पू. तनुजा ठाकुरजी के मौलिक विचार

‘पाप की तीव्रता नष्ट करने के लिए अथवा उसे न्यून करने के लिए कानून के अनुसार दंड दिया जाता है । शासनकर्ता, नेता अथवा प्रशासक सार्वजनिक अथवा राष्ट्र के लिए कार्य करते हुए स्वयं से हुई चूकें न स्वीकारें, तब भी उन्हें न्यायालय से दंड दिया जाता है । यह दंड भोगने के कारण उनसे हुए पाप कृत्यों के फल अल्प होते हैं एवं उन्हें अपने पापों का परिणाम तुलना में अल्प मात्रा में भोगना पडता है । धर्मशिक्षा के अभाव में आज के नेताओं को यह तत्त्व ज्ञात नहीं; इसीलिए कारावास में जाने पर वे स्वयं के रोग का कारण बताकर चिकित्सालय में भर्ती होते हैं । ऐसे बहिर्मुख नेताओं को न यहां के कानून का डर है, (अन्यथा उन्होंने भ्रष्टाचार किया ही नहीं होता), न वे भगवान के कानून से डरते हैं । पहले के काल में राजा ने कोई भी पाप किया हो और वह किसी ने देखा न हो, तब भी वह राजा अपने राज्य का दायित्व छोडकर प्रायश्चित्त लेने के लिए जंगल में जाते थे; परंतु आज के शासनकर्त्ता स्वयं का अपराध प्रमाण (सबूत) सहित सिद्ध होने पर भी स्वयं का पाप नहीं स्वीकारते । यही अंतर पहले के सात्त्विक राजा और आज के तामसिक शासनकर्ताओं में है । हिन्दू राष्ट्र में ऐसे बहिर्मुख और तमोगुणी शासनकर्ता नहीं होंगे !’
– पू. तनुजा ठाकूरजी, संस्थापक, वैदिक उपासनापीठ (२१.११.२०२१)
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यदि केंद्रीय कानून के अनुसार दिया गया दंड पहले ही पूरा हो चुका है, तो समय पूर्व स्वतंत्रता क्यों नहीं दी जानी चाहिए ? – Madras High Court
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भारत में कानून की धार में तीक्ष्णता नहीं रही ; जब तक हाथ-पैर तोडे नहीं जाएंगे तब तक लोग कानून का पालन नहीं करेंगे !– Karnataka High Court