
लाल बहादुर शास्त्री ९ जून १९६४ को प्रधानमंत्री पद पर चुने गए । एक प्रधानमंत्री को शासन की ओर से जो सुविधा (घर, गाडी आदि) मिलती है, वह उन्हें भी मिला; परंतु उन्होंने उसे नम्रता से नकारा । कोई सुविधाएं नहीं ली ।
एक बार शास्त्रीजी १५ अगस्त को लाल किले पर भाषण दे रहे थे, तब अचानक वर्षा आई । यह देखकर शास्त्रीजी के २ सेवक छाता लेकर भागे । तब उन्होंने उन्हें यह कहकर नकारा कि ‘मेरी जनता वर्षा में खडी रहकर भाषण सुन रही है, तो मैं कैसे छाता लेकर भाषण दूं ?’ उनकी इसी सादगी के कारण जनता से भी उन्हें अत्यंत प्रेम और सम्मान मिला ।
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