हलाल मांस और अन्य उत्पादों का कोई संबंध न होते हुए भी अन्य वस्तुओं के लिए भी हलाल प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य करना !
संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को उसके धर्म के लिए अभिप्रेत सामग्री अथवा पदार्थाें पर बल (जोर) देने की धार्मिक स्वतंत्रता होती है । इस आधार पर मुसलमानों की ओर से प्रत्येक पदार्थ अथवा वस्तु इस्लाम के अनुसार अर्थात ‘हलाल’ होने की (इसका अर्थ उनके धर्म के अनुसार पवित्र) मांग की जाने लगी । उसके कारण अब अन्य उत्पाद भी हलाल हैं, यह ज्ञात होने के लिए, साथ ही इस्लामी देशों में अपने उत्पाद बेचने के लिए विभिन्न उत्पादों के प्रतिष्ठानों को ‘हलाल प्रमाणपत्र’ लेना अनिवार्य किया गया है । वास्तव में हलाल पद्धति से प्राप्त मांस और जिन वस्तुओं के लिए हलाल प्रमाणपत्र की मांग हो रही है, उनका कोई संबंध नहीं है । मुसलमान ग्राहकों के दूर जाने के भय से प्रतिष्ठनों ने भी ‘हलाल प्रमाणपत्र’ लेना आरंभ कर दिया है । यह प्रमाणपत्र लेने के लिए और प्रतिवर्ष उसका नवीनीकरण करने के लिए उसे देनेवाले संगठनों को पैसे देने पडते हैं । इस माध्यम से बहुत चतुराई के साथ धर्मनिरपेक्ष भारत और विश्व में यह इस्लामी अर्थव्यवस्था लागू की गई है ।
हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से जनजागरण और उसे प्राप्त प्रत्युत्तर !

हलाल प्रमाणपत्र लेने की यह पद्धति हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर कितना गंभीर परिणाम कर रही है और उससे मिलनेवाले पैसों का उपयोग आतंकियों की आर्थिक सहायता के लिए अर्थात हिन्दुओं को मारने के लिए किस प्रकार हो रहा है, इस विषय में हिन्दू जनजागृति समिति और अन्य समविचारी हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ता व्याख्यानों और प्रवचनों आदि माध्यमों से संपूर्ण देश में जनजागरण कर रहे हैं । विशेषरूप से उद्योगपतियों और व्यापारियों का भी उद्बोधन किया जा रहा है । इससे हिन्दू समाज और राष्ट्र को बचाना हो, तो हमें ‘हलाल प्रमाणपत्र’ का यह षड्यंत्र तोडना ही पडेगा ! – श्री. सुनील घनवट, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ राज्य संगठक, हिन्दू जनजागृति समिति
परिणाम ! : इस अभियान के कारण अनेक छोटे व्यापारियों ने हलाल प्रमाणपत्र प्राप्त उत्पाद बेचना बंद कर दिया है । कोल्हापुर, निपाणी, इचलकरंजी, देवगढ के व्यापारियों ने यह निर्णय लिया ।
हिन्दुओं के संघर्ष के कारण सरकार द्वारा हलाल मांस के निर्यात की अनिवार्यता हटाना कुल व्यापक संघर्ष की पहली सफलता !

हलाल प्रमाणपत्र की अनिवार्यता के विषय में बडा विवाद आरंभ हुआ । ‘हलाल प्रमाणपत्र किस प्रकार भारत की अर्थव्यवस्था पर संकट हो सकता है ?’, इस पर हिन्दू जनजागृति समिति द्वारा किया जा रहा उद्बोधन, ‘विश्व हिन्दू’ जैसे विभिन्न नियतकालिकों में छपे लेख, सामाजिक माध्यमों द्वारा आंदोलन तथा ‘सुदर्शन वाहिनी’ पर आयोजित ३ विचारगोष्ठियों आदि मंथन का अच्छा परिणाम हुआ । उसके कारण ४ जनवरी २०२१ को भारत सरकार के वाणिज्य तथा उद्योग मंत्रालय के अधीन कृषि एवं प्रक्रियायुक्त खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ने (अपेडा – APEDA) नियमावली में हलाल मांस उत्पादकों और निर्यातकों के लिए अनिवार्य ‘हलाल’ शब्द हटा दिया और देश के अनुसार प्रमाणपत्र लेने के नियम में सुधार किया । उदा. ४६ प्रतिशत (६ लाख टन) मांस का निर्यात होनेवाले गैरइस्लामी विएतनाम देश में हलाल मांस आवश्यक नहीं है ।
हलाल अर्थव्यवस्था का षड्यंत्र तोडने के उपाय कर इसके विरुद्ध लडाई में सम्मिलित हों !
१. हलाल अर्थव्यवस्था को बल न मिले; इसके लिए हलाल मांस खरीदना बंद करना चाहिए ।
२. हलाल प्रमाणपत्र की मुद्रा अंकित सभी वस्तुओं को खरीदना अस्वीकार कर हिन्दू भाईयों का व्यवसाय बढे, इस दृष्टि से प्रयास करने होंगे तथा आंदोलन खडा कर संगठित रूप से सरकार के पास परिवाद प्रविष्ट करना होगा ।
३. निजी मुसलमान संगठनों पर हलाल प्रमाणपत्र देने पर प्रतिबंध लगाने की तथा वह अधिकार सरकारी संस्था को प्रदान करने की मांग करनी होगी ।
४. अपने क्षेत्र के हिन्दुत्वनिष्ठ राजनेताओं को इस संकट की जानकारी देनी चाहिए ।
५. व्यापक जागृति के साथ सरकार से हलाल प्रमाणपत्र को सीमापार करने की मांग भी करनी चाहिए ।
– श्री. रमेश शिंदे, हिन्दू जनजागृति समिति (३१.११.२०२१)
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