निष्काम भावना से धर्माचरण करना, इसी को कर्मयोग कहते हैं । अपने धर्म में सकाम भक्ति की अपेक्षा ही नहीं; परंतु कालप्रवाह में मानव की धर्म के विषय की मूल धारणा नष्ट होने से उसके धर्माचरण में दिनोदिन कमी आती गई । फिर वहीं व्रतों की निर्मिति हुई । व्रत अर्थात भगवान की पूजा का एक प्रकार ! इससे भगवान प्रसन्न होते हैं । ‘प्राणिमात्र के अंतःकरण का मल, विक्षेप एवं आवरण, ये तीन दोष शास्त्रानुसार नित्यनैमित्तिक व्रतों के कर्माचरण करने से नष्ट होते हैं, ऐसा धर्मशास्त्र में बताया है ।
भाद्रपद शुक्ल तृतीया से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी की अवधि में हरितालिका, ऋषिपंचमी एवं ज्येष्ठा गौरी व्रत आते हैं । इन व्रतों को नैमित्तिक व्रत कहते हैं । नैमित्तिक व्रत निर्धारित तिथि को ही आते हैं । चतुर्थी के उपरांत आनेवाले कुछ व्रतों का उद्देश्य एवं व्रत करने की पद्धति नीचे दी गई है । अत: दिए अनुसार आचरण कर श्री गणेश की कृपा संपादन करें !
हरितालिका तीज
१. तिथि : भाद्रपद शुक्ल तृतीया (९.९.२०२१)
२. इतिहास एवं उद्देश्य : पार्वती ने यह व्रत रखकर शिव को प्राप्त किया था । इसलिए इच्छानुसार वर मिलने के लिए, उसी प्रकार अखंड सौभाग्य प्राप्त करने के लिए स्त्रियां यह व्रत रखती हैं ।
३. व्रत करने की पद्धति : प्रातःकाल मंगलस्नान कर पार्वती एवं उसकी सखी की मूर्ति लाकर शिवलिंग (मूर्ति) सहित उनकी पूजा की जाती है । रात को जागरण करते हैं और अगले दिन उत्तरपूजा (समापन पूजा) कर लिंग या मूर्ति विसर्जित करते हैं ।
श्री गणेश चतुर्थी
१. तिथि : ‘भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी अर्थात श्री गणेश चतुर्थी के दिन रखे जानेवाले व्रत को ‘सिद्धिविनायक व्रत’ के नाम से जाना जाता है । (१०.९.२०२१)
२. परिवार के किस सदस्य को यह व्रत रखना चाहिए ? : सभी परिवारों में यह व्रत होना आवश्यक है । सभी भाई यदि एक साथ रहते हों, अर्थात सभीका एकत्रित द्रव्यकोष (खजाना) एवं चूल्हा हो, तो मिलकर एक ही मूर्ति का पूजन करना उचित है । यदि सबके द्रव्यकोष और चूल्हे किसी कारणवश भिन्न-भिन्न हों, तो उन्हें अपने-अपने घरों में स्वतंत्र रूप से गणेशव्रत रखना चाहिए ।’ (श्री गणेश चतुर्थी, तथा श्री गणेशोत्सव के विषय में विस्तृत विवेचन सनातन के ‘श्री गणपति’ ग्रंथ में किया है ।)
ऋषिपंचमी

१. तिथि : भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन स्त्रियां यह व्रत रखती हैं । (११.९.२०२१)
२. ऋषि : कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि व वसिष्ठ ।
३. उद्देश्य : अ. ‘जिन ऋषियों ने अपने तपोबल से विश्व-मानव पर अनंत उपकार किए हैं, मनुष्य के जीवन को योग्य दिशा दी है, उन ऋषियों का इस दिन स्मरण किया जाता है ।’ – (परात्पर गुरु) परशराम पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.
