रोगी के प्राणों क लिए संकटकारी डॉक्टरों की लापरवाही !

प्रतीकात्मकचित्र

१. दाहिना पैर काटने के स्थान पर बायां पैर काटने के प्रकरण में डॉक्टर को आर्थिक दंड

‘नई देहली के फोर्टीस हॉस्पिटल के एक अस्थिरोग विशेषज्ञ ने शल्यकर्म करते समय एक रोगी का दाहिना पैर काटने के स्थान पर बायां पैर काटा। उसके कारण वर्ष २०१६ में पीडित रोगी ने हानिभरपाई मिलने हेतु राष्ट्रीय ग्राहक मंच में याचिका की। शल्यकर्म करने से पूर्व रवी राय (आयु २४ वर्ष) ने उसके विभिन्न प्रकार के क्ष-किरण ब्योरे (एक्स रे) निकाले थे। शल्यकर्म के लिए ले जाते समय भी उसकी धारिका पर रोगी के दाहिने पैर का शल्यकर्म करना है, ऐसा उल्लेखित था; परंतु वास्तव में डॉ. काकरन ने शल्यकर्म के समय दाहिने पैर के स्थान पर बायां पैर काटा। अपनी चूक ध्यान में आते ही यह अस्थिरोग विशेषज्ञ चिकित्सालय से भाग गया। उसके कारण रोगी को अन्य चिकित्सालय में उपचार कराने पडे।

(पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णीजी

२. डॉक्टर तथा चिकित्सालय को सुनाया गया १ करोड १० लाख रुपए का आर्थिक दंड निरस्त करने की मांग सर्वाेच्च न्यायालय ने की अस्वीकार

उसके कारण वर्ष २०१६ में रवि राय ने डॉक्टर तथा चिकित्सालय से हानिभरपाई मिलने हेतु याचिका प्रविष्ट की। रोगी के अनुसार उसका दाहिना पैर क्षतिग्रस्त था तथा उसे काट देना सुनिश्चित किया गया था; परंतु ऐसा होते हुए भी डॉक्टर ने उसका बायां पैर काटा। इस प्रकरण में रोगी ने ग्राहक मंच के माध्यम से हानिभरपाई की मांग की। उसके अनुसार ग्राहक मंच ने रोगी को १ करोड १० लाख रुपए हानिभरपाई देने का आदेश दिया। यह प्रकरण सर्वाेच्च न्यायालय पहुंचा। सर्वाेच्च न्यायालय ने डॉक्टर तथा फोर्टीस हॉस्पिटल को सुनाए गए आर्थिक दंड का आदेश निरस्त करना अस्वीकार कर उनकी याचिका भी खारिज की।

३. रोगी को पूरे जीवन तक दृष्टिहीन बनानेवाले डॉक्टरों की लापरवाही

तेलंगाना में एक रोगी की आंख में कैंसर हुआ था, उसके कारण उस आंख को निकालने का निर्णय लिया गया। उसके लिए उसे चिकित्सालय में भर्ती किया गया। वहां शल्यकर्म करनेवाले डॉक्टर ने क्षतिग्रस्त आंख निकालने के स्थान पर स्वस्थ आंख निकाल दी। उसके कारण रोगी को अन्य चिकित्सालय जाकर शल्यकर्म कर कैंसर से ग्रस्त आंख निकाल लेनी पडी। इसके परिणामस्वरूप रोगी दृष्टिहीन हो गया। उसकी दृष्टिहीनता के लिए एक डॉक्टर की लापरवाही कारण बनी।

४. डॉक्टर का विस्मरण महिला के प्राणों के लिए बना संकट !

डॉक्टर एक महिला का प्रसव का शल्यकर्म करते समय उसके पेट में कैंची भूल गए। कुछ महिने उपरांत उस महिला को उससे कष्ट होने लगा। अतः पुनः एक बार उसके पेट का शल्यकर्म कर कैंची निकालनी पडी। अन्य एक प्रकरण में एक महिला के प्रसव का शल्यकर्म करते समय उपयोग की गई कतरी उसके पेट में ही रह गई तथा उसके कारण उसे जान से हाथ धोना पडा।

५. कर्नाटक में प्रसव के लिए चिकित्सालय में भर्ती ५ महिलाओं की मृत्यु

कर्नाटक में चिकित्सालय में प्रसव के लिए भर्ती ५ महिलाओं की मृत्यु हुई। इस प्रकरण में राज्य के मुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्यमंत्री ने समिति का गठन कर जांच का आश्वासन दिया। जांच के उपरांत कदाचित दोषी लोगों को दंड मिलेगा भी; परंतु डॉक्टरों की लापरवाही के कारण क्या उन महिलाओं के प्राण वापस आएंगे ?, यह प्रश्न है।

६. स्वास्थ्यसेवा का व्यापार

कभी किसी काल में डॉक्टरों के व्यवसाय को ‘नोबेल व्यवसाय’ कहा जाता था; परंतु विगत कुछ दशकों से डॉक्टरों ने तथा चिकित्सालयों ने स्वास्थ्यसेवा का व्यापार आरंभ किया है। अनेक बार रोगी को चिकित्सालय में भर्ती करने के उपरांत उससे प्राणवायु, वेंटिलेटर, अतिदक्षता विभाग इत्यादि के नाम से लाखों रुपए का बिल वसूला जाता है। रोगी के प्राण बचे अथवा चले गए, तब भी रोगी के परिजनों को लाखों रुपए का बिल भरना पडता है। अनेक कष्ट सहन कर बहुत अल्प रोगी ग्राहक मंच, न्यायालय अथवा पुलिस थाने जाते हैं; परंतु वहां का उनका अनुभव भी पहले अनुभव से अलग नहीं होता। जनता की दृष्टि से पुलिस थाना, न्यायालय तथा चिकित्सालय से संबंधित सभी अनुभव बुरे होते हैं।’

श्रीकृष्णार्पणमस्तु।

– (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी, मुंबई उच्च न्यायालय (७.१२.२०२४)