
१. वर्ष १८३९ तक भारत में ६.७५ लाख गुरुकुल एवं ९१ प्रतिशत साक्षरता दर !
‘वर्ष १८३९ से पूर्व भारतीय शिक्षाव्यवस्था उन्नत थी । केवल तमिलनाडु में ही १ लाख से अधिक गुरुकुल कार्यरत थे तथा पूरे भारतवर्ष में ६.७५ लाख गुरुकुल चलाए जाते थे । प्रत्येक गांव में एक बडा गुरुकुल था । वर्ष १८३९ में अंग्रेजों ने मूल संस्कृत विद्यालय एवं गुरुकुल बंद किए । उसके उपरांत ऐसी किसी भी प्रकार की व्यवस्था चलानेवाले को दंड देने की घोषणा की । वर्ष १८४९ में उन्होंने जनगणना की, उसमें ९१ प्रतिशत भारतीय लोग शिक्षित थे । बीच के १० वर्षाें में जन्मे बच्चों को शिक्षा ही नहीं मिल सकी; क्योंकि शिक्षा प्राप्त करने हेतु उनके लिए एक भी विद्यालय उपलब्ध नहीं था । इसलिए उन्हें छोडकर अन्य सभी शिक्षित थे । इससे जिन्हें ऐसा लगता है कि भारतीयों ने गरीबों एवं स्त्रियों को शिक्षा नहीं दी अथवा विशिष्ट वर्ग को ही शिक्षा दी, तो यह गलत है, यह यहां ध्यान में आता है । स्वतंत्रतापूर्व भारत में भारतीय अशिक्षित थे, यह जानकारी अंग्रेजों ने ही फैलाई थी तथा उनका ब्योरा भी झूठा था ।
श्री. जगदीश चौधरी का परिचय

श्री. जगदीश चौधरी ‘बालाजी ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन्स’ के निर्देशक हैं । वे ‘ग्रीन इंडिया फाउंडेशन’ के अध्यक्ष हैं । ‘वर्ल्ड वॉटर काउन्सिल फ्रांस-एशिया वेगन सोसाइटी, काठमांडू’ के वे सदस्य हैं । पर्यावरण रक्षा एवं जलसंवर्धन के क्षेत्र में वे पिछले २० वर्ष से अधिक समय से कार्यरत हैं । उन्होंने शिक्षाक्षेत्र में अनेक पुस्तकें लिखी हैं । वे उनके सभी शिक्षा संस्थानों में छात्रों के लिए ‘राष्ट्र एवं धर्म’ से संबंधित कार्यक्रमों का नियमित रूप से आयोजन करते हैं ।
२. भारत में पाश्चात्य विचारधारावाले विश्वविद्यालयों की स्थापना
वर्ष १८३५ में ब्रिटिश संसद में लॉर्ड मैकाले ने कहा था, ‘मैंने पूरे भारत में उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक यात्रा की । मुझे वहां एक भी गरीब, निर्धन अथवा चोर व्यक्ति दिखाई नहीं किया । ऐसे लोगों से हम जीत नहीं सकते तथा न ही उन पर राज कर सकते हैं । जब तक हम उनकी आध्यात्मिक शक्ति एवं सांस्कृतिक व्यवस्था को नष्ट नहीं कर देते, तब तक हम भारत पर राज नहीं कर पाएंगे । उन्हें उनकी सांस्कृतिक व्यवस्था को तुच्छ दिखाने के लिए हमें विशेष प्रयास करने होंगे । विशेष रूप से उनकी आध्यात्मिक शक्ति को तोडनेका मार्ग हमारी शिक्षाप्रणाली से होकर जाना चाहिए ।’ उसके उपरांत मूल भारतीय शिक्षा केंद्रों को ही नष्ट कर ईसाई प्रचारकों के विद्यालय खोले गए । वर्ष १८५८ से वर्ष १८६० की अवधि में कोलकाता, मुंबई, प्रयागराज, चेन्नई जैसे विभिन्न स्थानों पर विश्वविद्यालय आरंभ किए गए तथा उनसे भारतीयों की २-३ पीढियों ने शिक्षा ली, जिन पर अंग्रेजों की पाश्चात्य विचारधारा का प्रभाव था ।
