वास्तुशास्त्र :व्याख्या एवं महत्त्व

वास्तुशास्त्र मनुष्य के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण घटक है । भगवान विश्वकर्मा ने उनके ग्रंथ में पहले गृह अर्थात घर के विषय में बताया है –

आब्रह्मभुवनाल्लोका गृहस्थाश्रममाश्रिताः।

यतस्तस्मात् गृहारम्भप्रवेशसमयं ह्यहम् ।।

– विश्वकर्मप्रकाश, अध्याय १, श्लोक २

अर्थ : इस ब्रह्मलोक में जितने भी जीव हैं, वे सभी गृहस्थाश्रम के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं । इसलिए मैं उस घर में रहनेवालों के लिए गृहनिर्माण के विषय में तथा उसके प्रवेश के विषय में बताता हूं –

१. वास्तु की शुभाशुभता का मनुष्य के जीवन पर दूरगामी परिणाम होना

इस विश्व में प्रत्येक जीव घर के आश्रय से रहता है । प्रायः पशु-पक्षियों से लेकर मनुष्य तक सभी घर का आश्रय लेकर जीवन व्यतीत करते हैं । इसलिए हमारे जीवन में घर अर्थात वास्तु का बडा महत्त्व है । उसकी शुभाशुभता मनुष्य के जीवन पर दूरगामी परिणाम करती है । इसलिए हमारे शास्त्र में इसका गहन अध्ययन किया गया है । वर्तमान में समाज में इस विषय पर अनेक धारणाएं-अवधारणाएं फैली हुई दिखाई देती हैं । सामाजिक माध्यमों में वास्तुशास्त्र के विषय में बताया जाता है । इसलिए मूल ग्रंथ में निश्चित रूप से क्या बताया गया है, इस विषय में अनेक लोगों के मन में जिज्ञासा होती है ।

२. वास्तु क्या है ? तथा उसकी गहनता

श्री. श्रेयस पिसोळकर

अ. वसन्ति प्राणिनो यत्र तद् वास्तु ।

अर्थ : जिस स्थान पर प्राणी निवास करते हैं, उसे वास्तु कहते हैं ।

आ. भूरेव मुख्यं वास्तु तत्र जातानि यानिहि ।

प्रासादादीनि वस्तूनि वस्तुत्वात् वास्तुसंश्रयात् ।। – समराङणसूत्रधार

अर्थ : भूमि (पृथ्वी) ही सच्ची वास्तु है । पृथ्वी पर उत्पन्न होनेवाले जीवों के आश्रय के लिए जो प्रासाद आदि का निर्माण किया जाता है, उन्हें भी ‘वास्तु’ ही कहते हैं ।

उक्त व्याख्याओं का अध्ययन करने पर हमारे ध्यान में आता है कि भूमि पर आश्रय हेतु निर्मित प्रासादादि रचना के साथ ही निवास के लिए चयनित तथा चारों ओर से बंद-खुली भूमि को भी ‘वास्तु’ कहते हैं । इसीलिए वास्तुशास्त्रकारों द्वारा भूमि की शुभाशुभता के अध्ययन एवं भूमि परीक्षण पर अधिक बल दिया गया, ऐसा दिखाई देता है । रहने के लिए चुनी हुई भूमि, जिसे चारों ओर से बंद किया गया है, वह भी वास्तु ही है । इसी को हमारे शास्त्र में ‘दिग्बंधन’ कहा गया है । प्रासाद, भवन, धाम, गृह, सदन, विमान, अगार, वेश्म, स्थान, पद, हर्म्य, निलय, आस्पद, वास, आलय, दम, क्षेत्र, उद्वासित, गेह, सौध, आयतन, मंदिर, पुरी, कुटी जैसे अनेक शब्द ‘वास्तु’ शब्द का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

हम जहां रहते हैं, उसे वास्तु कहना उचित है अथवा नहीं ? वह भी वास्तु ही है; परंतु हम उसे शास्त्रीय दृष्टि से ‘भुवन’ कहते हैं ।

३. वास्तुशास्त्र की उपयुक्तता !

अ. प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनियों ने अपने सामर्थ्य, अध्ययन एवं दीर्घ अनुभव से वास्तुशास्त्र के नियम तैयार किए । इसलिए हम वास्तु के निर्माण के समय उन नियमों को लागू कर उनका लाभ उठा सकते हैं ।

आ. पंचमहाभूत, दिशा, वैश्विक ऊर्जा, चुंबकीय ऊर्जा, भूगर्भीय ऊर्जा एवं विद्युत ऊर्जा का अध्ययन कर वास्तुशास्त्र के नियम तैयार किए गए हैं; क्योंकि वास्तु में रहनेवाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर इन सभी ऊर्जाओं का परिणाम होता रहता है ।

