
‘चैत्र शुक्ल ९ को ‘श्रीराम नवमी’ कहते हैं । श्रीराम के जन्म प्रीत्यर्थ श्रीराम नवमी मनाई जाती है । इस दिन जब पुष्य नक्षत्र पर, मध्यान्ह के समय, कर्क लग्न में सूर्यादि पांच ग्रह थे; तब अयोध्या में प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ । अनेक राममंदिरों में चैत्र शुक्ल १ से लेकर नौ दिन तक यह उत्सव चलता है । रामायण के पारायण, कथाकीर्तन तथा श्रीराममूर्ति का विविध शृंगार कर यह उत्सव मनाया जाता है ।
रामायण के कुछ प्रसंगों का भावार्थ
- भरत का राम की चरणपादुका मांगना : ‘पादुका मांगना’ अर्थात अपना मस्तक चरणों में रखना अर्थात ‘संपूर्ण शरणागति’ । भरत द्वारा याचना पर राम ने अपनी चरणपादुका दे दी । पादुका के अंगूठे का हिस्सा आगे की ओर कर, उसे अपने सिर पर रख भरत ने सिंहासन पर पादुका की स्थापना की एवं उसे पूजना आरंभ किया । तब से पादुका पूजन की प्रथा आरंभ हुई ।
- रावणवध : रावण महान शिवभक्त था । उसकी प्रगति सहस्रारचक्र तक आकर अटक गई थी । राम ने रावण का वध नहीं किया, अपितु उसके सहस्रार को भेदकर उसे सद्गति प्रदान की । (संदर्भ : सनातन का लघुग्रंथ ‘श्रीराम’ [अध्यात्मशास्त्रीय ज्ञान])
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?