
‘पहले के युगों में साधना के रूप में नामस्मरण किया जाता था । उस काल में लोग सात्त्विक होने के कारण उन्हें नामजप करना संभव था । वर्तमान कलियुग में अधिकांश लोग रज-तम प्रधान होने के कारण उनमें स्वभावदोष और अहं की तीव्रता अधिक है । इसलिए नामजप करना उन्हें कठिन होता है । प्रथम स्वभावदोष निर्मूलन करने से साधना का आधार निर्माण होता है, जिससे नामजप करना संभव होता है ।’
– (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले (२.९.२०२१)
सात्त्विकता एवं संगठन ही राष्ट्र के उत्कर्ष की चाबी – जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी
(और इनकी सुनिए…) ‘कुंकुम इस्लामी देशों से आता है, तो क्या फिर हिन्दु तिलक लगाना बंद कर देंगे ?’ – Priyank Kharge
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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संपादकीय : नागरिक शास्त्र केवल पुस्तक में ?