
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) – वर्तमान में पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण कर सर्वत्र १ जनवरी को नया वर्ष मनाया जाता है । देखा जाए तो, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही हिन्दुओं का नववर्ष है । ब्रह्मदेव ने इसी दिन ब्रह्मांड की निर्मिति की थी । इसी दिन से सत्ययुग का प्रारंभ हुआ, तथा इसी दिन से हिन्दू संस्कृति की कालगणना का आरंभ हुआ । चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्षारंभ करने अर्थात गुडी पडवा मनाने के प्राकृतिक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक कारण हैं, ऐसा मार्गदर्शन समिति के पू. नीलेश सिंगबाळजी ने एक ‘ऑनलाइन’ प्रवचन में किया ।
प्रवचन के अंत में पू. सिंगबाळजी ने उपस्थित लोगों का आवाहन किया कि ‘पश्चिमी पद्धति समान नववर्ष मनाने से संभाव्य हानि के संदर्भ में विविध माध्यमों द्वारा जानकारी बताकर समाज को जागृत करना है ।’
देहली – यहां के साधक श्री. चंद्रप्रकाश ठाकुर एवं श्रीमती सुधा ने हिंदू नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाने के अध्यात्मशास के बारे में उपस्थित जिज्ञासुओं को जानकारी दी । इसका लाभ अनेक साधक व जिज्ञासुओं ने लिया ।
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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