अल्प आयु में अत्यधिक प्रगल्भ विचारोंवाली फोंडा (गोवा) की ६६ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कु. श्रिया राजंदेकर (आयु १० वर्ष) !

‘सनातन के दैवी बालकों की अलौकिक गुणविशेषताएं’

‘दिसंबर २०२१ के पहले सप्ताह में हम गोवा से सांगली जा रहे थे । इस यात्रा में एक गांव से जाते समय हमें मार्ग के किनारे से पाठशाला में जानेवाले छोटे बालक दिखे । किसी के हाथ में फटी हुई थैली थी, तो किसी का गणवेश खराब, अस्वच्छ अथवा फटा हुआ था; किसी के पांव में सादी चप्पल थी, तो बहुत से बालकों के पांव में चप्पल भी नहीं थी । तब श्री. अनिरुद्ध (मेरे पति, आध्यात्मिक स्तर ६१ प्रतिशत) का श्रिया के साथ (मेरी बेटी से) आगे दिया संभाषण हुआ ।

कु. श्रिया राजंदेकर
श्री. अनिरुद्ध राजंदेकर, श्रीमती मानसी राजंदेकर

श्री. अनिरुद्ध : श्रिया, हम पर गुरुदेवजी की (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की) कितनी कृपा है ! भगवान ने हमें जीवन में ऐसे कष्ट नहीं दिए ।

कु. श्रिया : हां पिताजी, सच है । परम पूज्य की (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की) कृपा है; इसीलिए ऐसा है ।

श्री. अनिरुद्ध : श्रिया, इन बच्चों को देखकर आपको क्या लगता है ?

कु. श्रिया : पिताजी, मुझे इन बच्चों को देखकर कुछ भी नहीं लगता; क्योंकि वे अपना प्रारब्ध भोगकर समाप्त कर रहे हैं । हमें बुरा लगने का भी कोई लाभ नहीं है । हमें अपने नामजप एवं साधना की ओर ही ध्यान देना होगा । वही हमारा दायित्व है । वे बच्चे उनका प्रारब्ध भोग रहे हैं ।

श्री. अनिरुद्ध : इन बच्चों को साधना कौन बताएगा ? वे बच्चे साधना में प्रगति कैसे करेंगे ?

कु. श्रिया : उचित समय आने पर, भगवान ही उन्हें किसी-न किसी के माध्यम से साधना बताएंगे । ‘प्रत्येक को उनके कर्माें का फल और प्रारब्ध भोगकर कब प्रगति करनी है ?’, यह बात भगवान द्वारा निश्चित की गई है । हम उसमें कुछ नहीं कर सकते । हमें उनकी ओर साक्षीभाव से देखना होगा ।

श्रिया का यह उत्तर सुनकर हम निरुत्तर हो गए । केवल १० वर्ष की आयु में उसके विचारों में विद्यमान प्रगल्भता देखकर हमें कुछ क्षण के लिए अत्यधिक आश्चर्य लगा । सामान्यतः किसी के भी मन में इन गरीब बच्चों की ओर देखकर सहानुभूति के विचार आएंगे; परंतु श्रिया के संदर्भ में वैसा नहीं हुआ ।

उसी समय हमारे द्वारा प.पू. गुरुदेवजी के (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के) श्रीचरणों में कृतज्ञता भी व्यक्त हुई; क्योंकि श्रिया के ये विचार केवल प.पू. गुरुदेवजी की सीख और उनके साधना के संस्कार हैं । ‘उन्होंने श्रिया में साधना का बीज कितना अंदर तक बोया है और वे ही उसे किस प्रकार संस्कारित कर रह हैं !’, इस प्रसंग से हमें इसका भान हुआ । इतना परिपूर्ण एवं सुस्पष्ट आध्यात्मिक दृष्टिकोण केवल प.पू. गुरुदेव ही सिखा सकते हैं । उसे प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक गुण भी वे ही उत्पन्न कर सकते हैं ।

हमें इस प्रसंग में एक ही अनुभव हुआ, ‘धन्य-धन्य वे प.पू. गुरुदेव और धन्य उनकी सीख !’ हम श्री गुरुचरणों में अखंड कृतज्ञ हैं !’

– श्रीमती मानसी अनिरुद्ध राजंदेकर (मां, आध्यात्मिक स्तर ६२ प्रतिशत), फोंडा, गोवा. (३०.१२.२०२१)

दैवी बालकों के संदर्भ में अभिभावकों का कर्तव्य !

‘कुछ अभिभावक ‘सगे-संबंधी क्या कहेंगे ?’, इस विचार से अपने बच्चों को साधना करने का विरोध करते हैं; परंतु वे इस पर ध्यान नहीं देते कि ‘ये सगे-संबंधी केवल इसी जन्म में हैं । अभिभावकों को इसका प्रथम विचार करना चाहिए कि ‘जिनके साथ प्रत्येक जन्म का नाता है, ऐसे भगवान को क्या अपेक्षित है ?’ और बच्चों को साधना करने के लिए हर संभव सहायता करनी चाहिए । वह उनकी साधना ही होगी ।’

– (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले (१६.११.२०२१)