आ. मासिक धर्म, अशौच एवं स्पर्शास्पर्श के कारण स्त्रियों पर होनेवाला परिणाम इस व्रत से तथा गोकुलाष्टमी के उपवास से भी घटता है । (पुरुषों पर होनेवाला परिणाम क्षौरादि प्रायश्चित कर्म से शुद्धिकर्म एवं वास्तु पर होनेवाले परिणामों का उदकशांति से शुद्धिकर्म होता है ।
४. व्रत करने की पद्धति : अ. इस दिन सवेरे अपामार्ग की लकडी से (एक प्रकार की वनस्पति) दांत घिसें ।
आ. स्नान के उपरांत पूजा से पूर्व ‘माहवारी के दौरान जाने-अनजाने में हुए स्पर्श के कारण जो दोष लगता है, उसके निराकरण हेतु अरुंधति (वसिष्ठ ऋषि की पत्नी) सहित सप्तर्षियों को प्रसन्न करने हेतु मैं यह व्रत कर रही हूं’, ऐसा संकल्प करें ।
इ. पीढे पर चावल की आठ डेरियां बनाकर उसपर कश्यपादि सात ऋषि एवं एक अरुंधति का आवाहन एवं षोडशोपचार पूजन करें ।
ई. कहा गया है, इस दिन कंदमूल का आहार करें और बैलों के श्रम का कुछ भी न खाएं ।
उ. अगले दिन कश्यपादि सात ऋषि एवं अरुंधति का विसर्जन करें ।
बारह वर्ष उपरांत अथवा पचास वर्ष की उम्र हो जाने पर इस व्रत का उद्यापन करने में कोई अडचन नहीं । उद्यापन के उपरांत भी यह व्रत जारी रख सकते हैं ।
ज्येष्ठा गौरी
१. तिथि : ‘भाद्रपद शुक्ल अष्टमी (१३.९.२०२१)
२. इतिहास एवं उद्देश्य : असुरों द्वारा पीडित सभी स्त्रियां श्री महालक्ष्मी गौरी की शरण में गईं एवं उन्होंने अपने अक्षुण्ण सौभाग्य हेतु प्रार्थना की । श्री महालक्ष्मी गौरी ने भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को असुरों का संहार कर शरण आई हुईं स्त्रियों के पतियों को तथा पृथ्वी के प्राणियों को सुखी किया; इसलिए अखंड सौभाग्य प्राप्त होने हेतु स्त्रियां ज्येष्ठा गौरी का व्रत करती हैं ।
३. व्रत रखने की पद्धति
अ. यह व्रत तीन दिन तक होता है । प्रांतों के अनुसार यह व्रत मनाने की विविध पद्धतियां हैं । इसमें धातु की, मिट्टी की प्रतिमा बनाकर अथवा कागज पर श्री लक्ष्मी का चित्र बनाकर, तो कुछ स्थानों पर नदी तट के पांच छोटे पत्थर लाकर उनका गौरी के रूपमें पूजन किया जाता है ।
महाराष्ट्र में अधिकांश स्थानों पर पांच छोटी मटकियों को उत्तरोतर रचाकर उनपर गौरी का मिट्टी का मुखौटा रखते हैं । कुछ स्थानों पर सुगंधित पुष्पवाली वनस्पतियों के पौधे अथवा गुलमेंहदी के पौधे एकत्र बांधकर उनकी प्रतिमा बनाते हैं तथा उनपर मिट्टी का मुखौटा चढाते हैं । उस मूर्ति को साडी पहनाकर अलंकारों से सजाया जाता है ।
आ. गौरी की स्थापना होने के उपरांत दूसरे दिन उनकी पूजा कर भोग लगाते हैं ।
इ. तीसरे दिन गौरी का नदी में विसर्जन किया जाता है तथा घर लौटते समय नदी की थोडी बालू अथवा मिट्टी लाकर वह संपूर्ण घर में छिडक देते हैं ।’
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
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