जम्मू-कश्मीर में वर्ष १९९२ के उपरांत जन्मे बच्चों की आयु अब लगभग ३३-३४ वर्ष है । उनमें भारत के प्रति किसी प्रकार का भाव दिखाई नहीं देता । उनसे आयु में बडे लोगों को भारत के विषय में सच्ची जानकारी है तथा वे मन से भारत के साथ जुडे हुए हैं । इन नए बच्चों ने बचपन से ही गोलीबारी एवं आतंकवाद देखा है । इसलिए कदाचित उन्हें ऐसा लगता होगा कि भारत के सैनिक उनके विरोध में कार्य कर रहे हैं तथा वह उनकी स्वतंत्रता के विरुद्ध है ।
३. स्वतंत्र भारत की शिक्षाप्रणाली में मूल भारतीय दर्शन का अभाव
वर्ष १९४७ में भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात मौलाना अबुल कलाम आजाद भारत के पहले शिक्षामंत्री बने । भारत के शिक्षा सलाहकार समूह में भी अनेक मुसलमान सदस्यों का समावेश था । इसलिए जब हम भारत का इतिहास पढते हैं, तो उसमें हमें यही सिखाया जाता है कि बाहर के लोगों ने कैसे भारतीय लोगों पर आक्रमण किया तथा उन्होंने कैसे राज चलाया ? उसमें भारत का सच्चा दर्शन ही नहीं होता । इसके अतिरिक्त वर्तमान इतिहास की पुस्तकों में भारत का सच्चा इतिहास नहीं मिलेगा । भारत के सहस्रों लोगों ने अंग्रेजी भाषा में साहित्य लिखा है, जिनका साहित्य विद्यालयों में सिखाया नहीं जाता । भारत के लोग नए सिरे से भारतीय के रूप में खडे न होकर, वे अंग्रेजों के गुलाम के रूप में खडे रहें; इसके लिए अंग्रेजों ने जानबूझकर उस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था बनाई । किसी भी भारतीय को शिक्षा लेने के उपरांत नौकरी करनी होती है । वास्तव में नौकरी गुलामी का प्रतीक है । भारतीय शिक्षा मुक्ति देती है, जबकि पाश्चात्य शिक्षा गुलामी देती है ।
४. मनुष्य के जीवन को सार्थक बनानेवाली शिक्षाव्यवस्था चाहिए !
उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत भी उस व्यक्ति में संपत्ति की लालसा होती है तथा इसलिए वह निरंतर असंतुष्ट रहता है । स्वयं अशांत व्यक्ति अन्यों को शांति नहीं दे सकता । इसलिए वर्तमान शिक्षा मनुष्य को न मोक्ष देती है, न शांति । जो शिक्षा मनुष्य के जीवन को सार्थक नहीं बना सकती, उसे शिक्षित नहीं कहा जा सकता । अंग्रेजों ने भारतीयों की रीढ की हड्डी तोडकर उसमें एक नकली लोहा भरा तथा ऊपर से उसे दिखावटी पॉलिश किया । भारत की शैक्षिक नीतियां केवल ‘दिखावटी पॉलिश’ का काम करती हैं । वह भारतीयों में विद्यमान गुलामी के रोग को जड से उखाडतीं नहीं । देश में ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां मनुष्य स्वयं ही तैयार होगा तथा उसकी क्षमताओं के साथ उसका काम अमूल्य होगा । भारत की मिट्टी, पानी एवं हवा के कारण हमें चाहे कितना भी दबाने का प्रयास किया गया, तब भी हम हिन्दू स्थायी रूप से दब नहीं सकते; क्योंकि यह भारत की दैवीय मिट्टी हमें अपने पैरों पर खडे रहने का बल प्रदान करती है । यहां स्वामी विवेकानंद जैसे धर्मयोद्धा उत्पन्न कर विश्व को सच्चे हिन्दुत्व का दर्शन कराते हैं ।’
– श्री. जगदीश चौधरी, संचालक, ‘बालाजी ग्रुप ऑफ इन्स्टिट्यूशन्स’, बल्लभगढ, हरियाणा.
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