
१. साधिका के साधनारत होते हुए भी देश की गंभीर स्थिति देखकर निराश होना और श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी द्वारा उसे ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा रखकर साधना का बल बढाने के लिए कहना
इटली में रहनेवाली और एक संप्रदाय के अनुसार साधना करनेवाली एक दीदी का मुझे फोन आया । उन्होंने कहा, ‘‘यहां की वर्तमान स्थिति देखकर मेरा मन बहुत ही विषण्ण (दु:खी) हो गया है । (उस समय पूरे विश्व में कोरोना नामक विषाणुजन्य महामारी फैली हुई थी । – संकलनकर्ता) मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है । इटली की गंभीर स्थिति पूरे विश्व को ज्ञात है । भारत में दो साधुओं की हत्या हुई, यह भी सुना । चारों ओर जो हाहाकार मचा है, उसे देखकर मैं और भी निराश हो गई हूं ।
मैं नामजप कर रही हूं, तब भी मेरी यह स्थिति हो रही है, तो जो लोग साधना नहीं करते, उनकी क्या स्थिति होगी ? प्रारंभ में मेरी स्थिति अच्छी थी; पर उसे बनाए रखना मेरे लिए कठिन हो रहा है । अब मुझे केवल भगवान ही बचा सकते हैं । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी के चरणों में मेरा नमस्कार !’’
उनका यह संदेश जब श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी को बताया, तब उन्होंने कहा, ‘‘दीदी को फोन करके धैर्य देना हमारा कर्तव्य है । उन्हें आपातकाल से संबंधित स्वसूचनाएं और कुछ आध्यात्मिक उपचार बताओ एवं ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा रखते हुए परिस्थिति का सामना करने और साधना का बल बढाने के लिए कहो ।’’
२. आपातकाल की भयंकर स्थिति का सामना करने का साहस केवल तीव्र साधना से ही आता है !
इस उदाहरण से श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी ने संतों द्वारा पहले से बताए गए आपातकाल की भयंकरता की पुनः स्मृति कराई । उन्होंने कहा, ‘‘न मे भक्तः प्रणश्यति (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९, श्लोक ३१), अर्थात मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता । यह गीता का वचन सत्य है; परंतु ऐसा भक्त बनने के लिए हमें साधना के तीव्र प्रयास करने होंगे ।
आनेवाले समय में यदि हम जीवित भी रहे, तो इस विनाशकारी परिस्थिति का सामना करने का साहस भी हमारे भीतर होना चाहिए, जो केवल तीव्र साधना से ही संभव है । यह दीदी साधना कर रही हैं, तब भी उनकी यह स्थिति है; जबकि अधिकांश लोगों को तो इस स्थिति का थोडा भी आभास नहीं है । गुरु की कृपा से हमें समय रहते इन बातों का ज्ञान हो रहा है ।’’
३. ‘सनातन संस्था’ समाज के लोगों को साधना में सहायता करने के लिए सदैव तत्पर है और साधकों को प्रत्येक स्तर पर तैयार रहना चाहिए !
समाज के अनेक लोग अब सनातन संस्था की ओर आशा से देखेंगे और साधना का महत्त्व समझकर सहायता मांगेगे । ऐसे कठिन समय में हमें दृढता से खडे रहकर सभी को परिवार भाव से साधना का महत्त्व समझाना होगा । जो वास्तव में साधना करना चाहते हैं, उनकी सहायता के लिए सनातन संस्था सदैव तत्पर है । अब हमें स्वयं जीवित रहने के साथ-साथ आपातकाल में अन्य लोगों का दायित्व उठाने योग्य बनने के लिए, प्रत्येक स्तर पर तैयार होना चाहिए ।
४. यह आपातकाल ईश्वर ने दिया सुवर्णकाल है; तीव्र साधना कर अपने चारों ओर ईश्वर का वज्रकवच बनाएं !
जिसे जितना संभव है उसे उतने साधना के तीव्र प्रयास करने चाहिए । यह ईश्वर ने दिया सुवर्णकाल है । ईश्वर हमें आनेवाले समय के लिए अभी से तैयार कर रहे हैं । इस काल का पूरा लाभ उठाकर साधना बढाएं और अपने चारों ओर ईश्वर का वज्रकवच निर्मित होने के लिए पूर्ण उत्साह से प्रयास करें ।
– एक साधक
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