Sabarimala Case : सुधार के नाम पर (हिन्दू) धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता ! — सर्वोच्च न्यायालय

  • शबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश संबंधी प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह को फटकारा

  • आस्था तथा तर्क के विषयों पर न्यायालय में विवाद नहीं हो सकता, यह भी किया गया स्पष्ट

नई दिल्ली — केरल राज्य के शबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई शुरू है । २९ अप्रैल को हुई सुनवाई के समय, शबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश प्रतिबंध के विरोध में लड़ रहीं अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के तर्कों पर उत्तर देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की । न्यायालय ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता । आस्था तथा तर्क जैसे विषय न्यायालय में विवाद का विषय नहीं बन सकते । न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि धर्म के अनुसार क्या आवश्यक है तथा क्या नहीं, यह न्यायालय तय नहीं करता ; इसका निर्णय धर्म स्वयं करता है ।

अधिवक्ता जयसिंह, न्यायमूर्ति नागरत्ना

 अधिवक्ता जयसिंह द्वारा किए गए हिन्दुद्वेष्टा तर्क पर न्यायमूर्ति नागरत्ना का उत्तर

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि

हम इस देश की सभ्यता के विकास तथा धार्मिक इतिहास की उपेक्षा नहीं कर सकते । अंततः इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर संविधान के अनुच्छेद २५ तथा २६ का निर्माण हुआ है ।

इस पर अधिवक्ता जयसिंह ने कहा कि

इस विषय पर वाद-विवाद संभव है । यह एक ‘कोरी पाटी’ है । भारत में धार्मिक विवादों के समाधान हेतु कोई स्वतंत्र न्यायालय नहीं है । अन्य देशों, विशेषतः पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में ऐसी व्यवस्थाएं हैं ; परंतु भारत में न तो शरिया न्यायालय हैं तथा न ही अन्य किसी प्रकार के धार्मिक न्यायालय । अतः यदि कोई व्यक्ति वास्तविक विवाद लेकर सर्वोच्च न्यायालय में आता है, तो न्यायालय उसे अस्वीकार नहीं कर सकता । इस देश में संविधान से ऊपर कोई भी मानदंड नहीं है, इसलिए धर्म से जुडे प्रश्नों पर विचार करते समय यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए ।

न्यायालय की टिप्पणी : धार्मिक इतिहास की उपेक्षा नहीं की जा सकती

इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि

यद्यपि संविधान तथा अन्य सभी कानूनी ढांचे सर्वोच्च हैं, फिर भी इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता, क्योंकि वही वर्तमान को आकार देता है । हम यह दावा नहीं कर सकते कि भूतकाल को नजरअंदाज कर वर्तमान एक ‘कोरा कागज’ है ।

क्या उत्तर भारत का कोई व्यक्ति शबरीमाला मंदिर में प्रवेश चाहता है ?

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी टिप्पणी की कि शबरीमाला मंदिर में प्रवेश की मांग कौन कर रहा है, यह निर्धारित करना आवश्यक है । उत्तर भारत का कोई व्यक्ति दक्षिण भारत के मंदिर में प्रवेश का दावा कैसे कर सकता है ? क्या वह वास्तव में श्रद्धालु है ? यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसकी गहन जांच आवश्यक है ।

शबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुनवाई शुरू !

शबरीमाला मंदिर प्रकरण की सुनवाई ७ अप्रैल से शुरू है । केंद्र सरकार ने महिलाओं के प्रवेश के विरोध में तर्क प्रस्तुत किया है । सरकार ने कहा कि देश में अनेक देवी मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए ।