यस्य स्मरणमात्रेण
जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै
विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
अर्थ : जिन्होंने संपूर्ण विश्व की रचना की है, जिनके स्मरण मात्र से मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है, ऐसे भक्तवत्सल श्रीविष्णु को मैं बार-बार नमस्कार करता हूं ।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये
शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि
नारायणि नमोऽस्तुते ।।
अर्थ : जो सर्व शुभ कार्यों में मांगल्यस्वरूप हैं, जो सबका कल्याण करनेवाले शिव समान हैं, जिन्हें त्र्यंबक, गौरी और नारायणी नामों से संबोधित किया जाता है, उसे (दुर्गादेवी) मैं नमस्कार करता हूं ।
श्रीमन्नारायण स्वरूप परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के दिव्य रथोत्सव में विविध पथकों के साधक-साधिकाओं ने श्रीविष्णु का गुणसंकीर्तन कर श्रीविष्णु तत्त्व का आवाहन किया । अत्यंत अलौकिक इस रथोत्सव में साधकों को भाव, भक्ति एवं चैतन्य की अनुभूति हुई ।
मंदिर के वार्षिक पालकी उत्सव के समय पूरे वर्ष मंदिर में निवास करनेवाले भगवान वर्ष में एक बार स्वयं भक्तों से मिलने जाते हैं । ठीक उसी प्रकार आश्रम से बाहर निकलते परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के दर्शन से मार्ग के दोनों ओर खडे साधक भाव-विभोर हो गए !
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