लोकतंत्र या भ्रष्टतंत्र ?
भाग ४.
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४. लोकतंत्र में ‘भ्रष्टाचार’ सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली ही बन गई है !

प्रत्येक राजकीय पक्ष चुनाव के काल में ‘हमें चुनाव में विजयी बनाएं, हम ही राज्य को भ्रष्टाचारमुक्त सरकार देंगे’, ऐसा प्रचार करता है; परंतु प्रत्यक्ष में वे मतदारों को मद्य (दारू), पैसे आदि प्रलोभन दिखाकर अपने पक्ष में मतदान दिलवाते हैं । वर्ष २०१८ में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, तेलंगाना एवं मिजोरम, इन ५ राज्यों के चुनावों के समय राजकीय कार्यकर्ताओं से १६१ करोड रुपये जितनी प्रचंड धनराशि चुनाव आयोग के पथक ने जप्त की । आगे वह धनराशि लेकर जानेवाले किसी भी राजकीय नेता पर, कार्यकर्ता पर भ्रष्टाचार के अंतर्गत अपराध प्रविष्ट हुआ हो अथवा उसे बंदी बनाया गया हो, यह सुनने में नहीं आता । चुनाव अधिकारियों के कहे अनुसार यह राशि आयकर विभाग के पास जमा कर दी जाती है; परंतु ‘स्वच्छ एवं पारदर्शक वातावरण में’ चुनाव संपन्न होने से उस पर आगे कोई कार्यवाही नहीं होती । जिस अर्थ में राजकीय नेता चुनावों में करोडों रुपए खर्च करते हैं, उसी अनुरूप वे सत्ता में आनेपर जैसे भी संभव हो, उस पद्धति से भ्रष्टाचार कर, अधिकाधिक पैसे पाने का प्रयत्न करनेवाले ही हैं ! लोकतंत्र में ये भ्रष्ट चुनाव एवं नेताओं के कारण आज भारत में भ्रष्टाचार की जडें इतनी गहराई तक फैली हुई हैं कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ऐसा विधान किया था कि ‘भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार हो गया है’; परंतु आज उससे भी आगे जाकर भ्रष्टाचार शासकीय कार्यालयों की मानो कार्यप्रणाली ही बन गई है । ऐसा चित्र दिखाई देता है । शासकीय कार्यालयों में पैसे दिए बिना काम ही नहीं होता’, यह अनुभव आज भी करोडों भारतीय जनता नित्य ले रही है । यह जनता पर घोर अन्याय है । स्वतंत्रता के ७४ वर्षों उपरांत भी एक भी राजकीय पक्ष देश से भ्रष्टाचार का समूल उच्चाटन करने में असफल रहा है, इससे अधिक लज्जाजनक बात और क्या होगी ? लोकतंत्र व्यवस्था में एक भी सरकारी विभाग भ्रष्टाचारमुक्त नहीं । यहां तक कि न्यायक्षेत्र भी उसका अपवाद नहीं । यह चित्र को कहीं तो बदलने की आवश्यकता है ।’
(क्रमश:)
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