
नई दिल्ली – समाचार जालस्थल (न्यूज वेबसाइट्स) केवल शक्तिशाली लोगों की आवाज सुनते हैं एवं न्यायाधीश अथवा न्यायप्रणाली के विरुद्ध कुछ भी लिखते हैं । कोरोना काल में तबलीगी जमात के संबंध में प्रसार माध्यमों द्वारा दिखाए गए समाचारों का स्वरूप धर्म-द्वेषी था एवं इससे देश की छवि मलिन हो सकती थी, ऐसा मत सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्त किया । न्यायालय ने यह टिप्पणी गत वर्ष दिल्ली में कोरोना की प्रथम लहर में, तबलीगी जमात के शिविर से संबंधित प्रसार माध्यमों द्वारा दिखाए गए समाचारों के संदर्भ में प्रकरण की सुनवाई के समय की । सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा, ‘क्या समाचार जालस्थल (न्यूज वेबसाइट्स) एवं समाचार वाहिनियों के लिए कोई नियामक नियंत्रण तंत्र है ? याचिका में, जमीयत उलेमा-ए-हिन्द, पीस पार्टी एवं अन्य संगठनों ने आरोप लगाया है कि, ‘प्रसार माध्यमों ने तबलीगी शिविर का प्रसारण एकपक्षीय किया एवं मुसलमान समुदाय का गलत वर्णन किया ।’
१. केंद्र सरकार की ओर से उत्तर देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, कि प्रसार माध्यम जानबूझकर धर्मद्वेषी समाचार देते हैं । समाचार जालस्थलों पर नियंत्रण न होने के कारण, वे ‘नकली समाचार’ भी प्रसारित करते हैं । (यदि सरकार को यह पता है, तो सरकार ने अभी तक उन्हें नियंत्रित क्यों नहीं किया ? उन पर अंकुश क्यों नहीं लगाया ? – संपादक)
२. न्यायालय ने कहा कि, समाचार जालस्थल एवं यू ट्यूब वाहिनी (चैनल) के नकली समाचारों पर कोई नियंत्रण नहीं है । यदि आप यू ट्यूब देखेंगे, तो आप समझ जाएंगे कि बिना किसी भय के कैसे असत्य समाचार फैलाए जाते हैं । आजकल यू ट्यूब पर कोई भी अपना चैनल आरंभ कर रहा है । (जो बात न्यायालय जानता है, वह सरकार एवं प्रशासन, जिसके हाथ में संपूर्ण तंत्र है, कैसे नहीं जान सकता या वो आंखें मूंदकर उसकी अनदेखी कर रहे हैं ? – संपादक)
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