इ. पूरे विश्व में एक ही प्रकार से वास्तुशास्त्र के नियम लागू होते हैं; इसलिए उनका लाभ भी विश्व स्तर पर मिलता है । जो नियम भारत में लागू होते हैं, वही नियम पृथ्वी के किसी भी भाग में लागू है; क्योंकि पंचमहाभूत एवं विभिन्न ऊर्जाएं पूरे विश्व में एक ही पद्धति से काम करती हैं ।

ई. जिस प्रकार पृथ्वी के सर्व ओर स्थित ओजोन के आवरण के कारण सूर्य की कष्टदायक किरणें रोकी जाती हैं तथा लाभकारी किरणों का जीवसृष्टि के विकास के लिए लाभ मिलता है, उसी प्रकार वास्तुशास्त्र के अनुसार सभी ऊर्जाओं का उचित संतुलन रखकर बनाई गई वास्तु, उस वास्तु में रहनेवाले लोगों की रक्षा करती है तथा उनकी प्रगति के लिए लाभकारी सिद्ध होती है ।

उ. वास्तुशास्त्र के अनुसार किए गए उपाय अल्प काल में लाभकारी होते हैं । उनका सकारात्मक परिणाम दिखाई देता है ।

ऊ. वास्तुशास्त्र में धनवान एवं निर्धन, ऐसा कोई भेद नहीं है । जो नियम १००० चतुष्कोणीय मीटर भूमि के लिए लागू होता है, वही नियम १०० चतुष्कोणीय मीटर भूमि के लिए भी लागू होता है । इसलिए स्थान बडा हो अथवा छोटा, उसमें भी हम शास्त्र के नियम लागू कर निर्माणकार्य कर सकते हैं । वास्तुशास्त्र में प्रत्येक व्यक्ति के पास उपलब्ध समय, पैसा एवं परिश्रम के अनुसार हम वास्तु के उपाय कर सकते हैं ।

ए. वास्तुशास्त्र के ज्ञान का उद्गम भले ही हिन्दू धर्म में हुआ है, तब भी यह शास्त्र सभी जाति-धर्माें के लोगों के लिए लाभकारी है । वास्तुशास्त्र के माध्यम से हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है), इस वचन की प्रतीति ले सकते हैं ।

ऐ. वास्तुशास्त्र के अनुसार यदि हमने घर में परिवर्तन किए, तो उससे घर में मानसिक संघर्ष, वाद-विवाद, झगडे इत्यादि न्यून (कम) होकर घर के सभी सदस्यों का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होने में सहायता मिलती है; क्योंकि अनेक बार मानसिक रोग अथवा संघर्ष का कारण होता है दूषित वास्तु ।

ओ. कारखाने, दुकानें, कार्यालय इत्यादि व्यावसायिक वास्तुओं में हम वहां की ऊर्जा के अनुसार उचित परिवर्तन कर अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं । चिकित्सालय आदि की उचित रचना कर हम रोगियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से उसका लाभ ले सकते हैं ।

औ. वास्तुशास्त्र में घर के परिसर में किस दिशा में कौन-से वृक्ष लगाने चाहिए, इसकी जानकारी होने से उसके द्वारा हम पर्यावरण का संतुलन बनाए रख सकते हैं ।

अं. जिस प्रकार हम वास्तुशास्त्र के नियमों का उपयोग कर वास्तु का निर्माण करते हैं, वही नियम व्यापक स्वरूप में भी लागू होते हैं । हम किसी नगर अथवा राज्य की रचना करते समय वास्तुशास्त्र के अनुसार विचार करें, तो उससे उस नगर अथवा राज्य में रहनेवाले लोगों को व्यापक स्तर पर लाभ मिल सकता है ।

(इस लेख में उपयोग किए गए संदर्भ ग्रंथ : विश्वकर्मप्रकाश, मयमतम्, वाल्मीकि रामायण, समराङगणसूत्रधार, अपराजितपृच्छा, मानसार एवं महाभारत)

– श्री. श्रेयस पिसोळकर, वास्तुविशारद, ज्योतिष होराभूषण, होरारत्न, फोंडा, गोवा. (१५.१०.२०२५)

‘क्या कोई वास्तु वास्तुशास्त्र की कसौटी पर खरा उतरता है ?’, इसका अध्ययन करें !

वर्तमान में अनेक निर्माण व्यावसायी ‘हमारी सदनिकाएं वास्तुशास्त्र के अनुसार बनाई गई हैं’, ऐसा खुलेआम प्रसार करते हुए दिखाई देते हैं; परंतु क्या सचमुच ही वह वास्तु वास्तुशास्त्र की कसौटी पर खरा उतरता है ?, इसका अध्ययन करना आवश्यक है; इसलिए वास्तुशास्त्र के विषय में सभी को प्राथमिक जानकारी मिले, इस उद्देश्य से इन लेखों के माध्यम से जानकारी यहां प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ।